भाजपा सांसद कंगना रनौत के बयान पर क्यों पहुंची राष्ट्रपति मुर्मू तक शिकायत? J&K की एक्टिविस्ट- वकील ने की ये मांग

पत्र में कहा गया है कि किसी विज्ञापन की आलोचना करने के लिए किसी सांसद के पास कई वैध आधार हो सकते हैं, वह उसके सौंदर्यबोध, सांस्कृतिक प्रतीकों, व्यावसायिक संदेश या प्रस्तुति पर सवाल उठा सकते हैं और पारंपरिक मूल्यों की हिमायत भी कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए किसी पूरे धार्मिक समुदाय को कथित तौर पर अपमानजनक सामान्यीकरण के माध्यम से प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं है।
प्रतिनिधित्व में कहा गया है कि भारत के निर्वाचित प्रतिनिधियों को देश के सामने बोलने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन इस अधिकार के साथ सार्वजनिक संवाद की गरिमा और गणराज्य के बंधुत्व की रक्षा करने की जिम्मेदारी भी आती है।
प्रतिनिधित्व में कहा गया है कि भारत के निर्वाचित प्रतिनिधियों को देश के सामने बोलने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन इस अधिकार के साथ सार्वजनिक संवाद की गरिमा और गणराज्य के बंधुत्व की रक्षा करने की जिम्मेदारी भी आती है।
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नई दिल्ली- बॉलीवुड अभिनेत्री और मंडी से भाजपा सांसद कंगना रनौत द्वारा मुस्लिम समुदाय पर एक कथित विवादस्पद बयान को लेकर जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की अधिवक्ता दीपिका पुष्कर नाथ ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र भेजकर मामले की संवैधानिक, संसदीय और कानूनी जांच की मांग की है। इस शिकायत में आरोप लगाया गया है कि रनौत के सार्वजनिक बयानों और आचरण से सांप्रदायिक रूढ़ियों, उकसाऊ भाषा और एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि से अपेक्षित सार्वजनिक आचरण को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं। अधिवक्ता ने स्पष्ट किया है कि उनकी मांग राजनीतिक असहमति, वैचारिक विरोध या व्यक्तिगत दुर्भावना पर आधारित नहीं है, बल्कि एक सांसद के रूप में सार्वजनिक पद से जुड़ी जिम्मेदारी और संवैधानिक मर्यादा के सवाल पर केंद्रित है।

दीपिका ने अपने पत्र में कहा कि किसी सांसद के शब्दों को केवल एक निजी व्यक्ति की राय के रूप में नहीं देखा जा सकता। संसद सदस्य की बात टेलीविजन, अखबारों, सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के जरिए बड़े पैमाने पर लोगों तक पहुंचती है और सार्वजनिक धारणा को प्रभावित कर सकती है। इसलिए निर्वाचित पद के साथ सार्वजनिक जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। अधिवक्ता ने संविधान में निहित समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और प्रत्येक नागरिक की गरिमा के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा है कि भारत जैसे बहुलतावादी लोकतंत्र में सार्वजनिक प्रतिनिधियों का आचरण अलग-अलग समुदायों के बीच संबंधों पर असर डाल सकता है। उनके अनुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी जनप्रतिनिधि के बयान का मूल्यांकन उसके पद से जुड़ी संवैधानिक जिम्मेदारी से अलग करके नहीं किया जा सकता।

क्या है पूरा विवाद

यह विवाद तब शुरू हुआ जब अभिनेत्री कृति सेनन एक ज्वेलरी ब्रांड के रक्षाबंधन कैंपेन में रिवीलिंग कपड़ों में नज़र आईं जिसके बाद इसपर विवाद हुआ। सुधीर चौधरी के साथ डिकोड पर बोलते हुए, कंगना ने कृति के रक्षा बंधन अभियान से जुड़े विवाद पर चर्चा की। बातचीत के दौरान, सुधीर ने सवाल पूछा, “अगर यही कृति ईद पर एक पोस्ट डालेगी, तो क्या ऐसे कपड़े पहन कर डाल सकती हैं?” इसपर कंगना ने मुस्लिम समुदाय के बारे में एक असंबंधित टिप्पणी के साथ जवाब दिया और सवाल उठाया था कि कोई बिकिनी जैसे कपड़े पहनकर राखी क्यों बांधेगा। कंगना ने कहा," मुझे लगता है वहां तो फिर भी आप अपने चचेरे भाई-बहनों से शादी करते हैं,'' उन्होंने हिंदू और मुस्लिम समुदायों में रिश्तों और सीमाओं की तुलना करने से पहले कहा।

विवाद के बाद कृति ने अपना बचाव करते हुए कहा कि संस्कृति और परंपराएं इंसान के दिल में होती हैं, न कि उनके कपड़ों के गले की बनावट में। उन्होंने यह भी सवाल किया कि महिलाओं के कपड़ों को लेकर क्यों जज किया जाता है और उन्हें क्या पहनना चाहिए, यह क्यों बताया जाता है। लोगों की नाराज़गी के बाद ज्वेलरी ब्रांड ने वह कैंपेन वापस ले लिया।

'सांसद के पद की गरिमा और जिम्मेदारियों के अनुरूप नहीं ऐसा आचरण'

पत्र में कंगना रनौत से जुड़े सार्वजनिक बयानों को लेकर एक कथित पैटर्न की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है। इसमें कहा गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र में उनके ऐसे कई बयान सामने आए हैं जिनके लहजे, भाषा या व्यक्तियों और समुदायों के संदर्भ को लेकर विवाद पैदा हुआ। हालांकि अधिवक्ता ने यह भी स्पष्ट किया है कि मीडिया में प्रकाशित प्रत्येक आरोप या टिप्पणी को स्वतः स्थापित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। इसी वजह से उन्होंने संबंधित इंटरव्यू, भाषण, सोशल मीडिया पोस्ट और अन्य सार्वजनिक सामग्री की पूरी और प्रमाणिक स्थिति की जांच करने की मांग की है। शिकायत के अनुसार, यदि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि बार-बार ऐसी भाषा का इस्तेमाल करता है जिसे व्यक्तिगत, अपमानजनक, अवमाननापूर्ण या सामाजिक-सांप्रदायिक रूढ़ियों को मजबूत करने वाला माना जा सकता है, तो सक्षम संवैधानिक और संसदीय संस्थाओं के लिए यह विचार करना उचित है कि ऐसा आचरण सांसद के पद की गरिमा और जिम्मेदारियों के अनुरूप है या नहीं।

अधिवक्ता ने शिकायत में यह अंतर भी स्पष्ट किया है कि किसी सांसद द्वारा विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों की सामाजिक प्रथाओं पर चर्चा करना अपने आप में आपत्तिजनक नहीं है। लोकतांत्रिक विमर्श में धर्म, संस्कृति, सामाजिक परंपराओं और मूल्यों पर बहस की गुंजाइश है। उनका मुख्य सवाल कथित बयान के तरीके और संदर्भ को लेकर है। पत्र के मुताबिक, यदि रिपोर्ट किया गया बयान वास्तव में उसी रूप में दिया गया था, तो पूरे मुस्लिम समुदाय को विवाह और पारिवारिक संबंधों से जुड़ी किसी कथित प्रथा के आधार पर सामान्यीकृत करना एक अपमानजनक या भड़काऊ रूढ़ि के रूप में देखा जा सकता है। पत्र में कहा गया है कि किसी विज्ञापन की आलोचना करने के लिए किसी सांसद के पास कई वैध आधार हो सकते हैं, वह उसके सौंदर्यबोध, सांस्कृतिक प्रतीकों, व्यावसायिक संदेश या प्रस्तुति पर सवाल उठा सकते हैं और पारंपरिक मूल्यों की तरफदारी भी कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए किसी पूरे धार्मिक समुदाय को कथित तौर पर अपमानजनक सामान्यीकरण के माध्यम से प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं है।

दीपिका पुष्कर नाथ ने राष्ट्रपति को दिए पत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी स्वीकार किया है। इसमें कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है और इस पत्र का उद्देश्य राजनीतिक भाषण को सेंसर करना या किसी सांसद की आलोचना करने की स्वतंत्रता को रोकना नहीं है।

साथ ही पत्र में अनुच्छेद 19(2) का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि संविधान कुछ परिस्थितियों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंधों को मान्यता देता है, जिनमें सार्वजनिक व्यवस्था और अपराध के लिए उकसावे से संबंधित स्थितियां शामिल हैं। मांगपत्र में आपराधिक कानून के उन प्रावधानों का भी सामान्य तौर पर उल्लेख किया गया है जो समूहों के बीच वैमनस्य बढ़ाने, धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाने, सार्वजनिक शरारत या गैरकानूनी उकसावे जैसे मामलों से संबंधित हो सकते हैं। हालांकि इसमें साफ तौर पर कहा गया है कि किसी विशेष अपराध के किए जाने का दावा नहीं किया जा रहा है और ऐसा निर्धारण संबंधित प्राधिकारी द्वारा सटीक शब्दों, संदर्भ, मंशा और परिस्थितियों की जांच के बाद ही किया जाना चाहिए।

पत्र में संसद की गरिमा और सार्वजनिक पद के मानकों का भी मुद्दा उठाया गया है। इसमें कहा गया है कि संसदीय लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और प्रतिनिधित्व हासिल करने से मजबूत नहीं होता, बल्कि उन संस्थाओं की विश्वसनीयता और गरिमा भी जरूरी है जिनके माध्यम से जनता का जनादेश लागू होता है। सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन उनकी संवैधानिक भूमिका केवल अपने समर्थकों या मतदाताओं तक सीमित नहीं है। वे ऐसी संस्थाओं का हिस्सा होते हैं जो पूरे गणराज्य की हैं। इसी आधार पर पत्र में कहा गया है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों से सार्वजनिक बयान देते समय अतिरिक्त जिम्मेदारी और संयम की अपेक्षा की जा सकती है।

राष्ट्रपति से की गई मांगों में संबंधित बयानों और आचरण का संज्ञान लेने के साथ-साथ पूरी सार्वजनिक सामग्री की जांच कराने का अनुरोध शामिल है। कहा गया है कि यदि सटीक शब्दों और संदर्भ की पुष्टि के बाद किसी बयान में कानून के तहत आवश्यक तत्व पाए जाते हैं तो वैधानिक प्रावधानों की जांच की जानी चाहिए। इसमें समूहों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा देने, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने, सार्वजनिक शरारत, उकसावे या अन्य संज्ञेय अपराधों से जुड़े प्रावधानों की जांच की मांग की गई है। साथ ही सांसद के आचरण को संसदीय गरिमा और मानकों के दृष्टिकोण से देखने तथा आवश्यकता होने पर सक्षम संसदीय प्राधिकारी के समक्ष मामला भेजने का अनुरोध किया गया है।

प्रतिनिधित्व में कहा गया है कि भारत के निर्वाचित प्रतिनिधियों को देश के सामने बोलने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन इस अधिकार के साथ सार्वजनिक संवाद की गरिमा और गणराज्य के बंधुत्व की रक्षा करने की जिम्मेदारी भी आती है।
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प्रतिनिधित्व में कहा गया है कि भारत के निर्वाचित प्रतिनिधियों को देश के सामने बोलने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन इस अधिकार के साथ सार्वजनिक संवाद की गरिमा और गणराज्य के बंधुत्व की रक्षा करने की जिम्मेदारी भी आती है।
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प्रतिनिधित्व में कहा गया है कि भारत के निर्वाचित प्रतिनिधियों को देश के सामने बोलने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन इस अधिकार के साथ सार्वजनिक संवाद की गरिमा और गणराज्य के बंधुत्व की रक्षा करने की जिम्मेदारी भी आती है।
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