
पुणे: वंचित बहुजन आघाडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट प्रकाश आंबेडकर ने शनिवार को पुणे में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ओबीसी छात्रों के हितों से जुड़े कई अहम फैसलों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ओबीसी संगठनों के नेताओं की हुई एक बैठक हुई जिसमें यूजीसी के नए नियमों में ओबीसी के लिए किए गए प्रावधानों पर चर्चा हुई और इन नियमों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक को लेकर भी विचार विमर्श किया गया। आंबेडकर ने बताया कि उस बैठक में यह तय किया गया कि महाराष्ट्र की सभी विश्वविद्यालयों में ओबीसी छात्र और प्रोफेसर एकजुट होंगे, वहीं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से ओबीसी समूह का प्रतिनिधिमंडल मुलाकात करेगा।
प्रकाश आंबेडकर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि यूजीसी के नये नियमों में किये बदलाव को बचाने के लिए महाराष्ट्र के सभी विश्वविद्यालयों में ओबीसी छात्रों का आंदोलन होना चाहिए। उन्होंने कहा, "महाराष्ट्र की जितनी भी यूनिवर्सिटीज हैं, मुंबई, पुणे, नासिक, नांदेड, नागपुर, शोलापुर, कोल्हापुर, औरंगाबाद, अमरावती आदि सभी जगह कैंपस के भीतर ही ओबीसी बैनर तले ओबीसी स्टूडेंट्स और प्रोफेसरों की मीटिंग होगी। इस बदलाव को बचाने की व्यवस्था होनी चाहिए।"
उन्होंने स्पष्ट किया कि ये बैठकें ओबीसी छात्रों और प्रोफेसरों को एकजुट करने के उद्देश्य से होंगी, ताकि यूजीसी के नए नियमों में ओबीसी के लिए किए गए प्रावधानों को बचाया जा सके और सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले में ओबीसी पक्ष को मजबूती से रखा जा सके। आंबेडकर ने कहा कि ओबीसी समुदाय को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहना होगा और इस संघर्ष में सभी विश्वविद्यालयों के छात्र और शिक्षक एक साथ आएंगे।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जनवरी 2026 में जो नए नियम लागू किए गए थे, उनमें ओबीसी छात्रों के लिए ऐतिहासिक प्रावधान किए गए थे। इन नियमों के तहत पहली बार ओबीसी को एससी और एसटी के समान संरक्षित श्रेणी का दर्जा दिया गया था। आंबेडकर ने कहा, "यूजीसी के अंदर जो बदलाव आया है, 2025 (2026) के कानून का हम स्वागत करते हैं। जिस तरह से विश्वविद्यालयों में एससी, एसटी के छात्रों पर अन्याय होता है, तो एट्रोसिटी कानून के तहत कार्रवाई होती है। उसी तरह विश्वविद्यालय में ओबीसी छात्रों पर अन्याय होता है, तो उनके बचाव के लिए एट्रोसिटी कानून के तहत कार्रवाई होगी।"
नए नियमों में हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में समान अवसर केंद्र और समानता समिति का गठन अनिवार्य किया गया था। इन समितियों में ओबीसी सहित वंचित वर्गों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित किया गया था। साथ ही, जातिगत भेदभाव की शिकायत मिलने पर 24 घंटे के भीतर समिति की बैठक और 15 दिनों में रिपोर्ट देने का प्रावधान किया गया था। यह नियमावली 2012 की पुरानी व्यवस्था को प्रतिस्थापित करती थी, जो केवल सलाहकारी प्रकृति की थी।
प्रकाश आंबेडकर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के इन नए नियमों पर रोक लगाए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने बताया कि यूजीसी ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में ओबीसी छात्रों के साथ हो रहे अन्याय को दूर करने के लिए यह कानून बनाया था, लेकिन उच्च जाति के छात्रों और कुछ वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इस पर रोक लगवा दी। उन्होंने कहा, "ऊंची जाति के स्टूडेंट्स ने प्रोटेस्ट किया। कुछ वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन फाइल की और नए रेगुलेशन पर रोक लगा दी गई और पुराने रेगुलेशन को फिर से लागू कर दिया गया।"
आंबेडकर ने इस बात पर भी चिंता जताई कि ओबीसी के हितों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट में बार-बार रोक लगने की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। उन्होंने कहा, "हर बार ओबीसी समूह के हित का प्रावधान होता है, तो सुप्रीम कोर्ट में स्टे लगाकर कई सालों तक केस चलता है। जब ऐसे अन्याय होते हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कानून और नियम बनाए जाते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट उस पर रोक क्यों लगाता है?"
प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रकाश आंबेडकर ने बताया कि ओबीसी संगठनों के नेताओं की बैठक में यह फैसला लिया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से ओबीसी समूह का एक प्रतिनिधिमंडल मुलाकात करेगा। उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस से ओबीसी समूह का प्रतिनिधिमंडल मुलाकात करेंगा। सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी केस में फैसला सुनाया कि ओबीसी को संवैधानिक तरीके से रिजर्वेशन मिल सकता है। इस बार यह तय हुआ कि 27 परसेंट ओबीसी रिजर्वेशन संवैधानिक है।"
उन्होंने आगे बताया कि प्रतिनिधिमंडल मुख्य न्यायाधीश से सवाल पूछेगा कि अगर संविधान ओबीसी को आरक्षण दे सकता है, तो इसे लागू करते समय जो लोग अभी भी आरक्षण का विरोध कर रहे हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं होती। उन्होंने कहा कि जब भी ओबीसी के अधिकारों से जुड़ा कोई केस सुप्रीम कोर्ट में जाता है, तो उस पर स्टे लग जाता है। इस बारे में हम सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस से मिलकर स्थिति स्पष्ट करेंगे।
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