क्यों आंदोलन पर हैं दिल्ली के अंबेडकर विश्वविद्यालय के शोधार्थी? जानिए स्टूडेंट्स की पांच बड़ी मांगें

स्टूडेंट्स की शिकायत है कि प्रशासन बार-बार शोधार्थियों को साथ लिए बिना नीतियां थोपता रहा है और परामर्श की कोई उचित प्रक्रिया मौजूद नहीं है, जबकि मार्च 2025 से छात्र परिषद का गठन हो चुका है और एक अन्य परिषद अप्रैल 2026 से कार्यकाल में है।
अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली के छात्र और पीएच.डी. स्कॉलर्स विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं।
अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली के छात्र और पीएच.डी. स्कॉलर्स विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं।
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नई दिल्ली- डॉ. बी.आर. अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली के छात्रों और पीएच.डी. शोधार्थियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ अपना आंदोलन तेज कर दिया है और वे अनिश्चितकालीन धरने पर हैं। 28 सितंबर को दिए ज्ञापन में अंबेडकर विश्वविद्यालय स्टूडेंट्स काउंसिल (AUDSC) ने कुलपति, डीन अकादमिक अफेयर्स और रजिस्ट्रार को पांच सूत्रीय मांग-पत्र सौंपा। स्टूडेंट्स के अनुसार सभी छात्र और शोधार्थी लंबे समय से अलग-अलग माध्यमों से प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश करते रहे, लेकिन "कोई नतीजा नहीं निकला"। इसी कारण उन्हें "सामूहिक प्रतिरोध और विरोध प्रदर्शन" का रास्ता अपनाना पड़ा।

उनकी शिकायतों में अनिवार्य उपस्थिति और विरोध प्रदर्शन पर पाबंदी लगाने वाले सर्कुलर, परिसर के बड़े हिस्से को काट देने वाले लोहे के गेट, शोधार्थियों के लिए खराब बुनियादी ढांचा, पीएच.डी. फीस माफी का खत्म किया जाना, और उन फैसलों में छात्रों की भागीदारी का न होना शामिल है जो सीधे उनसे जुड़े हैं।

आंदोलन की वजह बने सर्कुलर

छात्रों के आन्दोलन की जड़ 31 जुलाई को विवि प्रशासन द्वारा जारी दो सर्कुलर हैं । पहला सर्कुलर "अटेंडेंस-कम-व्हेयरअबाउट्स" शीर्षक से जारी हुआ, जिसमें सभी पीएच.डी. शोधार्थियों के लिए उपस्थिति दर्ज कराना अनिवार्य किया गया। दूसरा सर्कुलर सार्वजनिक जमावड़े से जुड़ी एडवाइजरी था। इसके तहत छात्रों को परिसर में किसी भी तरह के जमावड़े के लिए चार दिन पहले अनुमति लेनी होगी।

इसके जवाब में शोधार्थियों ने 2 अगस्त को संयुक्त कार्य समिति (JAC) का गठन किया, ताकि AUD के सभी परिसरों में उपस्थिति नीति पर अपनी सामूहिक चिंताएं उठा सकें। इसके बाद 12 अगस्त को नीति वापस लेने की मांग पर सामूहिक मेल अभियान चलाया गया। 18 अगस्त को छात्र परिसर के लोहे के गेट के सामने शांतिपूर्ण ढंग से जुटे और रजिस्ट्रार से मुलाकात की मांग की। तीन छात्रों का प्रतिनिधिमंडल रजिस्ट्रार से मिला, लेकिन ज्ञापन के अनुसार विश्वविद्यालय की ओर से कोई उचित जवाब नहीं मिला। इसके बाद भी शोधार्थियों के शांतिपूर्ण जमावड़े जारी रहे, जिनका मकसद नीति की शर्तों पर बातचीत करना और शोध से जुड़ी विभिन्न चिंताएं उठाना था।

प्रशासन की ओर से ठोस प्रतिक्रिया न मिलने पर AUDSC ने 22 सितंबर को कश्मीरी गेट (KG) परिसर में उपस्थिति नीति के "मनमाने ढंग से थोपे जाने" के खिलाफ प्रदर्शन का आह्वान किया। इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में छात्र शामिल हुए। दो दिन बाद, 24 सितंबर को प्रशासन ने अधिसूचना जारी कर कहा कि जगह की सीमित उपलब्धता के कारण उपस्थिति नीति "अगली अधिसूचना तक" स्थगित रहेगी। शोधार्थियों का जोर है कि 31 जुलाई का सर्कुलर जारी करने से पहले न तो पीएच.डी. शोधार्थियों से और न ही पीएच.डी. काउंसलरों से कोई सलाह-मशविरा किया गया।

छात्रों ने इस दलील को खारिज किया है कि नीति सिर्फ रोकी गई है। उनकी मांग है कि इसे मौजूदा और आने वाले बैचों के पीएच.डी. शोधार्थियों के लिए तुरंत वापस लिया जाए। साथ ही वे जमावड़े संबंधी एडवाइजरी को भी वापस लेने की मांग कर रहे हैं, जिसे उन्होंने "विश्वविद्यालय की अवधारणा के पूरी तरह विपरीत" बताया। ज्ञापन में कहा गया है कि छात्र संगठनों और सांस्कृतिक समितियों ने हमेशा विश्वविद्यालय परिसर का विवेकपूर्ण उपयोग किया है, और तोड़फोड़ की स्थिति से निपटने के लिए अनुशासन समितियां पहले से मौजूद हैं।

कई विश्वविद्यालयों में शोधार्थियों के लिए आवासीय व्यवस्था होती है, जबकि 2008 में स्थापना के बाद से AUD में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। कई शोधार्थियों के पास दिल्ली में रहने का ठिकाना नहीं है, इसलिए उन्हें अपनी स्टाइपेंड और छात्रवृत्ति का बड़ा हिस्सा यात्रा और रहने पर खर्च करना पड़ता है।
कई विश्वविद्यालयों में शोधार्थियों के लिए आवासीय व्यवस्था होती है, जबकि 2008 में स्थापना के बाद से AUD में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। कई शोधार्थियों के पास दिल्ली में रहने का ठिकाना नहीं है, इसलिए उन्हें अपनी स्टाइपेंड और छात्रवृत्ति का बड़ा हिस्सा यात्रा और रहने पर खर्च करना पड़ता है।

"आयरन गेट शासन" खत्म हो

छात्रों के द्वारा दिए ज्ञापन में दूसरी मांग पिछले साल परिसर में लगाए गए लोहे के गेट को लेकर है। 28 सितंबर को दिए ज्ञापन के अनुसार, इनके कारण छात्रों से आधे से अधिक परिसर छिन गया है और वे अपनी मांगें इस तरह नहीं उठा पा रहे कि वे प्रशासन के कानों तक पहुंचें। मुख्य गेट बंद होने से लैंगिक अल्पसंख्यकों की असुरक्षा भी बढ़ी है। उन्हें मदरसा रोड की ओर से होकर साइड गेट का इस्तेमाल करना पड़ता है, जिसे ज्ञापन में सुरक्षा के लिहाज से गंभीर जोखिम वाला बताया गया है।

छात्रों का कहना है कि कभी सुंदर और जीवंत रहे परिसर को "बेरहमी से काट-छांट" कर जेल जैसा बना दिया गया है, और उम्मीदें टूटने के कारण कुछ छात्र अपना दाखिला वापस ले रहे हैं। वे सभी लोहे के गेट तुरंत हटाने और विश्वविद्यालय के मुख्य गेट से छात्रों को प्रवेश देने की मांग कर रहे हैं।

शोधार्थियों के लिए सुरक्षित और कार्यशील बुनियादी ढांचा

स्टूडेंट्स की तीसरी मांग विवि में बेसिक सुविधाओं को लेकर है। शोधार्थियों का कहना है कि उचित जगह और बुनियादी ढांचे की मांग लंबे समय से लंबित है। उनके अनुसार, कई विश्वविद्यालयों में शोधार्थियों के लिए आवासीय व्यवस्था होती है, जबकि 2008 में स्थापना के बाद से AUD में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। कई शोधार्थियों के पास दिल्ली में रहने का ठिकाना नहीं है, इसलिए उन्हें अपनी स्टाइपेंड और छात्रवृत्ति का बड़ा हिस्सा यात्रा और रहने पर खर्च करना पड़ता है।

ज्ञापन में शैक्षणिक संसाधनों की कमियां भी गिनाई गई हैं: अनियमित इंटरनेट, ऑनलाइन जर्नल सब्सक्रिप्शन में रुकावट और, परिसर की लाइब्रेरी में छत नहीं है।

तीन परिसरों में शोधार्थी कक्षों का हाल इस प्रकार बताया गया है:

कश्मीरी गेट: शोधार्थी कक्ष तहखाने में है, जहां बारिश होने पर कथित तौर पर खूब पानी टपकता है। इसमें अधिकतम क्षमता पर भी करीब 20 शोधार्थी ही बैठ सकते हैं, जबकि इस परिसर में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों में 200 से अधिक शोधार्थी नामांकित हैं।

करमपुरा: कक्ष शायद ही कभी चालू रहता है और उसमें सीलन की बदबू रहती है, जो शोधार्थियों के अनुसार सांस की बीमारियों को न्योता देती है। यह एक व्यावसायिक रेस्तरां के एग्जॉस्ट के ठीक बगल में है। एयर कंडीशनिंग करीब एक सप्ताह पहले ही चालू की गई। यहां केवल 14 केबिन हैं, जबकि लगभग 80 शोधार्थी हैं।

लोधी रोड: कक्ष में मेज-कुर्सी जैसा बुनियादी उपयोगी फर्नीचर तक नहीं है।

प्रशासन ने बुनियादी ढांचे से जुड़ी शिकायतों के निवारण के लिए एक समिति बनाई है, लेकिन उसमें छात्रों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। शोधार्थियों की मांग है कि प्रशासन तुरंत संज्ञान ले, सभी परिसरों में कार्यशील और सुरक्षित शोधार्थी कक्ष उपलब्ध कराए, और समिति का आधा हिस्सा यूजी, पीजी और पीएच.डी. पाठ्यक्रमों के निर्वाचित काउंसलरों से बने।

पीएच.डी. फीस माफ़ी बहाली की मांग

चौथी मांग 20 फरवरी 2026 की उस अधिसूचना से जुड़ी है, जिसमें कहा गया था कि शैक्षणिक वर्ष 2026-27 से AUD के किसी भी कार्यक्रम के शोधार्थियों को फीस माफी नहीं मिलेगी। यह अधिसूचना 12 जनवरी 2026 को हुई बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट (BoM) की 54वीं बैठक का हवाला देती है, जिसमें एजेंडा 54.6 फीस माफी नीति के युक्तिकरण पर था।

ज्ञापन के अनुसार, BoM ने फीस माफी बंद करने को यह कहकर उचित ठहराया कि पीएच.डी. शोधार्थियों को पीएच.डी. नॉन-नेट स्टाइपेंड, AUD मेरिट रिसर्च फेलोशिप (AUDMRF) और UGC की JRF/SRF जैसी फेलोशिप मिलती हैं, इसलिए वे यूजी और पीजी छात्रों की तुलना में "भौतिक रूप से भिन्न आर्थिक स्थिति में" हैं। यह भी कहा गया कि फीस माफी का लाभ फेलोशिप के लाभों से "ओवरलैप" करता है और संस्थागत सहायता के वित्तीय विवेक और न्यायसंगत वितरण के सिद्धांतों से मेल नहीं खाता। फीस माफी सभी सामाजिक श्रेणियों और आय वर्गों के शोधार्थियों के लिए बंद कर दी गई, हालांकि पहले से दाखिल शोधार्थियों के लिए जारी रहेगी।

शोधार्थी इसे पांच आधारों पर चुनौती देते हैं:

  1. हर नए पीएच.डी. बैच की फीस में 10% की बढ़ोतरी के साथ यह नीति मान लेती है कि सभी शोधार्थी एक जैसी स्थिति और सामर्थ्य से आते हैं।

  2. शोधार्थी को मिलने वाली फेलोशिप उनकी शोध क्षमता बढ़ाने के लिए है, और किसी अधिकार को शोधार्थी की आर्थिक स्थिति से जोड़ना विश्वविद्यालय की "गंभीर भूल" है।

  3. नॉन-नेट स्टाइपेंड में की गई बढ़ोतरी प्रत्येक पीएच.डी. बैच की फीस वृद्धि और राष्ट्रीय महंगाई दर के अनुरूप नहीं है।

  4. प्रशासन लगभग 10% शोधार्थियों को ही आवास देता है, यानी करीब 90% को नहीं।

  5. UGC NET-JRF छात्रवृत्ति में मकान किराया भत्ता मिलता है, लेकिन नॉन NET-JRF स्टाइपेंड पाने वालों को नहीं। AUDMRF को भी 2023 बैच से स्थगित कर दिया गया है, जबकि उस बैच की सूचना पुस्तिका (Bulletin of Information) में यह योजना शामिल थी।

JAC की मांग है कि भविष्य के बैचों सहित सभी पीएच.डी. बैचों के लिए फीस माफी बहाल की जाए।

शोधार्थियों को प्रभावित करने वाले फैसलों में प्रतिनिधित्व

अंतिम मांग उन सभी निर्णयों में शोधार्थियों के प्रतिनिधित्व की है जो सीधे उन पर असर डालते हैं। आरोप है कि प्रशासन बार-बार शोधार्थियों को साथ लिए बिना नीतियां थोपता रहा है और परामर्श की कोई उचित प्रक्रिया मौजूद नहीं है, जबकि मार्च 2025 से छात्र परिषद का गठन हो चुका है और एक अन्य परिषद अप्रैल 2026 से कार्यकाल में है।

छात्रों का आरोप है कि प्रशासन ने दोनों निर्वाचित परिषदों में से किसी के साथ भी ओरिएंटेशन बैठक तक नहीं की। उनका यह भी कहना है कि अप्रैल 2026 में चुनाव होने के बावजूद तीनों परिसरों की छात्र परिषदों के कोष के लिए अब तक कोई राशि आवंटित नहीं की गई, और काउंसलरों को छात्र समुदाय से संवाद करने से सक्रिय रूप से रोका गया है। ज्ञापन के अनुसार, इससे छात्रों और प्रशासन के बीच अविश्वास का माहौल बनता है।

अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से छात्रों ने प्रस्ताव रखा है कि पीएच.डी. शोधार्थियों के लिए कोई भी नीति बनाने या लागू करने से पहले तीनों परिसरों के सभी CC सदस्यों से अनिवार्य परामर्श किया जाए, और छात्रों से जुड़े हर स्तर के निर्णय में लोकतांत्रिक रूप से चुने गए काउंसलरों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो।

स्टूडेंट्स ने AUD प्रशासन से अपील की है कि वह सभी पांच मांगों को पूरा करे और उनकी शर्तों पर बातचीत के लिए पीएच.डी. काउंसलरों के प्रतिनिधिमंडल से मिले। ज्ञापन "त्वरित प्रतिक्रिया की आशा" के साथ समाप्त होता है और इस पर AUDSC के हस्ताक्षर हैं।

इस रिपोर्ट के प्रकाशन तक ज्ञापन पर विश्वविद्यालय की ओर से किसी आधिकारिक प्रतिक्रिया हीं मिली है।

(विवेक मिश्र अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली के परास्नातक (परफॉमेंस स्टडीज) के छात्र हैं।)

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