
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हेडस्कार्फ पहनकर कक्षा 11 में पढ़ाई जारी रखने की अनुमति मांगने वाली एक छात्रा की याचिका खारिज कर दी है। छात्रा प्रयागराज के एक निजी स्कूल में पढ़ती है। उसने अदालत को बताया था कि वह कक्षा 6 से 10 तक इसी स्कूल में हेडस्कार्फ पहनकर पढ़ती रही, लेकिन 11वीं में प्रवेश के समय स्कूल ने हेडस्कार्फ के साथ आने पर आपत्ति जताई और उसे प्रवेश नहीं दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि स्कूल का ड्रेस कोड सभी विद्यार्थियों पर समान रूप से लागू है और उसका उद्देश्य अनुशासन व संस्थान की एकरूपता बनाए रखना है, तो ड्रेस कोड तय करना स्कूल के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने यह भी कहा कि पहले की कक्षाओं में छात्रा के हेडस्कार्फ पहनने पर स्कूल की ओर से आपत्ति नहीं किए जाने से उसे भविष्य में ड्रेस कोड में छूट मांगने का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता।
यह फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट की कोर्ट नंबर 2 की दो सदस्यीय पीठ ने 21 अगस्त को सुनाया। पीठ में जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला शामिल थे। याचिका छात्रा की मां के माध्यम से दाखिल की गई थी। छात्रा प्रयागराज के अतरसुइया स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल की स्टूडेंट है और उसने उसी स्कूल से हाईस्कूल पास किया था। उसका कहना था कि वह कक्षा 11वीं में भी उसी स्कूल में पढ़ना चाहती है, लेकिन स्कूल ने हेडस्कार्फ पहनकर आने की शर्त पर उसे प्रवेश देने से इनकार कर दिया।
याचिका में छात्रा ने कहा था कि वह कक्षा 6 से कक्षा 10 तक इसी स्कूल में पढ़ी और इस दौरान वह स्कूल यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनती रही। उसके अनुसार, इस दौरान स्कूल प्रशासन ने कभी इस पर आपत्ति नहीं जताई। छात्रा ने अपने दावे के समर्थन में कक्षा 8, 9 और 10 के आई-कार्ड तथा ग्रुप फोटोग्राफ भी अदालत में पेश किए, जिनमें वह स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहने दिखाई दे रही थी। उसका कहना था कि अब कक्षा 11वीं में प्रवेश के समय अचानक उसे स्कार्फ पहनकर कक्षा में आने से रोका जा रहा है और इसी आधार पर प्रवेश नहीं दिया जा रहा है।
छात्रा की ओर से इस मामले में प्रयागराज के जिलाधिकारी को भी शिकायत दी गई थी। रिकॉर्ड के अनुसार 14 मई और 10 जून को दो आवेदन दिए गए, जिनमें स्कूल पर हेडस्कार्फ के कारण कक्षा 11वीं में प्रवेश नहीं देने का आरोप लगाया गया और शिक्षा जारी रखने के लिए हस्तक्षेप की मांग की गई। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में विशेष रूप से दर्ज किया कि स्कूल एक निजी, स्ववित्तपोषित और CBSE से संबद्ध संस्थान है और जिलाधिकारी का उस स्कूल के आंतरिक प्रशासन पर प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं था। इसके बावजूद जिलाधिकारी ने जिला विद्यालय निरीक्षक यानी DIOS से रिपोर्ट मांगी। DIOS की ओर से स्कूल की प्रधानाचार्या का पक्ष दर्ज कराया गया और 13 जुलाई को रिपोर्ट जिलाधिकारी को भेजी गई।
स्कूल की प्रधानाचार्या ने अपने पक्ष में कहा कि टैगोर पब्लिक स्कूल में विभिन्न समुदायों के बच्चे पढ़ते हैं और सभी विद्यार्थियों के लिए समान ड्रेस कोड लागू है। स्कूल के अनुसार, छात्रा द्वारा यूनिफॉर्म के ऊपर हेडस्कार्फ पहनना निर्धारित ड्रेस कोड का उल्लंघन है। प्रधानाचार्या ने यह भी कहा कि उसी धार्मिक समुदाय की दूसरी छात्राएं स्कूल द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड का पालन कर रही हैं और यदि केवल एक छात्रा को विशेष छूट दी जाती है तो इससे स्कूल की प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। रिपोर्ट में स्कूल ने साफ तौर पर कहा कि स्कार्फ पहनकर कक्षा में पढ़ने की जिद के कारण छात्रा को प्रवेश देना संभव नहीं है।
सहायक DIOS की रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया गया कि स्कूल CBSE से संबद्ध स्ववित्तपोषित संस्थान है और उसे अपने आंतरिक अनुशासन तथा ड्रेस कोड तय करने की स्वायत्तता है। रिपोर्ट में कहा गया कि निर्धारित ड्रेस कोड का पालन न करते हुए किसी विशेष छात्र या छात्रा को दबाव बनाकर प्रवेश दिलाना उचित नहीं माना जा सकता। DIOS ने भी इस रिपोर्ट का समर्थन करते हुए इसे जिलाधिकारी को भेज दिया।
दूसरी ओर छात्रा की ओर से अदालत में दलील दी गई कि वह मुस्लिम शिया समुदाय से संबंधित है और बचपन से हेडस्कार्फ पहनती रही है। उसका कहना था कि वह स्कार्फ के बिना सहज महसूस नहीं करती। उसने इसे अपने मौलिक अधिकारों से जोड़ते हुए संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का हवाला दिया। याचिका में यह भी कहा गया कि हेडस्कार्फ पहनना उसके लिए धार्मिक आस्था का आवश्यक हिस्सा है और स्कूल की ओर से उसे रोकना उसके मौलिक अधिकारों, गरिमा और व्यक्तिगत स्वायत्तता को प्रभावित करता है।
राज्य की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि स्कूल निजी और गैर-सहायता प्राप्त संस्थान है तथा उसके आंतरिक प्रशासन, जिसमें छात्रों की यूनिफॉर्म तय करना भी शामिल है, में राज्य का हस्तक्षेप सीमित है। राज्य के अधिवक्ता ने कहा कि यूनिफॉर्म निर्धारित करने का उद्देश्य विद्यार्थियों के बीच एकरूपता बनाए रखना है। CBSE की ओर से पेश अधिवक्ता ने भी राज्य की दलील का समर्थन किया और छात्रा को मांगी गई राहत देने का विरोध किया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले का मुख्य सवाल इस रूप में तय किया कि क्या कोई व्यक्तिगत छात्र या छात्रा अपने लागू करने योग्य अधिकार के आधार पर स्कूल द्वारा निर्धारित समान ड्रेस कोड में अपनी ओर से अतिरिक्त वस्त्र जोड़ने की मांग कर सकता है। अदालत ने इसका जवाब देते हुए कहा कि जब ड्रेस कोड समान, वास्तविक उद्देश्य वाला, गैर-भेदभावपूर्ण हो और उसका मकसद अनुशासन तथा संस्थागत पहचान बनाए रखना हो, तब निर्धारित यूनिफॉर्म तय करने का अधिकार मुख्य रूप से स्कूल के पास रहता है।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में छात्रा स्कूल की सामान्य यूनिफॉर्म का विरोध नहीं कर रही थी, बल्कि उस यूनिफॉर्म के साथ हेडस्कार्फ जोड़ना चाहती थी। स्कूल के प्रधानाचार्य की ओर से दर्ज बयान और DIOS की रिपोर्ट से यह स्पष्ट था कि हेडस्कार्फ जोड़ना स्कूल के निर्धारित ड्रेस कोड के विपरीत माना गया था। अदालत ने यह भी कहा कि छात्रा ने पहले निचली कक्षाओं में स्कार्फ पहना था और उस समय स्कूल ने आपत्ति नहीं की थी, लेकिन इससे ऐसा कोई “निहित या प्रवर्तनीय अधिकार” उत्पन्न नहीं होता जिसके आधार पर स्कूल को अपनी यूनिफॉर्म नीति में छूट देने के लिए मजबूर किया जा सके।
अदालत ने इस बिंदु पर यह भी टिप्पणी की कि पहले स्कूल की ओर से आपत्ति न किए जाने के कई कारण हो सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि यह स्कूल की निष्क्रियता, नीति को लागू न करने, संकोच, शिष्टाचार या किसी अन्य कारण से हो सकता है, लेकिन इससे स्कूल के खिलाफ भविष्य में ड्रेस कोड लागू करने से रोकने वाला कोई अधिकार नहीं बनता। कोर्ट के शब्दों में, “इससे स्कूल के खिलाफ़ 'एस्टॉपल' (यानी अपनी पहले की बात या काम से मुकरने पर रोक) की स्थिति पैदा नहीं होगी, जब वे यूनिफ़ॉर्म पॉलिसी लागू करने का फ़ैसला करते हैं।” अदालत ने यह भी कहा कि स्कूल अपनी यूनिफॉर्म नीति में बदलाव कर सकता है और विद्यार्थियों को उस बदले हुए ड्रेस कोड का पालन करना होगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अदालत मौलिक अधिकारों के गंभीर उल्लंघन की स्थिति में हस्तक्षेप कर सकती है, लेकिन स्कूल अनुशासन और निर्धारित यूनिफॉर्म जैसे मामलों में अदालत आम तौर पर स्कूल के नीति-निर्धारण के स्थान पर अपनी राय नहीं रखेगी। अदालत ने कहा कि स्कूल की यूनिफॉर्म के कई उद्देश्य होते हैं। यह अनुशासन की भावना पैदा करती है, बच्चों के बीच समानता को बढ़ावा देती है, संस्थान की पहचान बनाती है और कक्षा में अलग-अलग पहचान के आधार पर भेदभाव को कम करती है।
अदालत ने कहा कि समान ड्रेस कोड विभिन्न धर्मों को मानने वाले विद्यार्थियों पर समान रूप से लागू होता है और किसी एक धर्म के विद्यार्थी को अलग करके नहीं देखता। इसलिए अदालत के अनुसार, ऐसा नियम एक “धर्म-निरपेक्ष माहौल” बनाने में मदद करता है। इस संदर्भ में पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के वर्ष 2014 के एक फैसले Pradeep Kumar Srivastava v. Ministry of Human Resource Development का भी उल्लेख किया, जिसमें स्कूल की ड्रेस नीति को लेकर दायर जनहित याचिका को खारिज किया गया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस विवाद पर विचार करते हुए केरल हाईकोर्ट के 2018 के Fathima Thasneem (Minor) and another v. State of Kerala मामले का भी उल्लेख किया। उस मामले में मुस्लिम छात्राओं ने निर्धारित यूनिफॉर्म के अतिरिक्त हेडस्कार्फ और फुल-स्लीव शर्ट पहनने की अनुमति मांगी थी। केरल हाईकोर्ट ने कहा था कि व्यक्ति को अपनी पसंद के कपड़े पहनने की स्वतंत्रता हो सकती है, लेकिन जब यह अधिकार किसी निजी संस्थान के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है, तो अदालत को छात्र के अधिकार और संस्थान के प्रशासन के अधिकार के बीच संतुलन बनाना होगा।
केरल हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दर्ज किया कि मौलिक अधिकार हमेशा एक ही प्रकृति के नहीं होते और कुछ अधिकार परिस्थितियों के अनुसार सीमाओं के अधीन होते हैं। उस फैसले में कहा गया था कि संविधान का उद्देश्य किसी एक अधिकार की रक्षा के लिए दूसरे अधिकार को खत्म करना नहीं है, बल्कि विभिन्न हितों को एक साथ समायोजित करना है। जब व्यक्तिगत हित और व्यापक संस्थागत हित के बीच टकराव हो, तो व्यापक हित को प्राथमिकता दी जा सकती है। इसी आधार पर केरल हाईकोर्ट ने कहा था कि संस्थान को यह तय करने का अधिकार है कि छात्राओं को हेडस्कार्फ और फुल-स्लीव शर्ट के साथ कक्षा में आने की अनुमति दी जाए या नहीं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के चर्चित Resham v. State of Karnataka मामले का भी विस्तार से उल्लेख किया। कर्नाटक की पूर्ण पीठ के सामने यह सवाल था कि क्या हिजाब इस्लाम में “essential religious practice” है और क्या स्कूल की यूनिफॉर्म निर्धारित करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), 21 तथा अन्य मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था कि हिजाब को आवश्यक धार्मिक प्रथा साबित करने के लिए पर्याप्त तथ्य और प्रमाण रिकॉर्ड पर होने चाहिए।
कर्नाटक हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि उसके सामने ऐसा पर्याप्त रिकॉर्ड नहीं था जिससे यह प्रथम दृष्टया साबित हो कि हिजाब पहनना इस्लाम की आवश्यक धार्मिक प्रथा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस हिस्से को उद्धृत करते हुए दर्ज किया कि कर्नाटक पूर्ण पीठ ने निष्कर्ष निकाला था कि “मुस्लिम महिलाओं का हिजाब पहनना इस्लामी धर्म में ज़रूरी धार्मिक रीति-रिवाज़ का हिस्सा नहीं है।”
कर्नाटक हाईकोर्ट ने ड्रेस कोड में उचित व्यवस्था के तर्क को भी स्वीकार नहीं किया था। उसके अनुसार यदि कुछ छात्राएं यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनें और कुछ बिना हिजाब के उसी यूनिफॉर्म में रहें, तो यूनिफॉर्म की एकरूपता प्रभावित होगी और विद्यार्थियों के बीच अलगाव की भावना पैदा हो सकती है। फैसले में कहा गया कि युवावस्था ऐसा समय है जब बच्चों की पहचान और विचार आकार लेते हैं और स्कूल का वातावरण जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा जैसी विभाजक रेखाओं से अलग एक सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने वाला होना चाहिए।
पूर्ण पीठ के एक अन्य निष्कर्ष का हवाला देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि स्कूलों को “मान्यता प्राप्त सार्वजनिक स्थान” माना जा सकता है, जहां व्यक्तिगत अधिकारों का प्रयोग संस्थान के अनुशासन और मर्यादा को प्रभावित करने की सीमा तक नहीं किया जा सकता। कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि ड्रेस कोड सभी विद्यार्थियों पर समान रूप से लागू है और किसी धर्म, भाषा या लिंग के आधार पर अलग नहीं किया गया है, तो केवल ड्रेस कोड लागू किए जाने से अनुच्छेद 14 या 15 के तहत भेदभाव का मामला नहीं बनता।
अदालत ने छात्रा द्वारा रिकॉर्ड पर रखी गई विभिन्न कक्षाओं की तस्वीरों को भी देखा। फैसले में कहा गया कि उपलब्ध तस्वीरों में छात्रा के अलावा कोई अन्य छात्रा हेडस्कार्फ पहने दिखाई नहीं दी, जिसमें उसी धार्मिक समुदाय से संबंधित छात्राएं भी शामिल थीं। कोर्ट ने इसे भी मामले के तथ्यों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना।
अदालत ने कहा कि जिन मामलों में यह मुद्दा विभिन्न हाईकोर्ट के सामने आया है, वहां हेडस्कार्फ को मुस्लिम महिला के लिए ऐसा आवश्यक धार्मिक हिस्सा नहीं माना गया है, जिसके न पहनने से उसकी धार्मिक पहचान या आस्था समाप्त हो जाए। हालांकि इस मामले में भी अदालत ने अपने निष्कर्ष को छात्रा की याचिका में आवश्यक तथ्य और सामग्री के अभाव से जोड़ा। कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई पर्याप्त आधार रिकॉर्ड पर नहीं था जिससे यह साबित हो कि हेडस्कार्फ छोड़ने से छात्रा की धार्मिक आस्था का मूल स्वरूप प्रभावित होगा।
सभी दलीलों और पूर्व फैसलों पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने छात्रा की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि याचिका में मांगी गई राहत देने का आधार नहीं बनता।
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