
बेंगलुरु- कर्नाटक हाईकोर्ट की खंडपीठ ने शिमोगा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SIMS) के जनरल सर्जरी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अश्विन हेब्बर के खिलाफ चल रहे दो अलग-अलग यौन उत्पीड़न मामलों में एक बेहद कड़ा फैसला सुनाया है। जस्टिस डी.के. सिंह और जस्टिस टी.एम. नदाफ की खंडपीठ ने न केवल डॉक्टर के निलंबन रद्द करने के आदेश को रद्द कर दिया, बल्कि कॉलेज के निदेशक और चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव के खिलाफ भी अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश करते हुए कहा कि दोनों अधिकारियों ने आरोपी को बचाने में पूरी ताकत झोंक दी और पीड़िताओं के साथ न्याय होने ही नहीं दिया।
अदालत के सामने आए दस्तावेजों के अनुसार डॉ. अश्विन हेब्बर की नियुक्ति 2007 में सीनियर रेजिडेंट के तौर पर हुई थी और बाद में वे इसी संस्थान में जनरल सर्जरी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर बन गए। पहली शिकायत अगस्त 2022 में एक युवा डॉक्टर ने दर्ज कराई थी, जो SIMS से एमबीबीएस कर चुकी थीं और बाद में इसी संस्थान में जूनियर रेजिडेंट के तौर पर डॉ. हेब्बर की निगरानी में काम कर रही थीं। शिकायत के मुताबिक 15 जुलाई 2022 को दोपहर करीब साढ़े तीन बजे जब वे अपनी पीजी डिग्री और आगे की पढ़ाई के बारे में जानकारी लेने डॉ. हेब्बर से मिलने गईं, तो उन्होंने उन्हें पुरानी छात्रा के रूप में पहचाना, सामने बैठकर घूरना शुरू किया और उनके सीने को छुआ। पीड़िता ने तुरंत विरोध किया और एक वरिष्ठ चिकित्सक से मिलकर लिखित शिकायत दी, लेकिन विभाग ने 25 दिनों तक कोई कार्रवाई नहीं की। इसके बाद पीड़िता ने महिला पुलिस थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 354ए के तहत एफआईआर दर्ज कराई।
डॉ. हेब्बर को गिरफ्तार किया गया और जमानत पर छूटने के बाद 21 जुलाई 2022 को कर्नाटक राज्य सिविल सेवा (आचरण) नियम, 2021 के नियम 33 के तहत उन्हें निलंबित कर दिया गया। लेकिन डॉ. हेब्बर ने इस निलंबन आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की, जहां एकल न्यायाधीश ने अंतरिम राहत देते हुए निलंबन पर रोक लगा दी और वे फिर से सेवा में बहाल हो गए।
खंडपीठ ने अपने फैसले में इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि यौन उत्पीड़न की रोकथाम से जुड़े कानून (POSH Act, 2013) के तहत गठित आंतरिक शिकायत समिति (ICC) ने कदाचार पर रिपोर्ट देने के बजाय पीड़िता पर शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया। समिति ने यह दर्ज किया कि पीड़िता डॉ. हेब्बर को पिछले पांच साल से जनरल और ऑन्को सर्जन के तौर पर जानती थीं और दोनों पक्षों ने आगे मामला न बढ़ाने पर सहमति जताई-- इसी आधार पर समिति ने शिकायत बंद कर दी। अदालत ने इसे "गंभीर कदाचार" बताते हुए कहा कि पीड़िता पर भारी दबाव डाला गया था, जिसका सबूत यह है कि अगले ही दिन उन्होंने जिला उपायुक्त के पास जाकर पुनः जांच की मांग की। इसके बाद POSH कानून के तहत एक स्थानीय समिति गठित हुई, जिसने उसी दिन जांच कर प्रथमदृष्टया आरोपों को सही पाया और डॉ. हेब्बर को दोबारा निलंबित किया गया।
हालांकि जून 2024 में एकल न्यायाधीश ने यह कहते हुए निलंबन आदेश रद्द कर दिया कि स्थानीय समिति का गठन कानून की धारा 10(4) के प्रावधानों के अनुरूप नहीं था और बिना विभागीय जांच शुरू किए किसी को निलंबित नहीं रखा जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया था कि यह फैसला पीड़िता के किसी भी भविष्य के उपाय या प्रशासन की किसी संभावित कार्रवाई में बाधा नहीं बनेगा। खंडपीठ ने अफसोस जताया कि इसके बावजूद डॉ. हेब्बर के खिलाफ कोई विभागीय जांच शुरू ही नहीं की गई। कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा:
"हमें पूरा विश्वास है कि प्रारंभिक अंतरिम आदेश और उक्त फैसले से हौसला पाकर तथा उनके खिलाफ किसी विभागीय कार्रवाई के अभाव में, डॉ. अश्विन हेब्बर ने अतीत में कई छात्राओं का यौन उत्पीड़न किया होगा, लेकिन कई कारणों से वे छात्राएं शिकायत लेकर आगे नहीं आईं... मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर की स्थिति बेहद प्रभावशाली होती है और परीक्षा, खासकर आंतरिक परीक्षा व मौखिक परीक्षा में अंक देने की शक्ति उसी के पास होती है।"
पहले फैसले के एक साल के भीतर ही डॉ. हेब्बर के खिलाफ दूसरी शिकायत सामने आई। यह मामला जनरल सर्जरी विभाग की दूसरे वर्ष की पीजी छात्रा (अदालत ने उन्हें "डॉ. पी" कहा है) से जुड़ा है। 14 जून 2025 को यूनिट के एक साथी डॉक्टर की थीसिस पूरी होने की खुशी में शिमोगा के एक होटल में डिनर पार्टी रखी गई थी। यूनिट प्रमुख होने के नाते डॉ. हेब्बर ने ही आयोजक डॉक्टर से जोर देकर डॉ. पी को भी पार्टी में बुलवाया। शिकायत के अनुसार डॉ. हेब्बर ने पीड़िता को अपने बगल में बिठाया और खाने के दौरान करीब 20 से 25 मिनट तक बार-बार उनकी जांघ को अनुचित तरीके से छूते रहे और मेज के नीचे उनका हाथ पकड़े रखा। सदमे में आई पीड़िता उस वक्त कोई प्रतिक्रिया नहीं दे सकीं और अपने परिवार व दोस्तों से गहन चर्चा के बाद चार दिन बाद यानी 19 जून 2025 को उन्होंने आंतरिक शिकायत समिति के पास औपचारिक शिकायत दर्ज कराई।
इस मामले में 20 जून 2025 को महिला पुलिस थाने में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 75(2) और अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2015 की धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज हुई। डॉ. हेब्बर को 26 जून 2025 को गिरफ्तार किया गया और वे 4 जुलाई 2025 तक न्यायिक हिरासत में रहे। चूंकि वे 48 घंटे से अधिक हिरासत में रहे थे, इसलिए उन्हें फिर से निलंबित कर दिया गया।
POSH समिति ने 3 जुलाई 2025 की अंतरिम रिपोर्ट में आरोपों को प्रथमदृष्टया सही पाया और 5 अगस्त 2025 की अंतिम रिपोर्ट में साफ लिखा कि पार्टी में मौजूद कई डॉक्टरों ने डॉ. हेब्बर को पीड़िता के पास बैठाकर छेड़छाड़ करते देखा। रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला तथ्य भी दर्ज है कि जब पीड़िता ने शिकायत की तो डॉ. हेब्बर ने एक साथी डॉक्टर को फोन कर अपने पक्ष में गवाही देने को कहा, जिसकी कॉल रिकॉर्डिंग भी मौजूद है। समिति ने सिफारिश की कि डॉ. हेब्बर के खिलाफ सेवा नियमों और POSH कानून के तहत आवश्यक कार्रवाई की जाए, जबकि पीड़िता ने उनकी बर्खास्तगी और मेडिकल लाइसेंस रद्द करने की मांग रखी।
दिलचस्प यह है कि SIMS के निदेशक ने खुद ही जून 2025 में चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव को पत्र लिखकर डॉ. हेब्बर के खिलाफ विभागीय कार्रवाई और निलंबन की सिफारिश की थी, क्योंकि पीजी छात्रों में हड़ताल जैसी स्थिति बन रही थी। इसके बाद 3 जुलाई 2025 को उन्हें निलंबित कर दिया गया और 12 नवंबर 2025 को उनके खिलाफ आरोप-पत्र भी जारी हुआ।
लेकिन निलंबन के महज 18 दिन बाद ही डॉ. हेब्बर ने बहाली की मांग करते हुए प्रतिवेदन दिया, जिसे निदेशक ने आगे बढ़ाया। प्रधान सचिव के कहने पर निदेशक ने 6 अक्टूबर 2025 को एक ऐसी सिफारिश भेजी, जिसमें डॉ. हेब्बर के खिलाफ किसी भी आरोप या कदाचार का जिक्र तक नहीं किया गया, बल्कि उनकी प्रशंसा में पत्र लिखा गया। इस सिफारिश में बताया गया कि डॉ. हेब्बर ने जुलाई 2021 से जून 2025 के बीच 647 जनरल सर्जरी और 382 कैंसर सर्जरी यानी कुल 1029 ऑपरेशन किए, जिनसे संस्थान को करीब 1.47 करोड़ रुपये की आय हुई। साथ ही यह भी लिखा गया कि वे 19 राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय शोधपत्र प्रकाशित कर चुके हैं, दो प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं, चार पीजी छात्रों का मार्गदर्शन कर रहे हैं, यूनिट प्रमुख हैं और नेशनल मेडिकल कमीशन के मानकों के अनुसार उनकी सेवाएं संस्थान के लिए अपरिहार्य हैं। यहां तक कि यह तर्क भी दिया गया कि उनके निलंबन से गरीब, पिछड़े वर्ग और मुस्लिम मरीजों को निजी अस्पतालों की महंगी सर्जरी पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
इस सिफारिश के आधार पर 17 नवंबर 2025 को प्रधान सचिव ने डॉ. हेब्बर को बहाल कर दिया और उन्हें अस्थायी तौर पर हावेरी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज स्थानांतरित कर दिया गया। लेकिन डॉ. हेब्बर हावेरी में कभी हाजिर ही नहीं हुए।
डॉ. हेब्बर ने अपने तबादले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। एकल न्यायाधीश ने 9 फरवरी 2026 को यह कहते हुए तबादले पर रोक लगा दी कि स्थानांतरण से पहले संबंधित गवर्निंग काउंसिल का प्रस्ताव नहीं लिया गया था। बाद में जब गवर्निंग काउंसिल ने स्थानांतरण को पश्चातवर्ती (post facto) मंजूरी दी, तो डॉ. हेब्बर ने उस प्रस्ताव को भी चुनौती दी, और एकल न्यायाधीश ने 12 मई 2026 को उस पर भी रोक लगा दी। SIMS संस्थान ने इन आदेशों के खिलाफ खंडपीठ में अपील दाखिल की।
अपील पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने 2 जून 2026 को दिए अपने आदेश में लिखा:
"एक शिक्षक, जो अपनी ही छात्रा का यौन उत्पीड़न करने का दोषी पाया गया है, वह उसी संस्थान में नहीं रह सकता, यह पीड़िता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा होगा, जिसे रोज़ उसी शिक्षक का सामना करना पड़ेगा।"
अदालत ने केवल तकनीकी आधार (प्रस्ताव न होने) पर तबादले को रोकने वाले एकल न्यायाधीश के आदेश को निरस्त कर दिया।
इसके बाद खंडपीठ ने चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव मोहम्मद मोहसिन और SIMS के निदेशक डॉ. विरुपाक्षप्पा को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने और अदालत में स्वयं उपस्थित होने का आदेश दिया।
अपने आदेश में अदालत ने लिखा कि डॉ. हेब्बर पर "अपनी ही पीजी छात्रा के यौन उत्पीड़न" का गंभीर आरोप है, यह उनके खिलाफ दूसरी शिकायत है, और इसके बावजूद निलंबन रद्द करने वाले प्रधान सचिव के आचरण की जांच जरूरी है क्योंकि वे "महिला सुरक्षा और गरिमा के प्रति पूरी तरह असंवेदनशील" प्रतीत होते हैं।
जब निदेशक का हलफनामा अदालत के सामने आया, तो 1 जुलाई के आदेश में खंडपीठ ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा:
"निदेशक ने डॉ. अश्विन हेब्बर की प्रशंसा में मानो प्रशस्ति-पाठ ही कर डाला, लेकिन उनके पिछले कदाचार, आंतरिक शिकायत समिति के निष्कर्षों, एफआईआर और गिरफ्तारी का कोई जिक्र तक नहीं किया... प्रतीत होता है कि निदेशक ने डॉ. अश्विन हेब्बर को बचाने में हरसंभव प्रयास किया है, और ऐसे में पीड़िता के लिए न्याय की उम्मीद करना कठिन होगा।"
अदालत ने यह भी कहा कि "अब तक केवल दो मामले सामने आए हैं" और डॉ. हेब्बर "एक असुधार्य (incorrigible) व्यक्ति प्रतीत होते हैं", जिन्हें संस्थान के मुखिया द्वारा ही संरक्षण दिया जा रहा है।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि निदेशक ने बहाली की सिफारिश करते समय 25 नवंबर 2020 की एक सरकारी अधिसूचना का हवाला दिया, जिसके अनुसार किसी कर्मचारी को छह महीने से अधिक निलंबित नहीं रखा जा सकता। लेकिन अदालत ने कर्नाटक सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1957 के नियम 10(5)(बी) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि यह नियम केवल तभी लागू होता है जब छह महीने के भीतर विभागीय जांच शुरू न हो या अदालत में आरोप-पत्र दाखिल न हो। इस मामले में तो 12 नवंबर 2025 को ही आरोप-पत्र जारी हो चुका था, इसलिए निलंबन वापस लेने का कोई औचित्य नहीं बनता था।
फैसले के अंतिम हिस्से में अदालत ने संत कबीर का यह प्रसिद्ध दोहा उद्धृत किया:
इसका हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि डॉ. हेब्बर जैसे "गुरु" इस दोहे की मूल भावना के ठीक विपरीत आचरण करते हैं और एक पेशेवर मेडिकल कॉलेज में ऐसा कदाचार "रीढ़ की हड्डी में सिहरन पैदा करने वाला" (chilling effect to the spine) है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम दिलीप पॉल (2023) फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़िता की विश्वसनीय गवाही को पूरा महत्व दिया जाना चाहिए और आरोपी के प्रति किसी भी तरह की नरमी या सहानुभूति अनुचित है।
अंत में अदालत ने डॉ. हेब्बर के लिए एक बेहद तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, "डॉ. अश्विन हेब्बर सफेद कोट में एक भेड़िया हैं।"
खंडपीठ ने संस्थान की अपील मंजूर करते हुए डॉ. हेब्बर की दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं और 17 नवंबर 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत उनका निलंबन वापस लिया गया था। अदालत ने आदेश दिया कि विभागीय जांच पूरी होने और सजा पर अंतिम निर्णय आने तक डॉ. हेब्बर निलंबित ही रहेंगे, हालांकि वे प्रशासनिक तौर पर हावेरी इंस्टीट्यूट से संबद्ध रहेंगे।
अदालत ने केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) और राज्य सरकार को प्रधान सचिव मोहम्मद मोहसिन के खिलाफ उचित कार्रवाई करने और SIMS निदेशक डॉ. विरुपाक्षप्पा के खिलाफ तत्काल विभागीय कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया। साथ ही फैसले की प्रति नेशनल मेडिकल कमीशन को भी भेजने का आदेश दिया गया, ताकि डॉ. हेब्बर के खिलाफ जरूरत पड़ने पर उनका मेडिकल लाइसेंस रद्द करने पर भी विचार हो सके।
फैसले की प्रति मुख्य सचिव, कर्नाटक सरकार; सचिव, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, भारत सरकार; और सचिव, नेशनल मेडिकल कमीशन को भी भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
यह रिपोर्ट कर्नाटक हाईकोर्ट के 4 अगस्त 2026 के फैसले (WA No. 675/2026 सहित संबंधित याचिकाएं) पर आधारित है।
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