
लखनऊ- यूपी की राजधानी लखनऊ के तेलीबाग इलाके में एक दलित कैब ड्राइवर को चार सवारियों द्वारा अपने बॉस के लिए जातिवादी अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल का विरोध करने और उन्हें कार से उतारने की एक घटना के बाद रैपिडो प्लेटफॉर्म पर लगभग 100 साल का सस्पेंशन झेलना पड़ा है। 30 वर्षीय अंकित कुमार ने वीडियो जारी कर बताया कि कंपनी ने उनकी बात सुने बिना ही उनका अकाउंट 99 साल 11 महीने के लिए सस्पेंड कर दिया है। सस्पेंशन सूचना में 19 जुलाई 2126 तक अवधि लिखी है। इसमें वजह 'गाली-गलौज / दोहरे अर्थ वाली बातचीत / अपशब्दों का इस्तेमाल' दर्ज किया गया है।
इस मामले में दो महत्वपूर्ण सवाल हैं। पहला, क्या अंकित कुमार का यात्रियों को कार से उतारना सही था? दूसरा, क्या रैपिडो का लगभग 100 साल का सस्पेंशन जायज है? कानूनी रूप से, किसी भी ड्राइवर को यह अधिकार है कि वह अभद्र, अपमानजनक या जातिवादी भाषा का इस्तेमाल करने वाले यात्रियों को अपनी गाड़ी से उतार दे। दूसरी तरफ, रैपिडो जैसी कंपनी को अपने प्लेटफॉर्म के नियमों के तहत शिकायत मिलने पर कैप्टन के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार है। द मूकनायक ने एक्सपर्ट्स से दोनों पक्षों को समझने का प्रयास किया।
घटना बीते सोमवार सुबह की है। अंकित कुमार ने उत्तरहटिया रेलवे स्टेशन से चारबाग स्टेशन तक की सवारी के लिए चार भारतीय रेलवे कर्मचारियों को अपनी कार में बैठाया। सवारी के दौरान ये चार कर्मचारी एक वरिष्ठ अधिकारी की चर्चा कर रहे थे। वे अधिकारी की क्षमता को उनकी जाति से जोड़ते हुए बार-बार अपमानजनक और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे।
अंकित कुमार ने स्पष्ट कहा कि उनका इन चारों से कोई सामाजिक या जातिगत विवाद नहीं था। उन्होंने न तो इनकी जाति, न समुदाय और न ही धर्म के बारे में कुछ जाना था। वे एक खास समुदाय को निशाना बनाकर लगातार गाली-गलौज कर रहे थे। अंकित खुद उसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं जिसके खिलाफ अपमानजनक शब्द बोले जा रहे थे। उन्होंने कई बार विरोध किया और उन्हें रोकने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की क्षमता का उसकी जाति से कोई लेना-देना नहीं होता। लेकिन कर्मचारी नहीं माने और एक अधिकारी के खिलाफ गाली देते रहे। इसके बाद अंकित ने कार रोककर चारों को उतरने को कहा।
घटना तेलीबाग मार्केट के पास हुई। वाहन से उतरने के बाद यात्रियों और अंकित के बीच बहस छिड़ गई, जिससे आसपास के स्थानीय लोग भी इकट्ठा हो गए। अंकित का आरोप है कि इस दौरान उन्हें गाली-गलौज का सामना करना पड़ा। यह घटना एक पुलिस चौकी के पास हुई। वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। लोग सवाल कर रहे थे कि उन्होंने यात्रियों को क्यों उतारा।
वीडियो वायरल होने के बाद अंकित ने बताया कि उन्हें सोशल मीडिया पर अपमानजनक और धमकी भरे संदेश मिल रहे हैं। उन्होंने कहा, “लोग सवाल कर रहे हैं कि मैंने विरोध क्यों किया और यात्रियों को क्यों उतारा। वीडियो वायरल होने के बाद से मुझे लगातार धमकियां और गाली-गलौज वाले मैसेज आ रहे हैं।”
इसके बाद रैपिडो ने यात्रियों की शिकायत पर अंकित का अकाउंट सस्पेंड कर दिया। अंकित ने स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए बताया कि सस्पेंशन 99 साल 11 महीने का है। उन्होंने दुख जताया कि कंपनी ने उनकी तरफ से कोई स्पष्टीकरण नहीं मांगा और एकतरफा कार्रवाई कर दी। अंकित मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमाधारी हैं और परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य हैं। उनके पिता मजदूरी करते हैं और मां गृहिणी हैं। इस सस्पेंशन से उनका रोजी-रोटी का जरिया प्रभावित हो गया है।
अंकित कुमार ने कहा कि वे जातिवादी भाषा का विरोध करने के अलावा कुछ नहीं कर रहे थे। वीडियो में वे बार-बार दोहराते हैं कि उन्होंने कई बार मना किया था लेकिन कर्मचारी नहीं रुके। पूरे मामले में रैपिडो की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। कई लोग प्लेटफॉर्म के एकतरफा रवैये की आलोचना कर रहे हैं और रैपिडो के बहिष्कार की बात भी कह रहे हैं।
द मूकनायक ने इस मामले में रैपिडो का पक्ष जानने के लिए कम्पनी को ईमेल के जरिये संपर्क किया, प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर खबर अपडेट की जाएगी।
द मूकनायक ने इस विषय पर कानूनी जानकरी के लिए एक्सपर्ट राय ली। लेबर कानून के जानकार कहते हैं, कानूनी दृष्टि से इस मामले में दोनों पक्षों के कुछ जायज पहलू हैं। कानूनी दृष्टि से देखें तो अंकित कुमार का यात्रियों को कार से उतारना गलत नहीं माना जा सकता, क्योंकि कोई भी ड्राइवर अपमानजनक, जातिवादी या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वाले यात्रियों को सेवा देने से मना कर सकता है और अपनी गाड़ी से उतार सकता है। वहीं राइड संचालक कंपनी को अपने नियमों और सेवा शर्तों के तहत शिकायत मिलने पर कैप्टन के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार है।
हालांकि कंपनी द्वारा लगभग 100 साल का सस्पेंशन लगाना और अंकित से कोई स्पष्टीकरण या नोटिस दिए बिना एकतरफा कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ लगता है। कंपनी यात्रियों की शिकायत पर कार्रवाई कर सकती है, लेकिन इतनी कठोर सजा देने से पहले दोनों पक्षों की बात सुनना और उचित प्रक्रिया अपनाना जरूरी होता है। इस मामले में कंपनी की प्रक्रिया एकतरफा और अत्यधिक कठोर दिखती है, जबकि ड्राइवर का विरोध जातिवादी अपमान के खिलाफ जायज प्रतीत होता है।
कानूनी सलाहकार कहते हैं कि तकनीकी रूप से कंपनियां अपने नियम और सेवा शर्तों के तहत इतने लंबे समय का सस्पेंशन लगा सकती हैं। 99 साल या उससे अधिक का सस्पेंशन असल में स्थायी बैन का ही रूप होता है।
कानूनी रूप से देखें तो कंपनी और ड्राइवर के बीच का रिश्ता अनुबंध पर आधारित होता है। कंपनी अपने नियमों के मुताबिक अकाउंट बंद या सस्पेंड कर सकती है। लेकिन इतने लंबे सस्पेंशन जो किसी व्यक्ति के पूरे जीवनकाल से भी ज्यादा है, को बिना नोटिस और बिना पक्ष सुने लगाना कई मामलों में मनमाना और अनुचित माना जा सकता है। अदालतें कभी-कभी ऐसे मामलों में दखल देती हैं, खासकर जब सस्पेंशन किसी व्यक्ति की रोजी-रोटी (आजीविका का अधिकार) को पूरी तरह प्रभावित करता है।
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