"असहमति लोकतंत्र की जान है, इसे दबाना नहीं सहना सीखें"– बॉम्बे हाईकोर्ट ने SDPI नेता को तड़ीपार करने पर पुलिस को फटकारा

जस्टिस माधव जे. जमदार की पीठ ने यह फैसला सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के सचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया
जस्टिस माधव जे. जमदार की पीठ ने यह फैसला सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के सचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।
जस्टिस माधव जे. जमदार की पीठ ने यह फैसला सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के सचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। एआई इमेज
Published on

मुम्बई- बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी नागरिक को केवल इसलिए बाहर निकाला (Extern) नहीं जा सकता क्योंकि वह केंद्र सरकार के किसी फैसले के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन कर रहा है, और ऐसी कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण (Mala fide) करार देते हुए अदालत ने कहा कि विरोध-प्रदर्शन करना, नारे लगाना और सरकारी नीतियों की आलोचना करना कोई अपराध नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र के मूलभूत स्तंभों में से एक है, जो संविधान के अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार) के तहत संरक्षित है। 

जस्टिस माधव जे. जमदार की पीठ ने यह फैसला सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के सचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। उन्हें 3 दिसंबर 2025 को पुलिस उपायुक्त, जोन-6, चेंबूर, मुंबई ने एक्सटर्नमेंट आदेश क्रमांक 472/C/43 के तहत बाहर निकालने का आदेश दिया था और 27 मार्च 2026 को डिविजनल कमिश्नर, कोकण डिवीजन ने भी अपील क्रमांक 188/2025 को खारिज कर दिया था, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कोर्ट ने दोनों आदेशों को पूरी तरह से रद्द करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने अपनी पार्टी के साथ मिलकर केंद्र सरकार के कुछ फैसलों के खिलाफ कई प्रदर्शन, मोर्चे और धरने आयोजित किए थे, जिनके लिए पुलिस ने अनुमति तो देने से इनकार कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद आयोजित किए गए इन शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ जो एफआईआर दर्ज की गईं, वे सभी मुख्य रूप से भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 188 (लोक सेवक के आदेश की अवज्ञा) के तहत थीं, जिसमें अधिकतम सजा मात्र एक महीने के कारावास की है, और इस आधार पर बाहर निकालने जैसी असाधारण और कठोर कार्रवाई करना पूरी तरह से अनुपातहीन, अवैध और असंवैधानिक है। जस्टिस जामदार ने मौखिक रूप से कहा, "पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नौकर नहीं है, वे जनसेवक हैं... मैं आपके अधिकारियों पर भारी जुर्माना लगाने जा रहा हूँ।"

"यह क्या है? सभी नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है... वे विरोध-प्रदर्शन नहीं कर सकते, आंदोलन नहीं कर सकते? अब इतने सारे पेपर लीक हो गए हैं। अगर लोग विरोध करते हैं, तो आप उन पर केस दर्ज कर देंगे... यह क्या है? विरोध करना नागरिकों का अधिकार है।
-जस्टिस जामदार की मौखिक टिप्पणी

कोर्ट ने बारीकी से विश्लेषण करते हुए पाया कि महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम, 1951 की धारा 56(1)(a) और (b) के तहत बाहर निकालने की कार्रवाई तभी हो सकती है, जब किसी व्यक्ति की हरकतें जनता या संपत्ति को खतरा, भय या नुकसान पहुंचाने वाली हों, लेकिन इस मामले में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं था, न ही किसी एफआईआर में हिंसा, संपत्ति को नुकसान या शारीरिक चोट का कोई आरोप था, और न ही कोई गवाह था जिसने याचिकाकर्ता के खिलाफ गवाही देने से इनकार किया हो, बल्कि अधिकारियों ने बिना किसी वास्तविक और तथ्यात्मक आधार के एक मनमानी मानसिक संतुष्टि (Subjective Satisfaction) दर्ज की कि इन प्रदर्शनों से खतरा है, जिसे कोर्ट ने पूरी तरह से गलत, अवैध और दुर्भावनापूर्ण करार दिया। 

कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले अनुराधा भसिन बनाम भारत संघ (2020) 3 SCC 637 का हवाला देते हुए कहा कि धारा 144 जैसी आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल भी लोकतांत्रिक अधिकारों, राय व्यक्त करने या शिकायत दर्ज कराने को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता, और इसी तरह गुजरात हाईकोर्ट के मोहम्मद कलीम तौफीक अहमद सिद्दीकी बनाम गुजरात राज्य (R/Special Criminal Application No.8894/2020, निर्णय दिनांक 26 अगस्त 2021) के फैसले को भी सही ठहराया, जिसमें ठीक इसी तरह सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने वाले व्यक्ति को बाहर निकालने के आदेश को असंवैधानिक और अवैध करार दिया गया था।

कोर्ट ने कहा, “एक्सटर्नमेंट आदेश नागरिक के संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड एक्सप्रेशन तथा गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार को प्रभावित करता है।”

कोर्ट ने कहा कि बाहर निकालने का आदेश एक असाधारण कदम है, जो किसी नागरिक के आवाजाही के मौलिक अधिकार को छीन लेता है, और इसका उपयोग अत्यंत सावधानी और न्यूनतम मामलों में ही किया जाना चाहिए, लेकिन यहाँ तो याचिकाकर्ता ने अपनी पार्टी के माध्यम से सरकारी नीतियों के खिलाफ अपनी असहमति जताई थी, जो लोकतंत्र का मूल आधार है, और प्रशासन को इस असहमति को सहन करना सीखना चाहिए, न कि उसे दबाना चाहिए, क्योंकि असहमति लोकतंत्र की जान है।

जज ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा, "परसों ही एक 10 साल के बच्चे की दुर्घटना में मौत हो गई और राज्य विधानसभा में इस बात पर चर्चा हो रही थी कि पीठासीन अधिकारी का चुनाव कैसे होता है और वह एक पार्टी से दूसरी पार्टी में कैसे चले गए... यह क्या है? आपको (सईद) भी पाला बदल लेना चाहिए... वैसे भी पूरे महाराष्ट्र में हॉर्स ट्रेडिंग (विधायकों की खरीद-फरोख्त) चल रही है। आपके (सईद) खिलाफ कुछ FIR दर्ज हैं... पाला बदलने के बारे में सोचिए, एक 'वॉशिंग मशीन' है।"

अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ जितनी भी एफआईआर दर्ज की गई हैं, उनमें सभी धारा 188 के तहत हैं, जिसमें अधिकतम सजा एक महीने की है, फिर भी प्रशासन ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और यह दावा किया कि इससे जनता और संपत्ति को खतरा है, जो पूरी तरह से निराधार और तथ्यहीन है, और इसलिए यह कार्रवाई न केवल कानूनी दृष्टि से गलत है, बल्कि यह राजनीतिक द्वेष और दुर्भावना से प्रेरित है, क्योंकि याचिकाकर्ता एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के सचिव हैं और उन्होंने अपनी पार्टी की विचारधारा के अनुसार सरकारी फैसलों का विरोध किया, जो कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में एक सामान्य और स्वाभाविक प्रक्रिया है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में न केवल सरकार का समर्थन करना शामिल है, बल्कि सरकार की आलोचना करना, उसके फैसलों के खिलाफ आवाज उठाना और शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करना भी शामिल है, और अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार में यह भी शामिल है कि किसी को बिना किसी ठोस आधार के कलंकित न किया जाए और उसे समाज में बदनाम न किया जाए, लेकिन इस मामले में याचिकाकर्ता को बाहर निकालने के आदेश से उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को भी ठेस पहुंची है, क्योंकि उसे एक 'अपराधी' या 'खतरनाक व्यक्ति' के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि वास्तव में उसने केवल अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल किया था।

जस्टिस जमदार ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि 'सरकारी नीतियों की आलोचना करना या उनके खिलाफ मोर्चा निकालना कोई अपराध नहीं है, यदि कोई राजनीतिक दल का पदाधिकारी शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखता है, तो उसे बाहर निकालने की धमकी देना लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है'।

इस आधार पर अदालत ने 3 दिसंबर 2025 के पुलिस उपायुक्त के एक्सटर्नमेंट आदेश क्रमांक 472/C/43 और 27 मार्च 2026 के डिविजनल कमिश्नर, कोकण डिवीजन के अपील आदेश क्रमांक 188/2025 दोनों को पूरी तरह से रद्द कर दिया, और याचिकाकर्ता को तुरंत रिहा करने (यदि वह निरुद्ध हो) तथा उसे अपनी सभी मूलभूत स्वतंत्रताओं के साथ जीने की अनुमति देने का आदेश दिया।

साथ ही राज्य सरकार को इस तरह की मनमानी और दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई से बचने का निर्देश देते हुए कहा कि प्रशासन को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल सावधानी, निष्पक्षता और कानूनी आधार पर करना चाहिए, न कि राजनीतिक विरोध को कुचलने के लिए, क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष और असहमति का सम्मान किया जाना चाहिए और उन्हें बोलने का पूरा अधिकार है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यह फैसला स्पष्ट करता है कि बाहर निकालने (Externment) जैसी कठोर कार्रवाई केवल अत्यंत गंभीर मामलों में ही की जानी चाहिए, जहां वास्तविक रूप से जनता या संपत्ति को खतरा हो, न कि सामान्य विरोध-प्रदर्शन के लिए, क्योंकि ऐसा करना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है और यह भारतीय संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।

जस्टिस माधव जे. जमदार की पीठ ने यह फैसला सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के सचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।
सक्रिय लोकतंत्र की आत्मा: एक मुक्त समाज में क्यों अनिवार्य है विरोध-प्रदर्शन का अधिकार?
जस्टिस माधव जे. जमदार की पीठ ने यह फैसला सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के सचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।
"मानवीय गरिमा अंतर्निहित अधिकार": कोलकाता हाईकोर्ट ने आरोपियों के सार्वजनिक अपमान,भीड़ हिंसा पर रोक के लिए पश्चिम बंगाल पुलिस को जारी किए दिशानिर्देश
जस्टिस माधव जे. जमदार की पीठ ने यह फैसला सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के सचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।
CJP पर सरकार का 'HIT', कॉकरोच फिर भी ज़िंदा: जानिये अभिजीत दीपके की कॉकरोच जनता पार्टी का अब तक का सफ़र!
जस्टिस माधव जे. जमदार की पीठ ने यह फैसला सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के सचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।
"बेहतर वेतन की मांग करना कोई अपराध नहीं": कोर्ट ने मानेसर यूनियन नेता की 'अवैध हिरासत' को लेकर पुलिस को कड़ी फटकार लगाई

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

द मूकनायक की मदद करें

‘द मूकनायक’ जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है. अगर आप भी चाहते हैं कि ‘द मूकनायक’ हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहे तो सपोर्ट करें.

यहां सपोर्ट करें
The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com