
लखनऊ- सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने रविवार को लखनऊ प्रेस क्लब में एक सम्मेलन के दौरान उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 और उसमें 2024 में किए गए संशोधनों को तत्काल निरस्त करने की मांग की है। पार्टी ने राज्य के विभिन्न जिलों में ईसाई धर्मावलंबियों, पादरियों और प्रार्थना सभाओं में शामिल लोगों के खिलाफ इस कानून के तहत दर्ज मामलों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
'उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत ईसाइयों का उत्पीड़न' विषय पर आयोजित इस सम्मेलन में राजनेताओं, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं और धार्मिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। वक्ताओं में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हर्ष मंदर, ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के पूर्व महासचिव जॉन दयाल, लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा, फादर आनंद, फादर डॉ. डोनाल्ड डिसूजा, छोटेबाई तथा पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अधिवक्ता सलाहुद्दीन शिबू शामिल थे। सम्मेलन की अध्यक्षता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अधिवक्ता मोहम्मद शोएब ने की।
सम्मेलन में जुलाई 2022 से जुलाई 2026 के बीच विभिन्न जिलों में दर्ज मामलों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया। वक्ताओं के अनुसार, इनमें कई समान प्रवृत्तियाँ देखने को मिलीं:
प्रार्थना सभाओं में हस्तक्षेप: निजी घरों या किराए के स्थलों पर आयोजित प्रार्थना सभाओं को तीसरे पक्ष, विशेषकर हिंदुत्ववादी संगठनों से जुड़े लोगों की शिकायत के आधार पर बाधित किया गया।
एफआईआर में समान आरोप: अधिकांश मामलों में ईसाई धर्म का महिमामंडन, हिंदू धर्म की आलोचना, धन का प्रलोभन या चमत्कारी उपचार का वादा करने जैसे एक जैसे आरोप लगाए गए।
शिकायतकर्ता तीसरे पक्ष: कई एफआईआर उन लोगों की शिकायत पर दर्ज की गईं, जो स्वयं कथित धर्मांतरण के शिकार नहीं थे, बल्कि बजरंग दल या विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों से जुड़े थे। बाराबंकी जिले के तीन मामलों में शिकायतकर्ता एक ही व्यक्ति था।
लंबी न्यायिक हिरासत: आरोपियों को जमानत मिलने में कई सप्ताह से लेकर महीनों तक का समय लगा, जिसमें दो गर्भवती महिलाएँ भी शामिल थीं, जिनमें से एक का कथित तौर पर हिरासत में गर्भपात हो गया।
हिरासत में दुर्व्यवहार: कुछ मामलों में पुलिस द्वारा मारपीट, धमकी और दुर्व्यवहार किए जाने के आरोप लगाए गए।
सम्मेलन में कहा गया कि संविधान का अनुच्छेद 25 अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है, जो संवैधानिक सीमाओं के अधीन है।
वक्ताओं ने कहा कि कानून का क्रियान्वयन उसके मूल उद्देश्य-बल, धोखाधड़ी या दबाव से धर्मांतरण रोकना से परे जाकर शांतिपूर्ण धार्मिक आयोजनों को निशाना बना रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार है।
सम्मेलन में यह भी कहा गया कि अधिनियम के तहत की गई कार्रवाइयाँ अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के तहत मिले संरक्षण के सवाल खड़े करती हैं। वक्ताओं ने चेतावनी दी कि इस तरह की कार्रवाइयों से धार्मिक स्वतंत्रता के प्रयोग पर भय का माहौल बन सकता है, जिसके चलते कई पादरियों और ईसाइयों ने अपनी धार्मिक गतिविधियाँ कम कर दी हैं या बंद कर दी हैं।
सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने उत्तर प्रदेश सरकार से अधिनियम के क्रियान्वयन की तत्काल समीक्षा करने की मांग की। पार्टी ने कहा कि आपराधिक कार्यवाही केवल उन्हीं मामलों में शुरू की जानी चाहिए जहां बल, दबाव, धोखाधड़ी अथवा कानून द्वारा प्रतिबंधित किसी अन्य कृत्य के
विश्वसनीय प्रमाण मौजूद हों। केवल किसी धार्मिक सभा की प्रकृति पर आपत्ति के आधार पर पुलिस को शांतिपूर्ण प्रार्थना सभाओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, जब तक कि किसी संज्ञेय अपराध के घटित होने का उचित संदेह न हो। सम्मेलन ने हिरासत में हिंसा तथा पुलिस दुर्व्यवहार के आरोपों की स्वतंत्र जांच, गैरकानूनी गिरफ्तारी या हिरासत पाए जाने पर जवाबदेही और मुआवजे तथा शांतिपूर्ण धार्मिक आचरण और विधि विरुद्ध धर्मांतरण के बीच स्पष्ट अंतर सुनिश्चित करने के लिए पुलिस को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की भी मांग की।
न्यायपालिका से ऐसे मामलों का शीघ्र निस्तारण सुनिश्चित करने तथा अभियोजन के साक्ष्य आधार की गहन समीक्षा करने का आग्रह किया गया, विशेष रूप से उन मामलों में जो कथित पीड़ित के बजाय किसी तीसरे पक्ष की शिकायत पर दर्ज किए गए हों।
सम्मेलन में सामने आई प्रवृत्तियों तथा संवैधानिक एवं मानवाधिकार संबंधी चिंताओं को देखते हुए सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 तथा इसके 2024 के संशोधन को निरस्त करने की मांग की।
पार्टी ने कहा कि अंतःकरण की स्वतंत्रता और धार्मिक आचरण का अधिकार मौलिक संवैधानिक गारंटी है। सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने लोकतांत्रिक संगठनों, मानवाधिकार समूहों, अधिवक्ताओं, शिक्षाविदों, पत्रकारों तथा जागरूक नागरिकों से आह्वान किया कि वे धार्मिक पहचान से परे सभी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए आगे आएं।
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