
नागपुर- महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में सत्र 2022-23 की पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया तीन वर्षों से अटकी हुई थी। 15 जुलाई को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने मुख्य याचिकाकर्ता अंजनेय सुखदेव ओझा और अन्य अभ्यर्थियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए इस प्रक्रिया को नई दिशा दी। न्यायालय ने 13 अगस्त 2024 के विवादित आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी और विश्वविद्यालय को पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति प्रदान कर दी।
विवाद की शुरुआत 2022-23 सत्र से हुई जब विश्वविद्यालय ने प्रवेश परीक्षा और साक्षात्कार पूरे कर लिए थे, लेकिन अनियमितताओं के आरोपों के चलते परिणाम घोषित नहीं किए गए। इन आरोपों के आधार पर प्रशासन ने पूरी प्रक्रिया रोक दी, जिससे हजारों अभ्यर्थियों का भविष्य अनिश्चित हो गया। बाद में विश्वविद्यालय द्वारा गठित जांच समिति ने प्रक्रिया में कोई अनियमितता नहीं पाई। समिति की रिपोर्ट में साफ किया गया कि आरोप आधारहीन थे। इसके बावजूद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई गई।
एग्जीक्यूटिव काउंसिल (EC) की बैठक में रिपोर्ट पेश कर परिणाम घोषित करने की तैयारी थी, लेकिन बैठक आखिरी समय में रद्द कर दी गई। संदेह जताया गया कि शिक्षा मंत्रालय के दबाव में पूर्व संकाय सदस्य और सस्पेंडेड रजिस्ट्रार को बचाने के लिए ऐसा किया गया।
कोर्ट में विश्वविद्यालय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ए.सी. धर्माधिकारी ने बताया कि जांच रिपोर्ट में कोई गड़बड़ी नहीं मिली और इसे संबंधित पक्ष को भेज दिया गया है। खंडपीठ (जस्टिस अनिल एस. किलोर और जस्टिस राज डी. वाकोड़े) ने विश्वविद्यालय को जवाब दाखिल करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया। मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर को होगी। इस दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवादित आदेश पर स्टे रहेगा।
यह फैसला उन सैकड़ों शोधार्थियों के लिए बड़ी राहत है जिनका भविष्य लंबे समय से लटका हुआ था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह संघर्ष व्यक्तिगत नहीं बल्कि संस्थागत अन्याय के खिलाफ था। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, विश्वविद्यालय में प्रशासनिक अस्थिरता, वीसी नियुक्ति विवाद और अन्य मुद्दों ने भी पीएचडी प्रवेश को प्रभावित किया। 2019 के एमफिल-पीएचडी में भी अनियमितताओं के पुराने मामले थे, जिनके चलते नई प्रक्रिया पर रोक लगी।
द मूकनायक के साथ बातचीत में कुछ शोधार्थियों ने अहम प्रश्न उठाये- छात्र कहते हैं कि यदि प्रवेश प्रक्रिया में कोई अनियमितता नहीं थी, तो उसे वर्षों तक रोके रखने का निर्णय किस आधार पर लिया गया? यदि जांच में सब कुछ सही पाया गया, तो भावी शोधार्थियों का भविष्य किसके इशारे पर और किसके निर्णय से अधर में लटका रहा? वे आगे कहते हैं, जब जांच पूरी हो चुकी थी और बताया जा रहा है कि पूर्व में ही निष्कर्ष सामने आ चुके थे, तो उस जांच रिपोर्ट अथवा निष्कर्ष को सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? किसके हित में उसे दबाए रखा गया? क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही थी या इसके पीछे कोई सुनियोजित रणनीति थी?
एक अन्य गंभीर प्रश्न जांच प्रक्रिया पर हुए व्यय को लेकर भी है। प्रत्येक सुनवाई पर लगभग ₹50,000 का भुगतान किया गया, तो उसका विधिक और प्रशासनिक आधार क्या था? सेवानिवृत्त न्यायाधीश की नियुक्ति की गई थी, तो क्या उसके लिए आवश्यक सक्षम स्वीकृतियाँ प्राप्त की गई थीं? यदि नहीं, तो इस व्यय की जवाबदेही किसकी है?
स्टूडेंट्स कहते हैं कि इन प्रश्नों के उत्तर केवल वित्तीय पारदर्शिता के लिए ही नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए भी आवश्यक हैं। इसके साथ ही यह भी पूछा जाना चाहिए कि इस पूरे घटनाक्रम से हुए शैक्षणिक नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?
कितने छात्रों की आयु सीमा प्रभावित हुई, कितनों के शोध और करियर की योजनाएँ बाधित हुईं, कितनों ने मानसिक, आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना किया, क्या इसकी कोई जवाबदेही तय होगी?
अब एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है। यदि जांच में प्रवेश प्रक्रिया पूरी तरह सही और पारदर्शी पाई गई, तो झूठी शिकायतें करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध क्या कोई कार्रवाई होगी?
क्या उन लोगों से जवाब मांगा जाएगा, जिनके आरोपों के कारण पूरी प्रवेश प्रक्रिया वर्षों तक ठप रही और हजारों छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ?
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