SC/ST में ‘क्रीमी लेयर’ लागू करने को लेकर केंद्र का विरोध, कहा- आरक्षण का आधार सिर्फ आर्थिक स्थिति नहीं | सुप्रीम कोर्ट में दी ये दलीलें

आरक्षण के भीतर आय के आधार पर प्राथमिकता की मांग पर केंद्र का विरोध
याचिकाकर्ताओं की दलील है कि आरक्षित वर्गों के भीतर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को प्राथमिकता मिलने से आरक्षण का लाभ अधिक व्यापक रूप से वितरित किया जा सकता है। दूसरी ओर, केंद्र का तर्क है कि SC और ST जैसे संवैधानिक वर्गों की पहचान और उनके लिए आरक्षण का आधार केवल आर्थिक पिछड़ापन नहीं है।
याचिकाकर्ताओं की दलील है कि आरक्षित वर्गों के भीतर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को प्राथमिकता मिलने से आरक्षण का लाभ अधिक व्यापक रूप से वितरित किया जा सकता है। दूसरी ओर, केंद्र का तर्क है कि SC और ST जैसे संवैधानिक वर्गों की पहचान और उनके लिए आरक्षण का आधार केवल आर्थिक पिछड़ापन नहीं है।
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नई दिल्ली- सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के लाभ को अधिक समान रूप से वितरित करने के लिए अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के भीतर आय के आधार पर प्राथमिकता या सब-कोटा तय करने की मांग वाली याचिका का केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विरोध किया है। केंद्र का कहना है कि इन आरक्षण व्यवस्थाओं का आधार केवल आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है।

केंद्र ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाबी हलफनामे में कहा कि याचिकाकर्ता जिस तरह की आरक्षण नीति लागू कराने की मांग कर रहे हैं, वह मूल रूप से नीतिगत मामला है। कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आने वाली ऐसी नीति तैयार करने के लिए अदालत द्वारा सरकार को आदेश नहीं दिया जा सकता।

मामला Ramashankar Prajapati & Anr. v. Union of India & Ors., W.P.(C) No. 682/2025 से संबंधित है।

याचिका में क्या मांग की गई है?

याचिकाकर्ताओं ने केंद्र सरकार को आरक्षण व्यवस्था में ऐसे बदलाव करने का निर्देश देने की मांग की है, जिससे आरक्षित वर्गों के भीतर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आरक्षण का लाभ प्राथमिकता के आधार पर मिल सके।

याचिका में SC, ST, OBC और EWS श्रेणियों के भीतर आय आधारित प्राथमिकता लागू करने तथा उप-वर्गीकरण की व्यवस्था विकसित करने की मांग की गई है। इसका उद्देश्य, याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का लाभ अपेक्षाकृत कमजोर आर्थिक स्थिति वाले लोगों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचे।

केंद्र ने अपने जवाब में संविधान के अनुच्छेद 341, 342 और 342A का हवाला देते हुए कहा कि SC, ST और सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की संवैधानिक पहचान केवल आय या आर्थिक स्थिति के आधार पर तय नहीं होती।

सरकार के अनुसार, अनुसूचित जातियों की सामाजिक स्थिति को ऐतिहासिक रूप से अस्पृश्यता और उससे जुड़े भेदभाव ने प्रभावित किया है। वहीं, अनुसूचित जनजातियों के संदर्भ में उनकी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान, भौगोलिक अलगाव और ऐतिहासिक पिछड़ापन महत्वपूर्ण कारक रहे हैं।

इसी तरह सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान में सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन, आर्थिक स्थिति तथा सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व जैसे विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है।

केंद्र ने कहा कि इन वर्गों की पहचान की प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों, विभिन्न आयोगों और संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के जरिए विकसित हुई है। सरकार ने विशेष रूप से काका कालेलकर आयोग और मंडल आयोग की भूमिका का उल्लेख किया।

याचिकाकर्ताओं की दलील है कि आरक्षित वर्गों के भीतर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को प्राथमिकता मिलने से आरक्षण का लाभ अधिक व्यापक रूप से वितरित किया जा सकता है। दूसरी ओर, केंद्र का तर्क है कि SC और ST जैसे संवैधानिक वर्गों की पहचान और उनके लिए आरक्षण का आधार केवल आर्थिक पिछड़ापन नहीं है।
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SC/ST पर 'क्रीमी लेयर' लागू करने का भी विरोध

केंद्र ने अपने हलफनामे में यह भी स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत OBC आरक्षण के संदर्भ में विकसित हुआ है और इसे SC/ST आरक्षण पर स्वतः लागू नहीं किया जा सकता।

सरकार ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का उल्लेख किया है, जिनमें Indra Sawhney, E.V. Chinnaiah, M. Nagaraj और Ashoka Kumar Thakur प्रमुख हैं।

केंद्र के अनुसार, Indra Sawhney मामले में क्रीमी लेयर की अवधारणा मुख्य रूप से OBC आरक्षण के संदर्भ में विकसित हुई थी। सरकार ने अदालत के उस दृष्टिकोण का हवाला दिया जिसके मुताबिक केवल आर्थिक रूप से आगे बढ़ जाने को सामाजिक पिछड़ेपन से जोड़कर आरक्षण से बाहर करना उचित नहीं माना जा सकता।

केंद्र ने E.V. Chinnaiah फैसले का हवाला देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 341(2) के तहत अनुसूचित जातियों की सूची में बदलाव करने का अधिकार संसद के पास है। इसलिए किसी व्यक्ति या समूह को SC सूची से बाहर करने अथवा उसमें बदलाव करने का काम न्यायिक आदेश या कार्यपालिका की कार्रवाई के जरिए नहीं किया जा सकता।

सरकार ने यह भी कहा कि M. Nagaraj के फैसले को SC/ST पर क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू करने के आधार के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। वहीं, Ashoka Kumar Thakur में भी क्रीमी लेयर की अवधारणा को OBC आरक्षण के संदर्भ में ही देखा गया था।

कल्याणकारी योजनाओं में पहले से लागू है आय आधारित जांच

केंद्र ने यह तर्क भी दिया कि SC, ST और OBC समुदायों के लिए चलने वाली कई कल्याणकारी योजनाओं में पहले से ही आर्थिक या आय आधारित पात्रता मानदंड मौजूद हैं।

हालांकि, सरकार के अनुसार शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण को उसी तरह की आय-आधारित व्यवस्था से जोड़ना अलग विषय है। यदि आरक्षित वर्गों के भीतर आय के आधार पर प्राथमिकता तय करनी है, तो इसके लिए व्यापक सामाजिक-आर्थिक अध्ययन और विश्वसनीय आंकड़ों की आवश्यकता होगी।

केंद्र ने कहा कि आरक्षण पाने वाले लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, उनके प्रतिनिधित्व और आरक्षण के वास्तविक वितरण का विस्तृत अनुभवजन्य अध्ययन किए बिना ऐसी व्यवस्था लागू करना उचित नहीं होगा।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका खारिज करने का आग्रह किया है। उसका कहना है कि याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत किसी स्पष्ट रूप से लागू किए जा सकने वाले मौलिक अधिकार के उल्लंघन का मामला स्थापित नहीं करती।

सरकार के मुताबिक, याचिका का वास्तविक उद्देश्य अदालत से केंद्र सरकार को एक विशेष तरीके की आरक्षण नीति बनाने का निर्देश दिलाना है। ऐसा निर्देश रिट ऑफ मैंडमस के जरिए नहीं दिया जा सकता, क्योंकि नीति निर्माण कार्यपालिका के क्षेत्र में आता है।

इसी आधार पर केंद्र ने याचिका को 'misconceived' यानी गलत अवधारणा पर आधारित बताते हुए इसे लागत के साथ खारिज करने की मांग की है।

इस मामले ने आरक्षण के लाभों के भीतर समान वितरण और आरक्षित वर्गों के बीच अपेक्षाकृत वंचित समूहों तक लाभ पहुंचाने की बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।

याचिकाकर्ताओं की दलील है कि आरक्षित वर्गों के भीतर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को प्राथमिकता मिलने से आरक्षण का लाभ अधिक व्यापक रूप से वितरित किया जा सकता है। दूसरी ओर, केंद्र का तर्क है कि SC और ST जैसे संवैधानिक वर्गों की पहचान और उनके लिए आरक्षण का आधार केवल आर्थिक पिछड़ापन नहीं है।

इसलिए आय आधारित उप-कोटा या क्रीमी लेयर जैसे प्रावधानों को लागू करने का सवाल केवल आर्थिक स्थिति का विषय नहीं, बल्कि संविधान में आरक्षण की संरचना, सामाजिक पिछड़ेपन की अवधारणा और संसद तथा कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र से भी जुड़ा हुआ है।

याचिकाकर्ताओं की दलील है कि आरक्षित वर्गों के भीतर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को प्राथमिकता मिलने से आरक्षण का लाभ अधिक व्यापक रूप से वितरित किया जा सकता है। दूसरी ओर, केंद्र का तर्क है कि SC और ST जैसे संवैधानिक वर्गों की पहचान और उनके लिए आरक्षण का आधार केवल आर्थिक पिछड़ापन नहीं है।
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