"लोग टूट जाते एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में": बुलडोजर न्याय पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, शायर बशीर बद्र को याद किया

जजों ने स्पष्ट किया कि दंडात्मक बुलडोजर कार्रवाई विधि के शासन और संविधान के "शक्तियों के पृथक्करण" के सिद्धांत का उल्लंघन है। हालाँकि एफआईआर के बाद 2 साल तक ध्वस्तीकरण रोकने पर दोनों की एकराय नहीं थी।
 हाईकोर्ट ने कहा कि पिछले वर्षों में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं जहां एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद नोटिस जारी कर जल्दबाजी में मकान गिरा दिए गए, जिससे प्रभावित लोगों को अदालत की शरण लेने का भी पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
हाईकोर्ट ने कहा कि पिछले वर्षों में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं जहां एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद नोटिस जारी कर जल्दबाजी में मकान गिरा दिए गए, जिससे प्रभावित लोगों को अदालत की शरण लेने का भी पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
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प्रयागराज- उत्तर प्रदेश में एफआईआर दर्ज होने के बाद मकानों पर बुलडोजर कार्रवाई को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हालांकि इस मामले में अदालत की खंडपीठ के दोनों न्यायाधीशों के बीच एक अहम मुद्दे पर मतभेद उभरकर सामने आया। जस्टिस अतुल श्रीधरन ने सुझाव दिया कि किसी आपराधिक मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद सामान्यतः दो वर्षों तक संबंधित व्यक्ति के आवासीय मकान को ध्वस्त नहीं किया जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नगर नियोजन या अतिक्रमण कानूनों का इस्तेमाल दंडात्मक कार्रवाई के रूप में न हो। लेकिन जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने इस दो वर्षीय "हायटस" यानी अंतराल के प्रस्ताव से सहमति नहीं जताई। इस कारण इस मुद्दे पर खंडपीठ का फैसला विभाजित (Split Verdict) रहा।

हालांकि, दोनों न्यायाधीश इस बात पर पूरी तरह सहमत रहे कि किसी भी आवासीय भवन का ध्वस्तीकरण कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना नहीं किया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि दंडात्मक बुलडोजर कार्रवाई विधि के शासन और संविधान के "शक्तियों के पृथक्करण" (Separation of Powers) के सिद्धांत का उल्लंघन है। अदालत ने निर्देश दिया कि भविष्य में उत्तर प्रदेश में किसी भी आवासीय भवन के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित प्रक्रिया और इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुरूप ही की जाएगी। यदि इन निर्देशों का उल्लंघन हुआ तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में अवमानना की कार्रवाई की जा सकेगी।

यह फैसला फैमुद्दीन एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (रिट-सी संख्या 2229/2026) मामले में आया। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया था कि उनके एक रिश्तेदार के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला दर्ज होने के बाद प्रशासन ने उनके आवासीय मकान, एक लॉज और आरा मशीन के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी तथा उन्हें आशंका थी कि उनके घर पर भी बुलडोजर चलाया जा सकता है।

राज्य सरकार ने अदालत को भरोसा दिलाया कि विधिक प्रक्रिया का पालन किए बिना कोई ध्वस्तीकरण नहीं किया जाएगा, लेकिन अदालत ने कहा कि पिछले वर्षों में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं जहां एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद नोटिस जारी कर जल्दबाजी में मकान गिरा दिए गए, जिससे प्रभावित लोगों को अदालत की शरण लेने का भी पर्याप्त अवसर नहीं मिला।

 हाईकोर्ट ने कहा कि पिछले वर्षों में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं जहां एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद नोटिस जारी कर जल्दबाजी में मकान गिरा दिए गए, जिससे प्रभावित लोगों को अदालत की शरण लेने का भी पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
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"घर बनाने में लोग टूट जाते हैं..."

अपने विस्तृत फैसले की शुरुआत जस्टिस अतुल श्रीधरन ने मशहूर उर्दू शायर स्वर्गीय बशीर बद्र के चर्चित शेर से की:

"लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।"

इसके बाद उन्होंने लिखा कि एक सामान्य नागरिक के लिए घर केवल संपत्ति नहीं होता, बल्कि वर्षों की मेहनत, सपनों, सुरक्षा और सम्मान का प्रतीक होता है। उन्होंने कहा कि एक सार्थक लोकतंत्र में आवश्यकता पड़ने पर व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा राज्य की अपार शक्ति के विरुद्ध भी की जानी चाहिए।

जस्टिस श्रीधरन ने अपने फैसले में कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक बुलडोजर केस निर्णय के बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर उत्तर प्रदेश में, मकानों को गिराने की कार्रवाइयां जारी हैं। उन्होंने टिप्पणी की कि समाज के एक वर्ग में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए "बुलडोजर न्याय" की मानसिकता विकसित हुई है, जिसके चलते आरोपी का घर गिराकर तत्काल न्याय का आभास कराया जाता है। अदालत ने कहा कि राज्य का काम इस कथित "रक्तपिपासा" (blood lust) को संतुष्ट करना नहीं बल्कि संविधान और कानून के शासन के अनुरूप कार्य करना है।

अदालत ने कहा कि किसी आरोपी को दोषी ठहराना और उसे दंड देना केवल न्यायपालिका का अधिकार है। यदि कार्यपालिका नगर नियोजन या अतिक्रमण कानूनों का इस्तेमाल आरोपी या उसके परिवार को दंडित करने के लिए करती है, तो यह संविधान के शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन होगा। न्यायालय ने कहा कि प्रशासन यदि किसी निर्माण को अवैध बताकर वास्तव में आरोपी को सजा देने का प्रयास करता है, तो ऐसी कार्रवाई "Retributive Exercise of Executive Discretion" यानी प्रतिशोधात्मक प्रशासनिक शक्ति का प्रयोग होगी, जिसे कानून मान्यता नहीं देता।

जीवन, आजीविका और आश्रय: तीनों जुड़े हुए अधिकार

खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के ओल्गा टेलिस, चामेली सिंह, शिव सागर तिवारी और अन्य महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें आजीविका और सम्मानजनक आश्रय का अधिकार भी शामिल है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति का घर गिरा देना केवल उसकी संपत्ति छीनना नहीं बल्कि उसके पूरे परिवार की आजीविका, सम्मान और भविष्य को संकट में डाल देना है। इसलिए ध्वस्तीकरण हमेशा अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं। यदि निर्माण को नियमित (Regularise) या कंपाउंड किया जा सकता है तो प्रशासन को पहले वही विकल्प अपनाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी नागरिक को परिस्थितियों के आधार पर यह युक्तिसंगत आशंका हो कि उसका घर गिराया जा सकता है, तो उसे वास्तविक ध्वस्तीकरण का इंतजार करने की आवश्यकता नहीं है। वह अपने मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए पहले ही अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। अदालत ने कहा कि मौलिक अधिकारों की रक्षा केवल उनके उल्लंघन के बाद नहीं बल्कि संभावित उल्लंघन से पहले भी की जा सकती है।

दो साल के अंतराल पर मतभेद

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि जस्टिस अतुल श्रीधरन ने सुझाव दिया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद सामान्यतः दो वर्षों तक संबंधित आवासीय मकान के ध्वस्तीकरण पर रोक रहनी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि प्रशासनिक कार्रवाई प्रतिशोधात्मक न हो और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग न किया जाए। लेकिन जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने इस प्रस्ताव से असहमति व्यक्त की। इस कारण इस प्रश्न पर दोनों न्यायाधीशों के बीच मतभेद बना रहा और मामला स्प्लिट वर्डिक्ट का बन गया।

हालांकि दोनों न्यायाधीश इस मूल सिद्धांत पर एकमत रहे कि किसी भी ध्वस्तीकरण की कार्रवाई कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया, प्राकृतिक न्याय और सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही होनी चाहिए तथा मनमाने या दंडात्मक बुलडोजर अभियान की संवैधानिक व्यवस्था में कोई जगह नहीं है।

इस व्यापक निर्णय में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के बुलडोजर संबंधी दिशा-निर्देशों को उत्तर प्रदेश में लागू करने का निर्देश देते हुए कहा कि भविष्य में यदि किसी आवासीय भवन के ध्वस्तीकरण में इन निर्देशों का उल्लंघन होता है तो प्रभावित नागरिक सीधे इलाहाबाद हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल कर सकेंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का शासन भीड़ की भावना से नहीं बल्कि संविधान, प्राकृतिक न्याय और विधिक प्रक्रिया से संचालित होगा।

 हाईकोर्ट ने कहा कि पिछले वर्षों में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं जहां एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद नोटिस जारी कर जल्दबाजी में मकान गिरा दिए गए, जिससे प्रभावित लोगों को अदालत की शरण लेने का भी पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
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 हाईकोर्ट ने कहा कि पिछले वर्षों में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं जहां एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद नोटिस जारी कर जल्दबाजी में मकान गिरा दिए गए, जिससे प्रभावित लोगों को अदालत की शरण लेने का भी पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
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 हाईकोर्ट ने कहा कि पिछले वर्षों में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं जहां एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद नोटिस जारी कर जल्दबाजी में मकान गिरा दिए गए, जिससे प्रभावित लोगों को अदालत की शरण लेने का भी पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
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