
झारखंड/रांची: झारखंड में जल, जंगल, जमीन और आदिवासी अस्मिता के लिए मुखर रहने वाली आवाज अब हमेशा के लिए खामोश हो गई है। केंद्रीय सरना समिति की पूर्व पदाधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता निशा कुमारी भगत ने 6 नवंबर को रांची स्थित अपने आवास पर कथित तौर पर फांसी लगाकर ख़ुदकुशी कर ली। मौत से ठीक पहले किए गए फेसबुक लाइव ने पूरे राज्य को झकझोर दिया है। इस 11 मिनट के वीडियो में उन्होंने हेमंत सोरेन सरकार, पुलिस प्रशासन और जमीन माफिया पर प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए।
महज 37-38 वर्ष की उम्र में निशा का यूं चले जाना सिर्फ एक आत्महत्या नहीं, बल्कि उस क्रूर सिस्टम की पोल खोलता है जो हाशिए के लोगों के लिए लड़ने वालों को अंदर से तोड़ देता है। निशा को रिम्स में मृत घोषित किया गया। पुलिस ने अस्वाभाविक मौत का मामला दर्ज किया है, लेकिन परिवार और विपक्ष अब सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं।
पिता की विरासत और संघर्ष का सफर
मूल रूप से गुमला जिले के रायडीह प्रखंड की रहने वाली निशा का जीवन संघर्षों की भट्टी में तपा था। उनके पिता हांडू भगत झारखंड आंदोलन के कद्दावर नेता और पूर्व जिला परिषद सदस्य रहे हैं। आंदोलन के दिनों में पिता को लंबी जेल की सजा भी काटनी पड़ी। परिवार शुरू से ही घर जलाए जाने और जानलेवा हमलों का दंश झेलता रहा है। इन्ही हालातों ने तीन भाई-बहनों में इकलौती निशा के भीतर आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने का जज्बा पैदा किया।
निशा की शुरुआती पढ़ाई गुमला के उर्सलाइन कॉन्वेंट और फिर कार्तिक उरांव कॉलेज से हुई। निशा ने दुर्गापुर से होटल मैनेजमेंट किया और बेंगलुरु के आईटीसी में नौकरी भी की। लेकिन माटी की पुकार उन्हें वापस ले आई। उन्होंने नौकरी छोड़ी और बड़े भाई के साथ सरकारी ठेकेदारी (निर्माण कार्य) में हाथ बंटाने के साथ-साथ 15 साल की उम्र से ही सामाजिक मुद्दों पर खुद को झोंक दिया।
सड़कों से लेकर सियासत तक की लड़ाई
निशा कुड़ुख भाषा की बेहतरीन जानकार थीं और उनका अपनी संस्कृति से गहरा लगाव था। सरना धर्म कोड, पेसा कानून, सीएनटी-एसपीटी एक्ट और धर्मांतरण के खिलाफ वे एक मजबूत आवाज थीं। जुलाई 2025 में उन्होंने पेसा कानून लागू करने के लिए गुमला से राजभवन तक 40 किलोमीटर की पदयात्रा की थी। दिसंबर 2025 में सरना कोड की मांग को लेकर राजभवन के सामने बाल मुंडवाकर उन्होंने पूरे देश का ध्यान खींचा था।
साल 2024 के विधानसभा चुनाव में निशा ने गुमला सीट से जेएलकेएम (JLKM) के टिकट पर चुनाव लड़ा था। हालांकि उन्हें हार मिली, लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा। बाद में वे स्वतंत्र रूप से काम करने लगीं। सार्वजनिक मंचों पर वे बेहद आक्रामक दिखती थीं, लेकिन करीबियों के मुताबिक निजी जीवन में वे बहुत भावुक और संवेदनशील थीं।
द मूकनायक की पड़ताल: क्या है मौत की असल वजह?
निशा की मौत के बाद द मूकनायक ने झारखंड की प्रमुख आदिवासी एक्टिविस्ट अगस्टीना सोरेन से विस्तृत बातचीत की। इस बातचीत में आदिवासी महिला नेतृत्व के पीछे छिपे दर्द और राजनीतिक साजिशों के कई भयानक सच सामने आए।
अगस्टीना सोरेन ने बताया कि निशा गुमला जिले के एक ब्लॉक में 20 एकड़ आदिवासी जमीन को दलालों से बचाने की लड़ाई लड़ रही थीं। जमीन माफिया ने रैयतों से वादे किए थे, लेकिन बाद में मुकर गए। निशा ने जब इस भ्रष्टाचार को उजागर किया, तो उन पर सिस्टम का भारी दबाव पड़ने लगा।
अकेलेपन और दबाव ने तोड़ दिया हौसला
अगस्टीना के मुताबिक, ऐसे चुनौतीपूर्ण मामलों में नेताओं, विधायकों और पुलिस अफसरों के धमकी भरे फोन आना आम बात है। निशा के साथ भी यही हुआ। पुलिस से उन्हें कोई मदद नहीं मिली। फेसबुक लाइव में निशा का दर्द छलक कर सामने आया कि प्रशासन जानबूझकर उन्हें मरने के लिए मजबूर कर रहा है।
इस लड़ाई में निशा बिल्कुल अकेली पड़ गई थीं। अगस्टीना ने बताया कि जो लोग, नेता या पार्टियां ऐसे मुद्दे उठाते हैं, वे विवाद बढ़ने पर मुखर महिलाओं को आगे कर खुद पीछे हट जाते हैं। निशा को भी मोहरा बनाया गया। BJP, RSS के लोगों ने उसे मुद्दे दिए बोलने के लिए, लेकिन जब उनके सहयोग की जरुरत पड़ी तो कोई सामने नहीं आया, सबने सिर्फ उसका इस्तेमाल किया। उनके सनातनी विचारधारा की तरफ झुकाव के कारण कई पुराने एक्टिविस्ट साथियों ने भी उनसे दूरी बना ली थी।
भीतर से टूट चुकी थी वह 'आयरन लेडी'
निशा हमेशा खुद को एक 'मजबूत महिला' के रूप में पेश करती थीं। वे अपनी निजी परेशानियां, आर्थिक नुकसान और संघर्ष यहां तक कि अपने दोस्तों से भी साझा नहीं करती थीं। अगस्टीना ने खुलासा किया कि निशा का बॉयफ्रेंड इस वक्त जेल में है। ऐसे में जिस भावनात्मक संबल और सहारे की जरूरत एक इंसान को होती है, वह निशा को नहीं मिल सका।
मजबूत दिखने की यही जिद और सिस्टम के लगातार प्रहार ने उन्हें अंदर से तोड़ कर दिया। जब फेसबुक लाइव पर वह अपनी तकलीफ चीख-चीख कर बता रही थीं, तब भी समय पर कोई उनकी मदद के लिए नहीं पहुंचा।
आदिवासी नेत्रियों में खौफ और सवाल
निशा के अंतिम संस्कार के लिए उनके पैतृक गांव रायडीह में लोगों की भीड़ जुटी है। लेकिन इस घटना ने झारखंड की महिला एक्टिविस्टों को डरा दिया है। अगस्टीना मानती हैं कि यह घटना दिखाती है कि जब कोई महिला लीडरशिप लेती है, तो उसके मेंटल हेल्थ या दर्द को पूछने वाला कोई नहीं होता।
निशा कुमारी भगत अब हमारे बीच नहीं हैं। उनका जीवन आदिवासी महिलाओं के साहस का प्रतीक था, लेकिन उनकी मौत इस बात का प्रमाण है कि भ्रष्ट तंत्र, जमीन माफिया और अपनों का बेगानापन कैसे एक निस्वार्थ नेता की जान ले लेता है। सत्ता और विपक्ष अब उनकी मौत पर राजनीति कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि जब निशा जिंदा रहकर लड़ रही थीं, तब यह पूरा सिस्टम कहां सोया हुआ था?
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