
वाराणसी- आईएमएस बीएचयू के सर्जरी विभाग में पोस्ट ग्रेजुएट (जूनियर रेजिडेंट) डॉ. साईं सत्या (25) की रविवार को इलाज के दौरान मौत हो गई। वह पिछले 105 दिनों से सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक के आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर थीं। डॉ. सत्या ने 13 मार्च को इंसुलिन की ओवरडोज़ लेकर आत्महत्या का प्रयास किया था। अब उनके निधन के बाद ऐपवा-आइसा फैक्ट फाइंडिंग टीम ने बीएनएस (भारतीय न्याय संहिता) की धारा 107 और 108 के तहत मामला दर्ज करने और दोषियों की गिरफ्तारी की माँग उठाई है।
डॉ. साईं सत्या मूल रूप से समस्तीपुर (बिहार) की रहने वाली थीं और वाराणसी के सामनेघाट क्षेत्र में ट्रॉमा सेंटर के पीछे किराये के मकान में रहती थीं। 13 मार्च को उन्होंने इंसुलिन की अत्यधिक मात्रा ले ली, जिससे उनकी हालत गंभीर हो गई। उन्हें बीएचयू अस्पताल की इमरजेंसी में भर्ती कराया गया और बाद में सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक के आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखा गया।
सूत्रों के अनुसार, घटना से तीन-चार दिन पहले विभाग के एक सीनियर रेजिडेंट से किसी बात पर उनकी कहासुनी हुई थी। हालाँकि, बीएचयू प्रशासन ने इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। डॉ. सत्या के पिता एस.के. चंदन और माँ ममता श्रीवास्तव ने भी यह आशंका जताई है कि कार्यस्थल पर मानसिक प्रताड़ना (हरासमेंट) ही इस कदम का कारण हो सकती है।
बीएचयू के सर सुंदरलाल अस्पताल के एमएस प्रो. के.के. गुप्ता ने बताया कि डॉ. सत्या की मौत कार्डियक अरेस्ट से हुई। वह लंबे समय तक वेंटिलेटर सपोर्ट पर थीं, लेकिन उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो सका। रविवार को उन्होंने अंतिम साँस ली।
ऐपवा (ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेन एसोसिएशन) और आइसा (इंडियन स्टूडेंट्स एसोसिएशन) ने इस मामले की जाँच के लिए एक संयुक्त फैक्ट फाइंडिंग टीम गठित की थी।
टीम में कुसुम वर्मा (ऐपवा प्रदेश सचिव), रोज़ा मैथ्यू, विभा वाही, तथा आइसा से राजेश, मिहिर और आशीष शामिल हैं।
टीम ने 9 जून को बीएचयू आईएमएस का दौरा किया और निदेशक डॉ. एस.एन. संखवार से मुलाकात कर तथ्यों की जानकारी ली। साथ ही आईसीयू में वेंटिलेटर पर उपचाररत डॉ. सत्या को देखा और उनके इलाज की स्थिति के बारे में डॉ. संजीव कुमार सिंह से बातचीत की।
टीम ने डॉ. सत्या के माता-पिता से भी मुलाकात कर घटना से पहले की परिस्थितियों की गहन जानकारी ली।
टीम ने कई जूनियर डॉक्टरों और स्टूडेंट्स से गोपनीय बातचीत की। गोपनीयता की शर्त पर कुछ स्टूडेंट्स ने बताया कि उन पर अत्यधिक लंबी ड्यूटी का दबाव रहता है, जिससे शारीरिक और मानसिक थकावट होती है। कुछ मरीज़ों ने भी यह कहा कि जूनियर डॉक्टरों की लंबी ड्यूटी के कारण इलाज की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है।
टीम के साथ बातचीत में निदेशक ने मेडिकल स्टूडेंट्स की लंबी ड्यूटी की बात स्वीकार की। लेकिन डॉ सत्या को जॉइनिंग से घटना के दिन तक कितने घंटे ड्यूटी करनी पड़ी, इसका डेटा उपलब्ध नहीं कराया। उन्होंने बताया कि इस मामले की आंतरिक जांच कमिटी की रिपोर्ट उपलब्ध कराने का प्राधिकार डीन के ही पास है।
कुछ स्टूडेंट्स का मानना है कि आत्महत्या का प्रयास होने के नाते यह पुलिस जांच का विषय बनता है। यही कारण है कि ऐपवा आइसा फैक्ट फाइंडिंग टीम ने 11 जून को एसीपी गौरव कुमार से मुलाकात करके ज्ञापन सौंपा था। टीम ने डॉ सत्या आत्महत्या प्रयास मामले की पुलिस जांच का अनुरोध किया।
डॉ. सत्या के निधन के बाद ऐपवा-आइसा ने सख्त रुख अपनाते हुए निम्न माँगें रखी हैं:
बीएनएस की धारा 107 और 108 (आत्महत्या के लिए उकसाने / मानसिक प्रताड़ना) के तहत मामला दर्ज कर दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी हो।
बीएचयू प्रशासन की आंतरिक जाँच रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए।
बीएचयू के जिन उच्च अधिकारियों ने मामले को दबाने का प्रयास किया, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए।
वाराणसी का नागरिक समाज इस मामले में आगे आए और डॉ. सत्या को न्याय दिलाने में सहयोग करे।
यदि किसी के पास इस मामले से जुड़ी कोई जानकारी हो, तो उसे साझा किया जाए – पहचान गोपनीय रखी जाएगी।
डॉ. सत्या एक मेधावी छात्रा थीं और उन्होंने कड़ी मेहनत से बीएचयू जैसी प्रतिष्ठित संस्था में पीजी की सीट हासिल की थी। उनके परिजन अब न्याय की गुहार लगा रहे हैं। इधर, चिकित्सा संगठनों और छात्र संघों का कहना है कि यह एकाकी घटना नहीं है, देशभर में जूनियर डॉक्टरों पर काम का अत्यधिक बोझ है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य संकट पैदा हो रहा है।
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