TM Exclusive | आरक्षण खत्म करना नामुमकिन क्यों? IRS अधिकारी नेत्रपाल ने बताया संवैधानिक और गणितीय सच

शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण पर संविधान में कोई ऊपरी समय सीमा तय नहीं की गई है। ये व्यवस्थाएं स्थायी हैं।
आरक्षण को खत्म करना लगभग नामुमकिन है।
आरक्षण को खत्म करना लगभग नामुमकिन है।
Published on

देश में आरक्षण को लेकर फिर से बहस छिड़ गई है। सोशल मीडिया पर ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ जैसे अभियान तेजी से फैल रहे हैं और आरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे में भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी एम.एस. नेत्रपाल ने एक महत्वपूर्ण विश्लेषण पेश किया है। उन्होंने साफ कहा है कि आरक्षण को खत्म करना लगभग नामुमकिन है। नेत्रपाल ने आईआईटी मद्रास से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बी-टेक और आईआईएम बैंगलोर से वित्त और अर्थशास्त्र में पीजीडीएम की पढ़ाई की है।

द मूकनायक के साथ विशेष चर्चा में नेत्रपाल कहते हैं कि भारत में आरक्षण का मकसद कभी भी कोई अस्थायी कल्याणकारी योजना नहीं था, बल्कि इसका उद्देश्य ऐतिहासिक सामाजिक-आर्थिक भेदभाव को संरचनात्मक रूप से ठीक करना था। आबादी की असलियत और विधायी प्रतिनिधित्व के बीच के अंतर को पाटने के लिए पुरानी गलत धारणाओं से आगे बढ़ना ज़रूरी है। OBC के लिए संसद में 27% आरक्षण को संस्थागत बनाना और सभी वर्गों के लिए आय के मानदंडों को तर्कसंगत बनाना, समान शासन और स्थायी सामाजिक न्याय के संवैधानिक वादे को पूरा करने की दिशा में ज़रूरी कदम हैं।

एससी, एसटी और ओबीसी के लिए तीन तरह के आरक्षण हैं: राजनीतिक (विधायक-सांसद), शैक्षणिक संस्थानों में और सरकारी नौकरियों में। समय सीमा बढ़ाने का प्रावधान सिर्फ राजनीतिक आरक्षण के लिए आर्टिकल 334 के तहत है। मूल रूप से यह 10 साल के लिए था, जिसे समय-समय पर बढ़ाया गया। 95वें संविधान संशोधन से इसे 70 साल कर दिया गया और 104वें संशोधन से एससी-एसटी के लिए 80 साल (2030 तक) कर दिया गया।

वहीं, शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण पर संविधान में कोई ऊपरी समय सीमा तय नहीं की गई है। ये व्यवस्थाएं स्थायी हैं। इसलिए इन्हें समाप्त करना संवैधानिक रूप से बहुत कठिन है।

इसके अतिरिक्त, प्रारंभिक यह धारणा कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की आबादी क्रमशः केवल 15 प्रतिशत और 7.5 प्रतिशत है, व्यवस्थित रूप से कम आंकी गई थी। विशेष रूप से धर्मांतरित समुदायों की गणना में हुई कमी के कारण दलित और आदिवासी आबादी की संयुक्त हिस्सेदारी वास्तविकता में लगभग 30 से 35 प्रतिशत के करीब रही।

राजनीतिक आरक्षण खत्म करने का गणित

नेत्रपाल के अनुसार, किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए लोकसभा में 2/3 बहुमत यानी लगभग 361 वोटों की जरूरत होती है (कुल 543 सीटों में से)। उनके विश्लेषण के मुताबिक, वर्तमान में एससी + एसटी + ओबीसी सांसदों की संख्या ऊपरी जातियों के सांसदों से अधिक है। ऐसे में आरक्षण खत्म करने वाला संशोधन पास कराना गणितीय रूप से लगभग असंभव है।

ओबीसी के लिए राजनीतिक आरक्षण क्यों जरूरी?

नेत्रपाल जोर देते हैं कि संसद में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत अनिवार्य आरक्षण लागू किया जाना चाहिए। इससे हर 100 सांसदों में से जनरल और एससी-एसटी-ओबीसी का प्रतिनिधित्व लगभग बराबर (50-50) हो जाएगा। एक बार यह हो जाने के बाद राजनीतिक आरक्षण को खत्म करने के लिए 2/3 बहुमत हासिल करना और भी नामुमकिन हो जाएगा।

उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल इस मुद्दे को गंभीरता से उठाएं और संसद में ओबीसी के लिए अनिवार्य 27 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करें, ताकि एससी + एसटी + ओबीसी का कम से कम 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व पक्का हो सके।

सकारात्मक भेदभाव (Affirmative Action) की व्यवस्था को किसी भी मनमाने ढंग से कमजोर किए जाने के विरुद्ध अंतिम सुरक्षा राजनीतिक प्रतिनिधित्व में निहित है। वर्तमान में अनुच्छेद 334 के तहत संसद (लोकसभा) और राज्य विधानसभाओं में राजनीतिक प्रतिनिधित्व (सांसदों और विधायकों) के लिए आरक्षण केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए लागू है। अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए लोकसभा या राज्य विधानसभाओं में कोई सुनिश्चित आरक्षण उपलब्ध नहीं है।

संविधान में आरक्षण संबंधी प्रावधानों में संशोधन या परिवर्तन करने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत (लोकसभा में 542 में से 361 सदस्यों) की आवश्यकता होती है। यद्यपि SC, ST और OBC समुदायों से आने वाले सांसदों की संख्या पहले से ही उल्लेखनीय है, लेकिन नेत्रपाल का तर्क है कि विधायिका की सामाजिक संरचना की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट संवैधानिक व्यवस्था आवश्यक है।

नेत्रपाल के अनुसार, यदि संसद और राज्य विधानसभाओं में OBC के लिए 27 प्रतिशत राजनीतिक आरक्षण प्रदान किया जाए, तो इससे सामाजिक और वंचित समुदायों के लिए न्यूनतम 50 प्रतिशत सुनिश्चित प्रतिनिधित्व संस्थागत रूप से स्थापित किया जा सकेगा।

नेत्रपाल का मत है कि ऐसी संतुलित विधायी संरचना के अंतर्गत, संविधान में निहित आरक्षण संबंधी मूल प्रावधानों को दो-तिहाई बहुमत से बदलना व्यापक अंतर-समुदायिक सहमति (Broad Cross-Community Consensus) के बिना गणितीय रूप से लगभग असंभव हो जाएगा।

आरक्षण को खत्म करना लगभग नामुमकिन है।
TM Special | CJP प्रोटेस्ट के बाद अब सोशल मीडिया पर आरक्षण हटाओ मुहिम: आठवले ने कहा ‘राष्ट्रद्रोह’, क्या कहते हैं बहुजन चिंतक ?
आरक्षण को खत्म करना लगभग नामुमकिन है।
आरक्षण हटाने को लेकर अटकलें: केन्द्रीय मंत्री अठावले ने कहा- बाबासाहेब का दिया हुआ अधिकार पूरी तरह सुरक्षित! सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अल्टीमेटम

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

द मूकनायक की मदद करें

‘द मूकनायक’ जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है. अगर आप भी चाहते हैं कि ‘द मूकनायक’ हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहे तो सपोर्ट करें.

यहां सपोर्ट करें
The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com