
दिल्ली- गुजरात पुलिस के राज्य खुफिया ब्यूरो की कथित Anti-Radicalisation Standard Operating Procedure (SOP) को लेकर नया संवैधानिक और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। केरल के राज्यसभा सदस्य जॉन ब्रिटास ने गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को एक पत्र लिखकर इसपर पर गहरी चिंता व्यक्त की है। यह SOP 1 जून को जारी होने की बात कही जा रही है, जिसके तहत राज्य भर में कट्टरपंथ-विरोधी सेल का गठन किया गया है।
ब्रिटास ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि वह इसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सकते, लेकिन मीडिया रिपोर्टों और सार्वजनिक डोमेन में सामने आए कथित अंश इतने गंभीर हैं कि वे मुख्यमंत्री के तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हैं। उन्होंने लिखा कि यदि रिपोर्टों में वर्णित SOP वास्तविक है, तो इससे संविधान के मूल अधिकारों से जुड़े गंभीर प्रश्न उत्पन्न होते हैं।
ब्रिटास ने अपने पत्र में स्वीकार किया कि आतंकवाद, हिंसक उग्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बनने वाली गतिविधियों की रोकथाम राज्य की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है तथा प्रभावी खुफिया तंत्र की आवश्यकता पर कोई मतभेद नहीं हो सकता। हालांकि उन्होंने कहा कि ऐसी सभी कार्रवाइयों को संविधान, विधि के शासन और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सीमाओं के भीतर रहकर ही संचालित किया जाना चाहिए।
पत्र में उन्होंने उन मीडिया रिपोर्टों का उल्लेख किया जिनमें दावा किया गया है कि कथित SOP में "रैडिकल व्यक्ति" की पहचान के लिए कुछ व्यवहारिक संकेतकों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्टों के अनुसार इनमें अचानक दाढ़ी रखना, नकाब पहनना, सामान्य बातचीत में अरबी शब्दों का प्रयोग करना, दुनिया में कहीं भी मुसलमानों से जुड़ी घटनाओं पर तीखी प्रतिक्रिया देना, धार्मिक कारणों से शिक्षा या रोजगार छोड़ देना, धार्मिक नेताओं से लगातार मिलना तथा "संवेदनशील" चिह्नित मस्जिदों और मदरसों में जाना जैसे संकेत शामिल बताए गए हैं। ब्रिटास ने कहा कि यदि वास्तव में ऐसे प्रावधान SOP का हिस्सा हैं, तो इससे सामान्य धार्मिक पहचान और संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक आचरण को पुलिस संदेह का आधार बनाए जाने का खतरा पैदा होता है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार SOP में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन फोरम, मैसेजिंग एप और एन्क्रिप्टेड संचार माध्यमों की निगरानी, व्यक्तियों की प्रोफाइलिंग, डोजियर तैयार करने, सामुदायिक नेटवर्क का मानचित्रण तथा धार्मिक संस्थानों और शिक्षकों की प्रोफाइलिंग जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख है। ब्रिटास ने कहा कि कानून प्रवर्तन एजेंसियां विश्वसनीय सूचना के आधार पर गैरकानूनी गतिविधियों की निगरानी कर सकती हैं, लेकिन यदि किसी व्यक्ति की निगरानी या प्रोफाइलिंग का आधार उसका धर्म, पहनावा, भाषा, धार्मिक पहचान या धार्मिक आचरण बनता है, तो यह समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, गरिमा और निजता जैसे संवैधानिक अधिकारों से जुड़े गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।
अपने पत्र में उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आतंकवादी संगठनों से जुड़े ठोस संकेत, जैसे प्रतिबंधित संगठनों से संबंधित सामग्री रखना या उसका प्रसार करना, विस्फोटक सामग्री तैयार करने के लिए आवश्यक पदार्थ जुटाना अथवा आतंकवादी नेटवर्क से प्रमाणित संबंध और दूसरी ओर सामान्य धार्मिक या सांस्कृतिक गतिविधियों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना आवश्यक है। उनके अनुसार दोनों को एक समान मानना संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 25 और 26 के तहत प्राप्त अधिकारों के विपरीत हो सकता है।
ब्रिटास ने कहा कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था इस सिद्धांत पर आधारित है कि किसी नागरिक के विरुद्ध कार्रवाई उसके धर्म, पहनावे, भाषा, सांस्कृतिक पहचान या धार्मिक प्रथाओं के आधार पर नहीं बल्कि विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए। उन्होंने लिखा कि यदि कोई संस्थागत व्यवस्था किसी विशेष समुदाय की सामूहिक प्रोफाइलिंग का आभास देती है, तो इससे कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उनके अनुसार प्रभावी खुफिया व्यवस्था नागरिकों और पुलिस के बीच विश्वास पर आधारित होती है तथा किसी समुदाय को कलंकित करने वाली नीतियां इस विश्वास को कमजोर कर सकती हैं।
इन्हीं चिंताओं के आधार पर सांसद ने मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल से अनुरोध किया है कि यदि रिपोर्टों में वर्णित SOP वास्तव में लागू है, तो उसकी समीक्षा पूरी होने तक उसके क्रियान्वयन को स्थगित किया जाए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि SOP की समीक्षा संवैधानिक विशेषज्ञों, वरिष्ठ विधि विशेषज्ञों और अनुभवी पुलिस अधिकारियों की एक स्वतंत्र समिति से कराई जाए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इसके सभी प्रावधान भारतीय संविधान के अनुरूप हों। साथ ही उन्होंने कहा कि जिन प्रावधानों से धर्म, धार्मिक पहचान, भाषा, पहनावे या अन्य संवैधानिक रूप से संरक्षित विशेषताओं के आधार पर प्रोफाइलिंग या भेदभाव की आशंका पैदा होती है, उन्हें हटाया या संशोधित किया जाना चाहिए।
पत्र साझा करते हुए जॉन ब्रिटास ने सार्वजनिक रूप से भी कहा कि यदि गुजरात राज्य खुफिया ब्यूरो के कथित Anti-Radicalisation SOP संबंधी रिपोर्टें सही हैं, तो उनके निहितार्थ बेहद चिंताजनक हैं। उन्होंने कहा कि सामान्य धार्मिक प्रथाएं कभी भी पुलिस संदेह का आधार नहीं बन सकतीं। उनके अनुसार आतंकवाद विरोधी कार्रवाई आस्था के आधार पर नहीं बल्कि साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान किसी नागरिक के धर्म के आधार पर संदेह की अनुमति नहीं देता और इसी कारण उन्होंने मुख्यमंत्री से ऐसे किसी भी प्रावधान की समीक्षा कर उसे संविधान के अनुरूप बनाने का आग्रह किया है।
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