
नई दिल्ली- भारत की उच्च न्यायपालिका में सामाजिक विविधता की कमी एक गंभीर मुद्दा बना हुआ है। हाल के संसदीय आंकड़ों से पता चलता है कि उच्च न्यायालयों में अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है, जबकि सामान्य वर्ग का दबदबा जारी है।
सीपीआई(एम) के राज्यसभा सांसद डॉ. जॉन ब्रिट्टास ने अनस्टार्ड प्रश्न संख्या 2357 के तहत कानून एवं न्याय मंत्री से उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या, रिक्तियों, लंबित प्रस्तावों, एससी/एसटी/ओबीसी और महिलाओं के प्रतिनिधित्व तथा गैर-न्यायिक स्टाफ में इन वर्गों की स्थिति पर विस्तृत जानकारी मांगी थी।
केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने 12 मार्च को लिखित जवाब में बताया कि 6 मार्च 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में स्वीकृत 34 पदों में से 33 पर जज कार्यरत हैं, जबकि उच्च न्यायालयों में स्वीकृत 1122 पदों में से केवल 810 जज कार्यरत हैं और 312 पद खाली पड़े हैं।
इन रिक्तियों में से 132 नियुक्ति प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम और सरकार के बीच विभिन्न चरणों में लंबित हैं, जबकि 180 रिक्तियों के लिए उच्च न्यायालय कॉलेजियम से अभी सिफारिशें प्राप्त नहीं हुई हैं। ये खाली पद उच्च न्यायालयों में करोड़ों मामलों के लंबित रहने का एक प्रमुख कारण बने हुए हैं, जिससे आम नागरिक को समय पर न्याय मिलना चुनौतीपूर्ण हो रहा है।
केंद्रीय राज्य मंत्री ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 224 में किसी जाति या वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं है, इसलिए जजों की जाति-आधारित आंकड़े केंद्रीय रूप से उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि, 2018 से उच्च न्यायालय जजों की नियुक्ति के लिए सामाजिक पृष्ठभूमि की जानकारी अनिवार्य की गई है। 2018 से 6 मार्च 2026 तक कुल 849 उच्च न्यायालय जज नियुक्त हुए, जिनमें से 33 एससी श्रेणी से, 17 एसटी से और 104 ओबीसी से हैं। महिलाओं की स्थिति भी चिंताजनक है- सुप्रीम कोर्ट में केवल 1 महिला जज कार्यरत है, जबकि उच्च न्यायालयों में 114 महिला जज हैं।
सरकार ने सामाजिक विविधता बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक तथा महिलाओं को प्राथमिकता देने का अनुरोध किया है। नियुक्तियां केवल सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पर ही होती हैं।
गैर-न्यायिक स्टाफ के बारे में पूछे सवाल पर जवाब में कहा गया कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 146(1) यह प्रावधान करता है कि "उच्चतम न्यायालय के अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्तियाँ भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा, या न्यायालय के ऐसे किसी अन्य न्यायाधीश या अधिकारी द्वारा की जाएँगी, जैसा कि वे निर्देश दें। परंतु, राष्ट्रपति नियम बनाकर यह अपेक्षा कर सकते हैं कि ऐसे मामलों में, जो नियम में विनिर्दिष्ट किए जाएँ, कोई भी ऐसा व्यक्ति, जो पहले से न्यायालय से संबद्ध नहीं है, न्यायालय से संबंधित किसी पद पर तब तक नियुक्त नहीं किया जाएगा, जब तक कि संघ लोक सेवा आयोग से परामर्श न कर लिया जाए।"
इसके अतिरिक्त, उच्च न्यायालयों के कर्मचारियों की नियुक्तियाँ, संविधान के अनुच्छेद 229(2) द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अनुसार उच्च न्यायालयों द्वारा बनाए गए नियमों के तहत की जाती हैं; यह अनुच्छेद प्रावधान करता है कि "किसी उच्च न्यायालय के अधिकारियों और कर्मचारियों की सेवा की शर्तें वैसी ही होंगी, जैसी कि न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा, अथवा मुख्य न्यायाधीश द्वारा इस प्रयोजन के लिए नियम बनाने हेतु प्राधिकृत न्यायालय के किसी अन्य न्यायाधीश या अधिकारी द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विहित की जाएँ।" जवाब में बताया गया कि इन स्टाफ की एससी/एसटी/ओबीसी प्रतिनिधित्व की जानकारी केंद्रीय रूप से उपलब्ध नहीं है।
यह स्थिति न्यायपालिका में सामाजिक समावेशिता की कमी को उजागर करती है, जिस पर विशेषज्ञ और विपक्षी सांसद बार-बार सुधार की मांग करते रहे हैं। डॉ. जॉन ब्रिट्टास के सवाल से एक बार फिर उच्च न्यायपालिका की विविधता और रिक्तियों के मुद्दे पर बहस छिड़ गई है, और सरकार ने कॉलेजियम प्रणाली के तहत विविधता सुनिश्चित करने के प्रयासों पर जोर दिया है।
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