
रुद्रपुर - ‘अनसुनी आवाज’ न्यूज पोर्टल के संपादक पत्रकार रूपेश कुमार पर पुलिस हमले और फर्जी मुकदमा दर्ज करने का गंभीर आरोप लगाया गया है। अनसुनी आवाज की ओर से जारी अपील में यह आरोप लगाया गया है कि 3 नवम्बर की रात को राज्य सरकार के दबाव में जिले की पुलिस ने उन्हें निशाना बनाया।
अनसुनी आवाज की ओर से प्रेरणा-अंशु ने बताया कि रूपेश कुमार पिछले 24 वर्षों से जनपक्षीय पत्रकारिता कर रहे हैं। उनके पिता स्वर्गीय प्रताप सिंह भी तराई सहित देश भर के जनआंदोलनों में सक्रिय रहे थे। उन्होंने आगे बताया कि रूपेश कुमार सोशल मीडिया पर ‘अनसुनी आवाज’ पोर्टल के माध्यम से सरकार की जनविरोधी नीतियों और साम्प्रदायिकता के खिलाफ लगातार लिखते रहे हैं।
3 नवम्बर की रात लगभग 11:30 बजे रूपेश कुमार रुद्रपुर स्थित अपने कार्यालय से दिनेशपुर घर के लिए निकले। कार्यालय से निकलने के करीब 10 मिनट बाद UK06AZ9846 नंबर की एक बोलेरो कार उनकी मारुति डिजायर (UK06AZ5934) में पीछे से टक्कर मारती है। इसके बाद वही गाड़ी दोबारा टक्कर मारती है। जब रूपेश रुककर पुलिस को फोन करने लगते हैं तो वही गाड़ी वापस आती है और उसमें से पांच लोग उतरकर गाली-गलौज करते हुए कहते हैं- “तू सरकार के खिलाफ बोलता है, तुझे पत्रकारिता हम सिखाएंगे” और मारपीट शुरू कर देते हैं। हमलावरों ने उनका फोन और पर्स छीन लिया तथा लगभग 10-15 मिनट तक पीटने के बाद उन्हें बेहोशी की हालत में छोड़ दिया।
प्रेरणा-अंशु ने बताया कि इसी दौरान पुलिस की दो गाड़ियां मौके पर पहुंच गईं, लेकिन हमलावरों को पकड़ने के बजाय रूपेश कुमार को गाड़ी में बैठाकर रुद्रपुर कोतवाली ले गईं। बोलेरो और हमलावरों को कोतवाली नहीं लाया गया। रात में ही उन्हें जिला अस्पताल ले जाया गया जहां सिर्फ फिजिकल मूवमेंट करवाकर एल्कोहल टेस्ट कराया गया। डॉक्टर रिपोर्ट में लिखा गया कि एल्कोहल की गंध आ रही है, लेकिन रूपेश कुमार किसी एल्कोहोलिक प्रभाव में नहीं हैं। बार-बार अनुरोध के बावजूद ब्लड सैंपल लेकर टेस्ट नहीं कराया गया।
आरोप लगाया गया है कि रात करीब तीन बजे एक युवक कोतवाली आया और कंप्यूटर से टाइप की हुई तहरीर देकर रिपोर्ट दर्ज कराने को कहा। इस तहरीर में दावा किया गया था कि रूपेश कुमार नशे में गाड़ी चलाते हुए बोलेरो को टक्कर मारी, भागने लगे तो पीछे से रोकने पर उन्होंने मारपीट की और कार से धारदार हथियार निकालकर एक नाबालिग युवक पर जानलेवा हमला कर दिया। पुलिस ने बिना कोई जांच किए बीएनएस की धारा 109 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया और कथित रूप से एक युवक का फर्जी मेडिकल भी तैयार करवा दिया, जबकि वह युवक घटना के दौरान मौजूद ही नहीं था।
प्रेरणा-अंशु ने बताया कि रात चार बजे के आसपास जब पुलिस रूपेश कुमार को कहीं और ले जाने लगी तो मौके पर मौजूद पत्रकारों और आम लोगों ने विरोध किया। लोगों के विरोध के बाद पुलिस को उन्हें वापस कोतवाली में बैठाना पड़ा। आरोप है कि पुलिस उन्हें ले जाकर फर्जी एनकाउंटर करने की तैयारी में थी।
इस बीच सोशल मीडिया पर घटना की खबर फैलने के बाद कई पत्रकार और गणमान्य लोग कोतवाली पहुंचे, लेकिन पुलिस ने किसी को भी रूपेश कुमार से मिलने की अनुमति नहीं दी। यहां तक कि वकीलों को भी रोका गया। 4 नवम्बर सुबह करीब 9 बजे रूपेश कुमार के सोशल मीडिया पेज ‘अनसुनी आवाज’ को भारत में बैन कर दिया गया।
4 नवम्बर दोपहर 12 बजे के आसपास पुलिस उन्हें न्यायालय में पेश किया। सीजेएम जयेन्द्र सिंह के समक्ष अधिवक्ताओं ने पुलिसिया कहानी के तार खोल दिए। सबूतों के अभाव और पुलिस अधिकारियों के बयानों के आधार पर सीजेएम ने धारा 109 हटा दी और रूपेश कुमार को जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए।
अनसुनी आवाज की टीम ने आरोप लगाया गया है कि इस पूरे प्रकरण का तात्कालिक कारण 3 नवम्बर को हुई मुख्यमंत्री धामी की ‘अराजकता हटाओ, लोकतंत्र बचाओ’ रैली की रिपोर्टिंग थी। रैली में भीड़ नदारद थी और आधी से ज्यादा कुर्सियां खाली थीं। रूपेश कुमार की टीम ने इस समाचार और वीडियो को ‘अनसुनी आवाज’ पर दिखाया। इसके बाद स्थानीय भाजपा नेताओं के दबाव में शाम तक खबर को आईटी नियमों का हवाला देकर प्रतिबंधित करा दिया गया। इसी पर रूपेश कुमार ने रात करीब 9 बजे लाइव किया और सवाल उठाया कि सच दिखाने से सरकार को डर क्यों लग रहा है। यही लाइव कुछ स्थानीय नेताओं को नागवार गुजरा और उनके इशारे पर पुलिस पर दबाव डालकर पूरा घटनाक्रम रचा गया।
अनसुनी आवाज की टीम ने सभी इंसाफ पसंद नागरिकों से आग्रह किया गया है कि इस मामले का संज्ञान लें और पत्रकार रूपेश कुमार के साथ हुई घटना की न्यायिक जांच कराने तथा दोषियों को सजा दिलाने की मुहिम में शामिल हों।
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