
बेंगलुरु- सुबह की पहली किरण में एक परिवार का घर, जहां हंसी की गूंज अब सिसकियों में बदल चुकी है। 23 साल की यशस्विनी, जो कल तक एक डेंटल डॉक्टर बनने का सपना बुन रही थी, आज सिर्फ एक याद बनकर रह गई। बेंगलुरु के चंदापुर में फंदे पर लटकी मिली यशस्विनी, कारण? कॉलेज की कक्षा में सांवले रंग पर पड़े वो जख्म, जो तानों की शक्ल में दिन-रात काटते रहे। 'काली लड़की डॉक्टर कैसे बनेगी?' ये सवाल नहीं, एक घातक हथियार था, जो लेक्चररों की जुबान पर सजता था। और ये सिर्फ यशस्विनी की कहानी नहीं; ये उन लाखों लड़कियों का दर्द है, जिन्हें समाज सिखाता है कि गोरी त्वचा ही सुंदरता है, सफलता है। जहां आईने में झांकते ही आंखें नम हो जाती हैं, और सपने रंग की दीवार पर ठोकर खा जाते हैं। लेकिन अब, इस त्रासदी ने सवाल खड़े कर दिए हैं , क्या हमारा 'फेयरनेस' का भ्रम इतना महंगा पड़ रहा है कि जिंदगियां दांव पर लग जाएं?
आइए, जानते हैं इस मामले की पूरी सच्चाई। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु के बाहरी इलाके चंदापुर में घटी इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। 23 वर्षीय बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी (बीडीएस) की तीसरी वर्ष की छात्रा यशस्विनी बी ने कथित तौर पर कॉलेज में त्वचा के रंग और पहनावे को लेकर लगातार हो रहे अपमान से तंग आकर आत्महत्या कर ली। हालाँकि अपने सुसाइड नोट में यशस्विनी ने किसी का नाम लिखे बगैर आत्महत्या के लिए स्वयं को ही जिम्मेदार माना। अब पुलिस जांच में सामने आए चौंकाने वाले खुलासे बता रहे हैं कि ऑक्सफोर्ड डेंटल कॉलेज के ओरल मेडिसिन एंड रेडियोलॉजी (ओएमआर) विभाग के लेक्चररों ने कक्षा में सार्वजनिक रूप से उसे ताने मारे, यहां तक कहा गया, "ऐसा चेहरा लेकर डॉक्टर कैसे बनोगी?" इस घटना के बाद कॉलेज प्रबंधन ने छह लेक्चररों को तत्काल बर्खास्त कर दिया, जबकि चंदापुर थाने में प्रिंसिपल समेत सात के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।
अपने माता पिता की इकलौती और लाडली बेटी यशस्विनी 8 जनवरी को अपने बेडरूम में फंदे से लटकी मिलीं। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में फांसी से दम घुटने की पुष्टि हुई। उनके परिवार ने चंदापुर पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. गीता पद्मजा और ओएमआर विभाग के छह लेक्चररों पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया। एफआईआर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और 34 (साझा इरादे से किया गया अपराध) के तहत दर्ज की गई।
परिवार के अनुसार, यशस्विनी एक मेहनती और महत्वाकांक्षी छात्रा थीं। वह डॉक्टर बनने का सपना देख रही थीं, लेकिन कॉलेज में उनके गहरे रंग की त्वचा और साधारण पहनावे को लेकर लगातार अपमान सहना पड़ा। उनकी मां परिमला ने मीडिया को दिए बयान में भावुक होकर कहा, "मेरी बेटी को कक्षा में सबके सामने बेइज्जत किया जाता था। साल भर से उसके साथ इस प्रकार का व्यवहार हो रहा था, एक लेक्चरर ने कहा, 'इस चेहरे के साथ डॉक्टर बनना है? क्यों पढ़ाई कर रही हो?' आंखों में दर्द होने पर एक दिन छुट्टी ली, तो सेमिनार प्रस्तुत करने और रेडियोलॉजी केस संभालने से रोक दिया गया। अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया। वह घर आकर रोती थी, लेकिन हमसे कुछ नहीं कहती थी।"
सहपाठियों ने भी परिवार के आरोपों का समर्थन किया। एक सहेली ने बताया, "यशस्विनी को अक्सर क्लास में निशाना बनाया जाता था। उसके कपड़ों पर टिप्पणी, रंग पर ताने। एक बार तो कहा गया कि 'काली लड़की डॉक्टर कैसे बनेगी?' यह सब इतना बढ़ गया कि वह डिप्रेशन में चली गई।" पुलिस सूत्रों के मुताबिक, जांच में सीसीटीवी फुटेज, गवाहों के बयान और यशस्विनी के नोट्स की पड़ताल की जा रही है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "प्रारंभिक जांच से विभाग में टोक्सिक माहौल साफ हो रहा है। दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।"
घटना के खुलासे के बाद छात्रों और परिवार के विरोध के दबाव में ऑक्सफोर्ड डेंटल कॉलेज ने 13 जनवरी को ओएमआर विभाग के छह लेक्चररों को निलंबित कर दिया। बर्खास्त सदस्यों में सीनियर फैकल्टी डॉ अनमोल रजदान, डॉ शबाना बानू, डॉ फाइका कोलकर, डॉ अल्बा दिनेश, रीडर डॉ सिंधु आर और प्रोफेसर सुश्मिनी हेगड़े शामिल हैं। कॉलेज ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा, "हम इस दुखद घटना से गहरा शोक व्यक्त करते हैं। आंतरिक जांच चल रही है और पुलिस के साथ पूर्ण सहयोग करेंगे। छात्रों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देंगे।" परिजन कहते हैं इस मामले में कॉलेज की प्रिंसिपल भी दोषी हैं क्योंकि वे छात्रा के साथ स्टाफ द्वारा किये गये अपमानजनक व्यवहार को रोक नहीं सकीं।
यह घटना भारत की शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त कलरिज्म (रंगभेद) की समस्या को उजागर करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि पेशेवर कोर्सेज में छात्रों पर दबाव के साथ-साथ सामाजिक पूर्वाग्रह भी मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। द मूकनायक से बातचीत में काउंसलर डॉ. गायत्री तिवारी कहती हैं, "कॉलेजों में सेंसिटिविटी ट्रेनिंग की कमी है। रंग, जाति या लिंग आधारित ताने छात्रों को तोड़ देते हैं। सरकार को सख्त नीतियां लागू करनी चाहिए।"
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