
मुंबई- दादर चौपाटी के समुद्री किनारे पर एक ऐसा स्मारक है जो सिर्फ तिथियों का मोहताज नहीं है। न 14 अप्रैल आंबेडकर जयंती , न 6 दिसंबर का महापरिनिर्वाण दिन, न बुद्ध पूर्णिमा, न अशोक जयंती, फिर भी यहां लोगों की आवाजाही थमती नहीं। बच्चे समुद्र की लहरों के पास खेलते हैं, परिवार फूल-माला लेकर कतार में खड़े होते हैं, और अंदर बाबासाहेब के दर्शन के बाद लोग पार्क की बेंचों पर बैठकर शांति ढूंढते हैं। यह दादर की चैत्यभूमि है: भारतरत्न डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर का अंतिम संस्कार स्थल और उनके अनुयायियों का जीवंत तीर्थ।
महाराष्ट्र शासन ने 2 दिसंबर 2016 को इसे ‘ए’ श्रेणी का पर्यटन एवं तीर्थ स्थल घोषित किया था। लेकिन सामान्य कार्यदिवस का दृश्य किसी सरकारी टैग से बड़ा है। यहां लोग त्योहार मनाने नहीं आते। वे अपने प्रिय नेता के दर्शन को आते हैं, और रुककर विश्राम करते हैं।
चैत्यभूमि परिसर का रखरखाव अत्यंत सराहनीय है और यहाँ स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। सफाई कर्मी नियमित रूप से पूरे क्षेत्र की सफाई करते हैं, जिससे परिसर हमेशा स्वच्छ और शांत बना रहता है। इसके साथ ही, पार्क में श्रद्धालुओं और आगंतुकों के बैठने के लिए पर्याप्त संख्या में बेंच लगाई गई हैं, जहाँ लोग आराम से बैठकर सुस्ता सकते हैं और शांति का अनुभव कर सकते हैं। यहां आगंतुकों के लिए प्रवेश पूरी तरह निशुल्क है।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का महापरिनिर्वाण 6 दिसंबर 1956 को दिल्ली में हुआ। अगले दिन, 7 दिसंबर को दादर चौपाटी के इस तट पर बौद्ध पद्धति से उनका अंतिम संस्कार किया गया। उस समय जगह को लोग भीम चौपाटी कहते थे। बाद के वर्षों में भारतीय बौद्ध महासभा- द बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया, जिसकी स्थापना स्वयं बाबासाहेब ने 4 मई 1955 को की, ने इसे स्मारक का रूप दिया।
14 अप्रैल 1966 को बाबासाहेब की 75वीं जयंती पर नींव का पत्थर रखा गया। उस कार्यक्रम में बाबू जगजीवनराम, यशवंतराव चव्हाण, तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक और बी. के. गायकवाड़ उपस्थित थे। 1968 में करीब 42 फुट ऊंचा स्तूप बना। 5 दिसंबर 1971 को बाबासाहेब की पुत्रवधू मीराबाई यशवंत आंबेडकर ने स्मारक का उद्घाटन किया। यहीं बाबासाहेब की अस्थियां स्थापित हैं।
स्थापत्य साफ बौद्ध स्मृति का है। मुख्य द्वार साँची स्तूप के तोरण की प्रतिकृति है। परिसर में सारनाथ शैली का अशोक स्तंभ है।अशोक स्तंभ के पास अखंड दीप लगातार जलता रहता है।
स्मारक वर्गाकार है, छोटे गुंबद के साथ भूतल और मेज़नाइन में बंटा हुआ। अंदर लगभग डेढ़ मीटर ऊंची गोलाकार दीवार और संगमरमर का फर्श है। गोलाकार कक्ष में बाबासाहेब की प्रतिमा और गौतम बुद्ध की मूर्ति हैं। ऊपर स्तूप है और भिक्खुओं के विश्राम की व्यवस्था है।
श्रद्धालु फूल, माला और गुलदस्ते अर्पित करते हैं। दीवारों पर हर ओर बाबासाहेब की छवि है- संविधान, बौद्ध धम्म और उनके जीवन की छाप इतनी सघन है कि स्थान सिर्फ समाधि नहीं, चलता-फिरता स्मृति संग्रह लगता है। परिसर में परिवार की वंशावली की तस्वीर लगी है। ताम्रपट्टों पर बाबासाहेब के बौद्ध धम्म ग्रहण की स्मृति अंकित है। फोटो प्रदर्शनी भी है।
बाहर स्मारिका दुकानों पर ज्योतिबा फुले की गुलामगिरी, एनिहिलेशन ऑफ कास्ट, जीवनियां, भाषण संग्रह और संविधान की प्रतियां अच्छी संख्या में बिकती हैं। दादर का यह छोर एक साथ तीर्थ, पुस्तक बाजार और समुद्री पार्क बन जाता है।
इस तीर्थ स्थल का दैनिक संचालन भारतीय बौद्ध महासभा के अधीन है। बाबासाहेब द्वारा संगठित समता सैनिक दल, परिसर में अनुशासन और दर्शन व्यवस्था संभालता है। स्वयंसेवक कतार लगवाते हैं, द्वार पर दिशा निर्देश देते हैं। बड़े आयोजनों 6 दिसंबर और 14 अप्रैल पर BMC पेयजल, शौचालय, चिकित्सा शिविर और सफाई की व्यवस्था करती है। पास ही इंदु मिल में राज्य सरकार और MMRDA का विशाल स्मारक (समानता की प्रतिमा) निर्माणाधीन है; वह परियोजना सटी हुई है, लेकिन मौजूदा चैत्यभूमि का रोजमर्रा का प्रबंधन उससे अलग है। दर्शन आमतौर पर प्रातः 6 बजे से रात्रि 9 बजे तक, प्रवेश निःशुल्क है।
रजिस्टर संभालने वाले कल्पेश गंगाराम नाक्ते कहते हैं, सामान्य दिनों में औसतन 500 से 1000 लोग आते हैं। छुट्टियों और विशेष अवसरों पर यह संख्या कई हजार तक पहुंच जाती है।
और फिर आते हैं दो सबसे बड़े दिन--14 अप्रैल, बाबासाहेब की जयंती, और 6 दिसंबर, महापरिनिर्वाण दिवस।
इन दिनों तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। लाखों अनुयायी देश के अलग-अलग हिस्सों से मुंबई पहुंचते हैं। लेकिन चैत्यभूमि की खासियत यह है कि इन विशाल भीड़ वाले दिनों के बीच भी यहां आने वालों का सिलसिला थमता नहीं।
परिसर में लगी सामग्री में बाबासाहेब के बौद्ध धर्म ग्रहण से जुड़ी स्मृतियां भी दिखाई देती हैं।
यह हिस्सा खास महत्व रखता है। क्योंकि 1956 में नागपुर में बाबासाहेब ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया और उनके साथ बड़ी संख्या में लोगों ने भी धर्म परिवर्तन किया। चैत्यभूमि में इस विरासत की मौजूदगी यह बताती है कि बाबासाहेब की कहानी को केवल संविधान निर्माण तक सीमित नहीं किया गया है। यहां उनका बौद्ध धर्म की ओर जाना भी उतना ही महत्वपूर्ण अध्याय है।
चैत्यभूमि इसी वजह से एक साथ स्मारक, बौद्ध स्थल और सामाजिक न्याय की स्मृति बन जाती है।
गेट के पास 63 वर्षीय प्रकाश श्यामराव वानखेड़े लोगों को निर्देश देते दिखाई देते हैं- लाइन में आइए, अनुशासन बनाए रखिए। वानखेड़े खुद दुकानदार हैं, लेकिन चैत्यभूमि में सेवा को वे जिम्मेदारी से ज्यादा अपने लगाव का हिस्सा मानते हैं।
सोशल मीडिया पर चल रहे 'आरक्षण हटाओ' जैसे अभियानों का जिक्र आने पर वह हंसते हैं। उनका कहना है कि बाबासाहेब ने समाज के लिए जो व्यवस्था और अधिकार सुनिश्चित किए, उन्हें खत्म करना इतना आसान नहीं है।
उनके मुताबिक, आरक्षण आज भी जरूरी है क्योंकि जातिगत भेदभाव खत्म नहीं हुआ है।
चैत्यभूमि में सेवा करने वाले स्वयंसेवकों में सरकारी कर्मचारी भी हैं।
प्रवीण लोखंडे, जो फायर विभाग में कर्मचारी हैं, कई वर्षों से यहां सेवा दे रहे हैं। उन्होंने अपने लिए शनिवार और रविवार के दिन सेवा के लिए तय कर रखे हैं।
वे बताते हैं कि यहां आने के लिए उन्हें कोई आदेश नहीं देता।
"कोई मुझे यहां आने के लिए नहीं कहता। मैं अपनी इच्छा और बाबासाहेब के प्रति प्रेम की वजह से यहां आता हूं," वे गर्व से कहते हैं।
यह बात चैत्यभूमि की प्रकृति को समझने में महत्वपूर्ण है। यहां व्यवस्था संभालने वाले कई लोगों के लिए यह सिर्फ किसी सार्वजनिक स्थल पर ड्यूटी नहीं, बल्कि स्वैच्छिक सेवा है।
चैत्यभूमि के बाहर लगी दुकानों में बाबासाहेब से संबंधित साहित्य की अच्छी खासी मांग दिखाई देती है। यहां डॉ. आंबेडकर की किताबें, भाषणों के संग्रह, जीवनियां और संविधान से संबंधित पुस्तकें मिलती हैं।
साथ ही ज्योतिबा फुले की 'गुलामगिरी', बाबासाहेब की 'जाति का विनाश' (Annihilation of Caste) जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों की बिक्री भी होती है। यही शायद चैत्यभूमि की एक अलग पहचान है, यहां श्रद्धा और अध्ययन एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। एक व्यक्ति फूल लेकर स्मारक के भीतर जाता है, तो दूसरा हाथ में किताब लेकर बाहर निकलता है।
स्मारिका दुकान वाले गौरव सोनवले बताते हैं, युवाओं को बाबा साहब के व्याख्यान बहुत आकर्षित करते हैं, इसके अलावा उनपर दूसरे लेखकों की किताबें भी खूब पढ़ी जाती हैं। बातचीत का रुख जब जातिवाद और भेदभाव की ओर बदलता है तो गौरव कहते हैं कि मुंबई जैसे महानगर में जातिगत भेदभाव हमेशा दिखाई नहीं देता।
लेकिन उनका कहना है, "300-500 किलोमीटर अंदर के इलाकों में जाइए, तब समझ में आएगा कि जाति आज भी कितनी बड़ी समस्या है।"
गौरव कहते हैं कि उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर जातिगत भेदभाव का सामना या अनुभव नहीं किया है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि जातिवाद खत्म हो गया।
उनके अनुसार, बदलाव की एक बड़ी चुनौती समुदाय के भीतर जागरूकता की कमी भी है। उनका मानना है कि समाज अपनी सामूहिक ताकत को पूरी तरह नहीं पहचान पाया है।
बाबासाहेब की शिक्षा और उनके अनुयायियों की वर्तमान चिंताओं के बीच यह संवाद चैत्यभूमि में बार-बार सुनाई देता है, "समानता का संविधान में लिखा जाना और जमीन पर उसका पूरी तरह लागू होना, दो अलग बातें हैं।"
ईद की छुट्टी का दिन था। ठाणे से दीपा और रमेश बांसोडे अपने बच्चों को लेकर चैत्यभूमि पहुंचे थे। उनके लिए यह सिर्फ घूमने की जगह नहीं थी।
"हम चाहते हैं कि बच्चों को पता हो कि बाबासाहेब ने हमारे समुदाय के लिए क्या किया और उनकी विरासत अगली पीढ़ी तक कैसे पहुंचती है," दंपति ने कहा।
यह दृश्य चैत्यभूमि में आम है, माता-पिता बच्चों को साथ लेकर आते हैं और उन्हें बाबासाहेब की तस्वीरों, स्मारक और उनसे जुड़ी स्मृतियों से परिचित कराते हैं।
बाबासाहेब की विरासत यहां केवल अतीत की कहानी नहीं है। वह परिवारों के जरिए अगली पीढ़ी तक पहुंचने वाली स्मृति भी है।
परिसर के आसपास पार्क में बैठे एक बुजुर्ग दंपति से बात होती है।
प्रकाश साठे, सेवानिवृत्त स्कूल शिक्षक, अपनी पत्नी शोभा के साथ यहां अक्सर आते हैं। उनके लिए चैत्यभूमि किसी राजनीतिक सभा का स्थल नहीं, बल्कि शांति का स्थान है।
प्रकाश कहते हैं कि उन्हें यहां का शांत वातावरण और समुद्र के आसपास की फिजा पसंद है। उनके शब्दों में, यहां "सकारात्मक ऊर्जा" महसूस होती है। उनकी पत्नी भी इससे सहमत हैं।
इस तरह एक ही जगह पर बाबासाहेब को देखने के अलग-अलग तरीके दिखाई देते हैं, किसी के लिए यह सामाजिक न्याय का प्रतीक है, किसी के लिए बौद्ध आस्था का स्थल, किसी के लिए प्रेरणा, किसी के लिए अध्ययन का केंद्र और किसी के लिए शांत बैठने की जगह।
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