TM Ground Report | “मराठी सीखने से ऐतराज नहीं, लेकिन यह रोज़गार की शर्त क्यों?”: मुंबई के ऑटो और कैब ड्राइवरों पर क्षेत्रीय भाषा अनिवार्यता की ज़मीनी तस्वीर!

2017 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने तत्कालीन नियमों के तहत मराठी को ऑटो परमिट की शर्त बनाने की व्यवस्था को खारिज किया था। अब नये नियमों के विरुद्ध फिर से उच्च न्यायालय में जनहित याचिका लगाई गई है।
 महाराष्ट्र में ड्राइवरों से 16 सवालों के जरिए मराठी की व्यवहारिक जानकारी जांची जा रही है। जो ड्राइवर संतोषजनक प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें एक महीने का नोटिस दिया जा रहा है।
महाराष्ट्र में ड्राइवरों से 16 सवालों के जरिए मराठी की व्यवहारिक जानकारी जांची जा रही है। जो ड्राइवर संतोषजनक प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें एक महीने का नोटिस दिया जा रहा है।ग्राफिक- गीता / द मूकनायक
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मुंबई: मुंबई की सड़कों पर भाषा पग-पग पर बदलती है। कोई यात्री मराठी में 'गंतव्य स्थान' बताता है, कोई उर्दू में मुक्काम, कोई अंग्रेजी में 'डेस्टिनेशन' और ऐप-आधारित कैब में कई बार बातचीत की जरूरत भी बेहद सीमित रह जाती है। लेकिन अब महाराष्ट्र सरकार ने प्रदेश के ऑटो-टैक्सी वालों के लिए मराठी का व्यवहारिक ज्ञान अनिवार्य शर्त बना दिया है। यह व्यवस्था केवल पारंपरिक ऑटो और टैक्सी तक सीमित नहीं है।

परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने कहा है कि ऐप आधारित कैब ड्राइवर भी इससे बाहर नहीं हैं। ओला, रेपिडो, उबेर जैसे कैब एग्रीगेटरों के जरिए काम करने वाले ड्राइवर भी इस भाषा आवश्यकता के दायरे में आते हैं। सरकार का कहना है कि ऑटो- टैक्सी ड्राइवरों को यात्रियों की बुनियादी बातें समझने और उनसे संवाद करने में सक्षम होना चाहिए। सरकार का मानना है कि मराठी भाषा का ज्ञान होना केवल नियमों का पालन करना नहीं है, बल्कि यह यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा से भी जुड़ा मुद्दा है।

इसी उद्देश्य से राज्य में 1 मई 2026 से कुल 105 दिन का मराठी प्रशिक्षण और आकलन अभियान चलाया गया। लेकिन अब जब RTO की ओर से ड्राइवरों की जांच शुरू हुई है, तो सवाल भाषा सीखने से आगे बढ़कर रोज़गार, प्रवासी श्रमिकों की स्थिति, परीक्षा की प्रक्रिया और कानून तक पहुंच गया है। विशेष जांच अभियान 20 अगस्त से शुरू हुआ और राज्य भर में अब तक 4,729 नोटिस जारी किए जा चुके हैं, जिनमें से 2,239 नोटिस मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) में दिए गए हैं। प्रशिक्षण पूरा नहीं करने वाले ड्राइवरों की सबसे बड़ी संख्या मुंबई में बताई जाती है। इसके बाद ठाणे, नवी मुंबई और पालघर के ड्राइवर हैं।

25 अगस्त को महाराष्ट्र के RTO ने 331 ऑटो और टैक्सी ड्राइवरों को नोटिस जारी किए, जिनमें 139 ड्राइवर मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) के हैं। अधिकारियों के मुताबिक इन ड्राइवरों ने मराठी की अपेक्षित बुनियादी जानकारी प्रदर्शित नहीं की। 24 अगस्त को मुंबई में ऑटो चालकों के एक समूह ने तीन दिन के विरोध प्रदर्शन और सड़क जाम का ऐलान किया था। विशेष जांच अभियान के तहत चल रही रोड साइड टेस्टिंग से चालकों की परेशानियां बढ़ गई है, ड्राइवरों का कहना था कि भाषा की अनिवार्यता उनके लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन सकती है और इसका असर उनकी आजीविका पर पड़ सकता है। इधर, परिवहन मंत्री ने कहा कि यह जांच अभियान 30 सितंबर तक लगातार जारी रहेगा।

प्रदेश के इस चर्चित मुद्दे पर द मूकनायक ने मुंबई में कई कैब और टैक्सी ड्राइवरों से बात की। इनमें अधिकतर ड्राइवर उत्तर प्रदेश और बिहार से आए हुए थे जो करीब 3 से लेकर 10 वर्षों से मुंबई में वाहन चला रहे हैं। उनकी बातों में एक महत्वपूर्ण बात उभर कर सामने आई कि किसी को भी मराठी सीखने को लेकर एतराज नहीं है लेकिन ऐसी शर्त बेतुकी है और भाजपा सरकार मराठी की आड़ में बाहरी राज्यों के खासकर मुस्लिम चालकों को टारगेट कर रही है। यूपी, बिहार, झारखंड आदि राज्यों के चालकों का कहना है कि, “मराठी सीखने से हमें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन इसे रोज़गार की शर्त बनाकर थोपना ठीक नहीं है।”

अकेले मुंबई में 2.8 लाख से अधिक ऑटो परमिट और लगभग 20,000 टैक्सी परमिट हैं। अलग-अलग शिफ्ट में काम करने वाले ड्राइवरों को मिलाकर लगभग 5 लाख ड्राइवरों का अनुमान है।
मराठी की अनिवार्यता लागू करने से पहले महाराष्ट्र परिवहन विभाग ने ड्राइवरों के लिए प्रशिक्षण अभियान चलाया।
मराठी की अनिवार्यता लागू करने से पहले महाराष्ट्र परिवहन विभाग ने ड्राइवरों के लिए प्रशिक्षण अभियान चलाया।ग्राफिक- गीता / द मूकनायक

रेपिडो से जुड़े कैब ड्राईवर दानिश मूलत: बिहार के कटिहार से हैं और मुम्बई में उन्हें 5 साल हो चुके हैं। दानिश कहते हैं कि उन्हें मराठी सीखने में कोई आपत्ति नहीं है। उनकी समस्या दूसरी है--काम के बीच सीखने का समय कैसे निकले? दानिश के मुताबिक कैब ड्राइवर दिनभर यात्रियों की सवारी में व्यस्त रहते हैं। ऐप आधारित कैब में यात्री अक्सर मोबाइल पर बुकिंग करता है और ड्राइवर को गंतव्य पहले से दिखाई देता है।

उन्होंने कहा कि मुंबई में उनके अनुभव में बड़ी संख्या में यात्री हिंदी में बात करते हैं। कई यात्राओं में बातचीत केवल गंतव्य, रास्ते या किराए तक सीमित रहती है। ऐसे में उनका सवाल है कि अगर ड्राइवर को मराठी बोलने का नियमित अवसर ही नहीं मिलता, तो वह अचानक किसी औपचारिक परीक्षा में अपनी भाषा दक्षता कैसे साबित करे? उनकी आपत्ति मराठी भाषा से नहीं, बल्कि भाषा को रोज़गार से जोड़ने के तरीके से है।

बिहार के ही सीतामढ़ी से मुंबई आए अशरफ भी इसी तरह की बात करते हैं। उनके मुताबिक कैब में यात्री और ड्राइवर के बीच हमेशा लंबी बातचीत नहीं होती। यात्री बैठता है, गंतव्य बताता है और ड्राइवर उसे वहां पहुंचाता है। अशरफ कहते हैं कि जब बातचीत ही सीमित हो तो किसी दूसरी भाषा को सीखने और उसका लगातार अभ्यास करने का अवसर भी कम हो जाता है। उनके लिए सवाल यह है कि सरकार यदि ड्राइवरों को मराठी सिखाना चाहती है तो प्रशिक्षण को पर्याप्त समय और सुविधा के साथ चलाया जाए। अशरफ यह भी कहते हैं कि मराठी और हिंदी में काफी समानता है और इसी वजह से इतने सालों में उन्हें खुद 'मराठी' में दक्ष नहीं होने के बावजूद कोई परेशानी कभी नहीं हुई।

सरकार का कहना है कि ऑटो- टैक्सी ड्राइवरों को यात्रियों की बुनियादी बातें समझने और उनसे संवाद करने में सक्षम होना चाहिए।
सरकार का कहना है कि ऑटो- टैक्सी ड्राइवरों को यात्रियों की बुनियादी बातें समझने और उनसे संवाद करने में सक्षम होना चाहिए।ग्राफिक- गीता / द मूकनायक

दूसरी ओर, महाराष्ट्र परिवहन विभाग का आधिकारिक तर्क है कि ऑटो और टैक्सी ड्राइवरों को यात्रियों से संवाद करने के लिए मराठी की बुनियादी जानकारी होनी चाहिए। विभाग को ऐसी शिकायतें मिली थीं कि कुछ ड्राइवर यात्रियों की मराठी में दी गई बुनियादी बातों या निर्देशों को समझ नहीं पाते।

इस साल की शुरुआत में मीरा-भायंदर RTO की एक पायलट जांच के दौरान भी कुछ ऑटो ड्राइवरों के मराठी ज्ञान को लेकर सवाल सामने आए। इसके बाद परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने ड्राइवरों के लिए मराठी ज्ञान की आवश्यकता की घोषणा की। राज्य ने 1 मई 2026 से 105 दिन का प्रशिक्षण और आकलन अभियान शुरू किया। इस अभियान में 59 RTO, सब-RTO और भाषा प्रशिक्षण केंद्र शामिल किए गए। मराठी साहित्य से जुड़े संगठनों के 4,500 से अधिक शिक्षकों ने ड्राइवरों को प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षण में साहित्यिक या उच्च स्तर की मराठी के बजाय रोज़मर्रा के संवाद पर जोर था जैसे यात्री से गंतव्य पूछना, दिशा समझना, किराए से संबंधित बातचीत और सामान्य सवालों का जवाब देना। सरकारी अभियान में बड़ी संख्या में ड्राइवर शामिल हुए।

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 1,65,600 ड्राइवरों ने प्रशिक्षण के लिए आवेदन किया। इनमें से लगभग 1,40,423 ड्राइवरों ने प्रशिक्षण पूरा कर परीक्षा पास की, जबकि 7,750 ड्राइवर परीक्षा में असफल हुए और उन्हें दोबारा परीक्षा देनी है। इसके अलावा 17,427 ड्राइवरों ने निर्धारित समय तक प्रशिक्षण पूरा नहीं किया था। यानी लगभग 25 हजार ड्राइवर ऐसे थे जिन्हें अभियान के उस चरण तक मराठी दक्षता का प्रमाणपत्र नहीं मिला था। हजारों ड्राइवर अभी भी प्रक्रिया से बाहर हैं या परीक्षा दोबारा देंगे।

कई टैक्सी चालक दबी जुबां से सरकार के नये नियम को अल्पसंख्यक वर्ग को टारगेट करने का प्रयास कहते हैं।
कई टैक्सी चालक दबी जुबां से सरकार के नये नियम को अल्पसंख्यक वर्ग को टारगेट करने का प्रयास कहते हैं। ग्राफिक- गीता / द मूकनायक

क्या वर्ग विशेष को किया जा रहा टारगेट?

कई टैक्सी चालक दबी जुबां से सरकार के नये नियम को अल्पसंख्यक वर्ग को टारगेट करने का प्रयास कहते हैं। बिहार से आए 45 वर्षीय टैक्सी ड्राइवर सिराज इस नीति को लेकर अधिक मुखर हैं। उन्होंने द मूकनायक से कहा कि उन्हें लगता है कि यह नियम बाहर से आए लोगों, खासकर मुस्लिम ड्राइवरों को निशाना बनाने का बहाना बन सकता है। सिराज का कहना है कि बिना वजह ड्राइवरों को परेशान किया जा रहा है और ऐसी शर्त लगाने का पर्याप्त औचित्य उन्हें नजर नहीं आता।

लेकिन उनका बयान उस व्यापक चिंता को सामने लाता है जिसे कई ड्राइवर भाषा की अनिवार्यता के साथ जोड़ रहे हैं: क्या भाषा सीखना प्रोत्साहित किया जा रहा है या भाषा के आधार पर काम करने का अधिकार सीमित किया जा रहा है?

गेटवे ऑफ इंडिया पर सवारी छोड़ने आए दीपक तिवारी से भी द मूकनायक ने बातचीत की।उत्तरप्रदेश के इलाहबाद से आये दीपक ने बताया कि वह कुछ महीने पहले ही मुंबई आए और किराए पर कैब लेकर चलाते हैं। वह वाहन मालिक को ₹400 प्रतिदिन किराया देते हैं। CNG और अन्य खर्च निकालने के बाद करीब ₹ 600- 800 प्रतिदिन उनके पास बचता है। दीपक का कहना है कि नए नियम को लेकर उन्हें इसलिए चिंता है क्योंकि ड्राइविंग उनका रोज़गार है और किसी भी नियामकीय कार्रवाई का असर उनकी रोज़ की आय पर पड़ सकता है। दीपक जैसे युवकों के लिए मराठी की अनिवार्यता डबल मुसीबत है क्योंकि ना तो उन्हें मराठी समझ आती है और ना ही वे अभी तक मुंबई के पूरे रूट को समझ सके हैं। दीपक कहते हैं, " जो जगह मैं नहीं जानता हूँ वो पहले ही सवारियों को बता देता हूँ तो वो मुझे एड्रेस समझा देते हैं, अभी तक तो संवाद में मुझे कोई दिक्कत नहीं आई है इसलिए समझ नहीं पा रहा हूँ कि मराठी को अनिवार्य क्यों बनाया जा रहा है?"

चालकों को इस बात की भी फिक्र है कि दिनभर यात्रियों की सवारी में व्यस्त रहने वाले ड्राइवरों को भाषा सीखने के लिए पर्याप्त समय कैसे मिलेगा।
चालकों को इस बात की भी फिक्र है कि दिनभर यात्रियों की सवारी में व्यस्त रहने वाले ड्राइवरों को भाषा सीखने के लिए पर्याप्त समय कैसे मिलेगा।ग्राफिक- गीता / द मूकनायक

स्थानीय ड्राईवर करते हैं सरकार का समर्थन

महाराष्ट्र सरकार के इस आदेश को लेकर जहाँ प्रवासी चालकों में चिंता व्याप्त है, वहीं लोकल कैब चालक इसे व्यवहारिक और जरूरी कदम मानते हैं। 'द मूकनायक' ने राहुल निले से बात की जो एक मराठी कैब ड्राइवर हैं और सरकार के रुख का समर्थन करते हैं। निले ने कहा कि इस मुद्दे को असलियत से ज़्यादा बड़ा बनाया जा रहा है। उनके मुताबिक, सरकार ड्राइवरों से मराठी में माहिर होने या भाषा का बहुत अच्छा ज्ञान दिखाने के लिए नहीं कह रही है। वह बस इतना चाहती है कि उन्हें इतनी जानकारी हो कि वे समझ सकें कि यात्री क्या कह रहे हैं और उनकी बुनियादी बातों का जवाब दे सकें।

उन्होंने बताया कि उन्होंने खुद तीन साल तक गुजरात में काम किया और धाराप्रवाह गुजराती बोलना सीखा। निले ने सवाल किया कि जो व्यक्ति महाराष्ट्र में यात्रियों को सेवा देकर अपनी रोज़ी-रोटी कमा रहा है, उसे यात्रियों के एक बड़े तबके द्वारा बोली जाने वाली बुनियादी भाषा सीखने पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए। राहुल कहते हैं कि स्थानीय भाषा सीखना उस जगह के माहौल में ढलने का हिस्सा है जहाँ कोई काम करता है। निले की राय उस तर्क के खिलाफ़ एक अहम बात रखती है कि यह नियम गैर-मराठी बोलने वालों के साथ भेदभावपूर्ण है।

पनवेल निवासी टैक्सी चालक वसंतराव भी कहते हैं कि इस आदेश में कोई भेदभाव की बात ही नहीं है, बाहर प्रान्तों के चालकों का 'ईगो' का सवाल बन रहा है कि कोई उन्हें जबरन नयी भाषा सीखने को कह रहा है।

दूसरी ओर यूपी में जन्मे रैपिडो ड्राइवर फ़ैज़ान अहमद का मानना है कि मराठी कोई मुद्दा नहीं है। फ़ैज़ान ने बताया कि वह आठ साल से मुंबई में रह रहे हैं और मराठी को कोई समस्या नहीं मानते। उन्होंने कहा कि वह यात्रियों की बात समझ सकते हैं क्योंकि मुंबई में शुरुआती सालों में मराठी बोलने वाले लोगों के बीच रहने से उन्हें भाषा सीखने और शहर की रोज़मर्रा की बातचीत के तरीके को जल्दी अपनाने में मदद मिली।

इस नियम का विरोध करने वाले कुछ ड्राइवरों के उलट, फ़ैज़ान ने कहा कि भाषा उनके लिए कोई चिंता का विषय नहीं है। हालांकि, उनका मानना ​​है कि मौजूदा विवाद कुछ समय के लिए ही हो सकता है और उन्हें उम्मीद नहीं है कि सरकार तुरंत बड़े पैमाने पर लाइसेंस रद्द करेगी।

फ़ैज़ान कहते हैं कि ड्राइवर अभी परेशान हैं क्योंकि उन्हें नहीं पता कि इसे कैसे लागू किया जाएगा। खुद फ़ैज़ान ने न तो मराठी कोर्स किया है ना ही कोई टेस्ट दिया है। उन्होंने आम ड्राइवरों पर बेवजह कन्फ्यूज़न और दबाव बनाने के लिए राजनेताओं को ज़िम्मेदार ठहराया। "ड्राइवर अपने परिवार का पेट पालने के लिए दिन-भर काम करते हैं, यहाँ तक कि बीमारी या परिवार में किसी इमरजेंसी के समय भी हम लोग गाडी चलाते हैं, सरकार हम जैसे लोगों की ज़िंदगी मुश्किल क्यों बनाती हैं, इसके बजाय बड़ी समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए।"

इस चेकिंग अभियान में ड्राइवरों की परीक्षा लेने के लिए 16 सवालों की एक प्रश्नावली तैयार की गई है। जांच के दौरान अधिकारी चालकों से रोजमर्रा के काम से जुड़े सवाल पूछ रहे हैं जैसे मीटर चालू है, सीएनजी भरवाने के लिए थोड़ा रुकना होगा आदि छोटे छोटे वाक्यों को मराठी में बुलवाया जा रहा है। सड़क पर हो रहे टेस्ट दे चुके कुछ चालकों की शिकायत है कि पूछे गए सवाल क्लास में सिखाए गए सिलेबस से बाहर के थे।

नये नियम को प्रवासी ड्राइवर्स गैर-मराठी बोलने वालों के साथ भेदभावपूर्ण मानते हैं।
नये नियम को प्रवासी ड्राइवर्स गैर-मराठी बोलने वालों के साथ भेदभावपूर्ण मानते हैं।ग्राफिक- गीता / द मूकनायक

महाराष्ट्र सरकार का नया मराठी नियम क्या है?

महाराष्ट्र सरकार ने 12 अगस्त को Maharashtra Motor Vehicles (Third Amendment) Rules, 2026 लागू किए। इन संशोधनों के जरिए महाराष्ट्र मोटर वाहन नियम, 1989 में मराठी भाषा की व्यवहारिक जानकारी से संबंधित प्रावधान जोड़े गए हैं।

संशोधित नियमों में:

  • Rule 4(4) में संबंधित ड्राइविंग ऑथराइजेशन के लिए working knowledge of Marathi language जोड़ा गया है।

  • Rule 24 में इलेक्ट्रॉनिक मीटर वाली मोटर कैब के अधिकृत ड्राइवर के लिए मराठी की व्यवहारिक जानकारी की शर्त जोड़ी गई है।

  • Rule 78 में परमिट धारक के लिए मराठी की व्यवहारिक जानकारी को अतिरिक्त शर्त बनाया गया है।

  • Rule 85 में इलेक्ट्रॉनिक मीटर वाली मोटर कैब के परमिट के नवीनीकरण के समय भी मराठी की व्यवहारिक जानकारी की शर्त रखी गई है।

    नियम में साहित्यिक स्तर की भाषा दक्षता जैसी शर्त नहीं लिखी गई है। सरकार इसे working knowledge, यानी कामकाज के लिए जरूरी बुनियादी जानकारी, के रूप में पेश कर रही है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी कहा है कि ड्राइवरों को मराठी का विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं है।

नए नियम की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि मराठी की आवश्यक जानकारी नहीं होने पर ड्राइवर का लाइसेंस उसी समय रद्द करने का प्रावधान नहीं है। नियम के अनुसार, यदि किसी अधिकृत ड्राइवर में आवश्यक मराठी ज्ञान नहीं पाया जाता है, तो लाइसेंसिंग अथॉरिटी उसे एक महीने का समय देगी ताकि वह आवश्यक ज्ञान हासिल कर सके।

यदि ड्राइवर निर्धारित समय में इसका पालन नहीं करता है, तो लिखित कारण दर्ज करने और ड्राइवर को सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद ड्राइविंग लाइसेंस पर मौजूद संबंधित ऑथराइजेशन को अधिकतम तीन महीने के लिए निलंबित किया जा सकता है। लगातार अनुपालन न होने की स्थिति में संबंधित ऑथराइजेशन को रद्द किया जा सकता है।

2017 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज की थी भाषाई अनिवार्यता

टैक्सी चालकों के लिए मराठी अनिवार्यता का मसला नया नहीं है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 1 मार्च 2017 के अपने एक आदेश में ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा की अनिवार्यता से जुड़े नवंबर 2016 के सरकारी सर्कुलर को रद्द (quash) कर दिया था। मामले में सरकार ने महाराष्ट्र मोटर व्हीकल्स रूल्स, 1989 के Rule 24 का सहारा लिया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि ऑटो-रिक्शा कानून के तहत “motor cab” की परिभाषा में आते हैं और जिस प्रावधान के तहत भाषा संबंधी शर्त लगाई गई थी, उसमें motor cabs को बाहर रखा गया था। इसलिए मौजूदा नियमों के आधार पर ऑटो परमिट के लिए मराठी ज्ञान को अनिवार्य करना वैधानिक रूप से टिकाऊ नहीं था। 2017 में अदालत ने सरकार को यह भी निर्देश दिया था कि केवल मराठी न बोल पाने या क्षेत्र की जानकारी न होने के आधार पर परमिट चाहने वाले आवेदकों को अयोग्य न ठहराया जाए।

यानी उस समय अदालत का मुख्य सवाल था कि क्या सरकार के पास मौजूदा Motor Vehicles Act और नियमों के तहत ऐसी शर्त लगाने की कानूनी शक्ति थी? अदालत का जवाब था 'नहीं'। इसी विवाद के बाद महाराष्ट्र सरकार ने 2026 में Motor Vehicles Rules में संशोधन करते हुए मराठी की व्यवहारिक जानकारी को ड्राइवर ऑथराइजेशन तथा परमिट से संबंधित नियमों में शामिल किया है। नए नियमों में अनुपालन नहीं करने पर निलंबन जैसी कार्रवाई का प्रावधान है। सरकार का तर्क है कि वह केवल पुराने नियम की व्याख्या करके भाषा की शर्त नहीं लगा रही, बल्कि नियमों में संशोधन करके स्पष्ट कानूनी आधार तैयार कर चुकी है।

लेकिन इससे विवाद खत्म नहीं हुआ है। 25 अगस्त को इस नीति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने लाए जाने की जानकारी आई है। इस याचिका को बुधवार को एक्टिंग चीफ जस्टिस रवींद्र घुगे की बेंच के सामने पेश किए जाने की संभावना है। याचिकाकर्ताओं में नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले चार समूह और कुछ व्यक्ति शामिल हैं। याचिका में कहा गया है कि राज्य ने दूसरे राज्यों के नागरिकों के साथ बाहरी लोगों जैसा व्यवहार किया है, जो संविधान के आर्टिकल 19(1)(d), 19(1)(e) और 'एकल नागरिकता' (single citizenship) के संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे मराठी भाषा का सम्मान करते हैं और इसके प्रचार-प्रसार का विरोध नहीं करते हैं।

उनमें से कई लोग अपने रोज़मर्रा के काम-काज में काम-चलाऊ मराठी बोलते और समझते हैं। हालांकि, उनका तर्क है कि लाइसेंस रद्द करके और रोज़ी-रोटी छीनकर किसी भाषा को थोपा नहीं जा सकता। उनका यह भी कहना है कि संविधान और मोटर व्हीकल एक्ट ऐसी शर्त की इजाज़त नहीं देते हैं।

Summary

मुंबई की बहुभाषी सड़कों पर अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि ड्राइवर मराठी बोलता है या नहीं। सवाल यह है कि भाषा सिखाने की जिम्मेदारी निभाते हुए क्या राज्य यह भी सुनिश्चित करेगा कि सीखने की प्रक्रिया न्यायपूर्ण हो, परीक्षा पारदर्शी हो और किसी मेहनतकश की रोज़ी-रोटी भाषा की परीक्षा में एक गलती के साथ दांव पर न लग जाए?

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