
बेंगलुरू- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खरगे द्वारा संगठन के कानूनी दर्जे, रजिस्ट्रेशन, पदाधिकारियों, फंडिंग, व्यय, कराधान और सार्वजनिक गतिविधियों की अनुमतियों के बारे में लिखे गए एक खुले पत्र पर जवाब देने से मना कर दिया है।
भागवत ने इस मांग को पूरी तरह राजनीतिक बताते हुए कहा कि यह सिर्फ राजनीति है। आरएसएस शताब्दी वर्ष के आउटरीच कार्यक्रम के दौरान भागवत ने कहा, “यह सिर्फ राजनीति है… ये सब गिमिक किए जा रहे हैं। हम इसके आदी हैं। अगर ये नहीं होते तो हमें लगता है कि कुछ कमी रह गई है।”
भागवत ने संघ की कार्यशैली पर जोर देते हुए कहा कि आरएसएस कोई गुप्त संगठन नहीं है। “हम गोपनीय नहीं हैं। हम खुले मैदानों में काम करते हैं। हम लोगों को बुलाते हैं और उन्हें बताते हैं कि हम क्या करते हैं।" उन्होंने संघ के कानूनी दर्जे का बचाव करते हुए बताया कि कई चीजों के लिए रजिस्ट्रेशन की जरूरत नहीं होती। “बहुत सी अनरजिस्टर्ड चीजें चल रही हैं… हिंदू धर्म रजिस्टर्ड नहीं है, कई चीजें रजिस्टर्ड नहीं हैं।"आरएसएस सरसंघचालक ने स्पष्ट किया कि जो संगठन सरकारी फंडिंग लेते हैं, उन्हें रजिस्ट्रेशन की जरूरत पड़ती है, लेकिन संघ ऐसा कोई फंडिंग नहीं लेता।
“सरकार को पता है कि हम हैं। हम पर दो बार प्रतिबंध लगा था और दोनों बार उसे हटा दिया गया। इससे खुद साबित होता है कि सरकार को आरएसएस के अस्तित्व की जानकारी थी,” भागवत ने कहा। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि संघ की स्थापना 1925 में ब्रिटिश काल में हुई थी, जब औपनिवेशिक कानूनों के तहत रजिस्ट्रेशन संभव नहीं था। बाद में 1950 के दशक में संघ ने अपनी लिखित संविधान सरकार को सौंप दिया था। उन्होंने कहा, “100 साल से ज्यादा समय बीत गया, किसी ने हमें नहीं कहा कि आपको रजिस्ट्रेशन कराना चाहिए।"
भागवत ने आगे बताया कि अदालतें और टैक्स अथॉरिटीज संघ को “व्यक्तियों के समूह” (body of individuals) के रूप में मानती हैं और उसे इनकम टैक्स छूट प्रदान करती हैं। उन्होंने संघ की गतिविधियों की पारदर्शिता पर जोर देते हुए कहा कि शाखाएं खुले स्थानों पर लगती हैं और स्वयंसेवक पूरे देश में सामुदायिक कार्यों में सक्रिय रहते हैं।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खरगे ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को एक खुला पत्र लिखा। खरगे ने पत्र में संघ की कर्नाटक में गतिविधियों का जिक्र करते हुए कहा कि 2025-26 के वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 4,127 दैनिक शाखाएं, 1,389 साप्ताहिक मिलन और 60 मासिक मंडलियां चल रही हैं। इसके अलावा 2,194 समाजोत्सवों में करीब 19,61,158 लोग शामिल हुए और 562 रूट मार्च निकाले गए, जिनमें 2,21,963 वर्दीधारी स्वयंसेवक शामिल थे। उन्होंने कहा कि इतने बड़े पैमाने पर संगठित गतिविधियां, जन-मोबिलाइजेशन, वर्दीधारी मार्च और सामाजिक कार्यक्रम निजी या अनौपचारिक व्यवस्था नहीं माने जा सकते।
प्रियंक खरगे ने मांग की कि आरएसएस अपने अधिकृत पदाधिकारियों को भेजकर निम्नलिखित जानकारी सार्वजनिक करे:
कानूनी स्थिति और संगठनात्मक ढांचा,
पदाधिकारियों और अधिकृत प्रतिनिधियों का विवरण,
दान, योगदान और आय के स्रोत,
व्यय और संपत्तियों का विवरण,
लागू करों का भुगतान,
बिना रजिस्ट्रेशन के कार्य करने का कानूनी आधार,
संवैधानिक और वैधानिक ढांचा,
सार्वजनिक कार्यक्रमों, रूट मार्च और सभाओं के लिए अनुमतियां व अनुपालन।
खरगे ने लिखा कि कोई भी संगठन, चाहे वह कितना भी पुराना, बड़ा या प्रभावशाली हो, जांच से ऊपर नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि एनजीओ, कंपनियां, धार्मिक संस्थाएं और अन्य संघर्षों को रजिस्ट्रेशन और वित्तीय विवरण जमा करने पड़ते हैं, तो आरएसएस को भी इससे मुक्त नहीं रखा जाना चाहिए।
भागवत ने कहा कि ऐसे दावे लोगों के मन में भ्रम पैदा करने के लिए किए जा रहे हैं। “वे संघ के काम में बाधा डालना चाहते हैं और लोगों के मन में संदेह पैदा करना चाहते हैं। लेकिन अब यह संभव नहीं क्योंकि लोग हमें जानते हैं।" उन्होंने जोर देकर कहा कि आरएसएस के कार्यकर्ता हर मोहल्ले में दिखते हैं और संगठन स्वैच्छिक भागीदारी तथा दान पर चलता है।
केंद्रीय सरकार ने विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के तहत कई गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की रजिस्ट्रेशन रद्द कर दी थी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2016-17 से 2021-22 के बीच 6,600 से अधिक NGOs की FCRA लाइसेंस रद्द की गईं, जबकि पिछले एक दशक में कुल 20,000 से ज्यादा (लगभग 20,673-20,711) NGOs की रजिस्ट्रेशन रद्द या समाप्त हो चुकी है।
मुख्य कारणों में वार्षिक रिटर्न न जमा करना, फंड्स के दुरुपयोग, अनुपालन की कमी, या राष्ट्रीय हित के विरुद्ध गतिविधियां शामिल हैं। वहीं आरएसएस के कुछ सहयोगी संगठनों (जैसे सेवा भारती) को FCRA अनुमति मिली हुई है, लेकिन RSS मुख्य इकाई रजिस्टर्ड नहीं है।
आरएसएस के शताब्दी वर्ष में यह विवाद संगठन की पारदर्शिता को लेकर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। मोहन भागवत के बयान से साफ है कि संघ इस मसले पर कोई औपचारिक जवाब देने या चर्चा में शामिल होने का इरादा नहीं रखता। वहीं, विपक्षी दलों के नेताओं का कहना है कि बड़े पैमाने पर काम करने वाले किसी भी संगठन को कानूनी जवाबदेही से बचना नहीं चाहिए।
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