TM Student Voice | असहयोग की कोख से जन्मा जामिया, 20 साल से अपने छात्रों की चुनी हुई आवाज़ का इंतज़ार!

कैंपस में तनाव की स्थिति को देखते हुए विश्वविद्यालय ने सभी कक्षाओं को अगले आदेश तक ऑनलाइन मोड में शिफ्ट कर दिया है।
जामिया में छात्र संघ चुनाव बहाल करने और छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई वापस लेने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन जारी है। शनिवार को प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच तनातनी के बाद विश्वविद्यालय ने सभी कक्षाएं तत्काल ऑनलाइन कर दीं और कैंपस के गेट तथा पुस्तकालय बंद करने का आदेश जारी किया।
जामिया में छात्र संघ चुनाव बहाल करने और छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई वापस लेने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन जारी है। शनिवार को प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच तनातनी के बाद विश्वविद्यालय ने सभी कक्षाएं तत्काल ऑनलाइन कर दीं और कैंपस के गेट तथा पुस्तकालय बंद करने का आदेश जारी किया।ग्राफिक- द मूकनायक
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नई दिल्ली- जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ की बहाली की मांग पर शुरू हुआ आंदोलन दो हफ्ते के करीब पहुंच गया है और टकराव गहराता जा रहा है। 24 अक्टूबर को भूख हड़ताल का 13वां दिन था। प्रदर्शनकारी छात्र संघ (JMISU) की बहाली के साथ चीफ प्रॉक्टर को हटाने की मांग कर रहे हैं, जिन पर वे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई का आरोप लगाते हैं। शनिवार को प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच तनातनी के बाद विश्वविद्यालय ने सभी कक्षाएं तत्काल ऑनलाइन कर दीं और कैंपस के गेट तथा पुस्तकालय बंद करने का आदेश जारी किया।

आंदोलन की जड़ें एक पुराने सवाल में हैं। जामिया में आखिरी बार छात्र संघ चुनाव 2005 में हुए थे और 2006 के बाद से यहां कोई निर्वाचित संघ नहीं है। यानी करीब दो दशक से छात्रों की अपनी कोई चुनी हुई आवाज़ नहीं रही। छात्र तुलना में जेएनयू और डीयू का उदाहरण देते हैं, जहां चुनाव होते हैं। आंदोलन के साथ छात्रों ने अकादमिक सुविधाओं, उपस्थिति नियमों, हॉस्टल, स्कॉलरशिप और रिसर्च स्टाइपेंड से जुड़ी चिंताएं भी उठाई हैं।

छात्र संघ की बहाली की मांग को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए अपने 106वें स्थापना दिवस के अवसर पर होने वाले पारंपरिक 'तालीमी मेला' और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को रद्द कर दिया है। यह आयोजन 29 अक्टूबर से 1 नवंबर तक होने वाला था।

इस विवाद को समझने के लिए जामिया की पहचान को याद करना जरूरी है। जामिया का इतिहास सिर्फ एक कैंपस का नहीं, स्वतंत्रता आंदोलन का भी है। इसकी स्थापना 1920 में असहयोग आंदोलन के दौर में अलीगढ़ में हुई। संस्थापकों में मौलाना मोहम्मद अली जौहर, हकीम अजमल खान और डॉ. ज़ाकिर हुसैन जैसे नाम शामिल थे। महात्मा गांधी का इसे समर्थन मिला। यह ब्रिटिश-नियंत्रित शिक्षा के बदले राष्ट्रीय शिक्षा का प्रयोग था। संस्था 1925 में दिल्ली आई और बाद में ओखला में बसी। संसद के कानून के जरिए 1988 में इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। डॉ. ज़ाकिर हुसैन आगे चलकर देश के राष्ट्रपति बने।

यही विरासत छात्रों की दलील का हिस्सा है। प्रदर्शनकारी कहते हैं कि जामिया का जन्म ही असहयोग आंदोलन से हुआ है, इसलिए यहां आवाज उठाने की परंपरा रही है। कैंपस ने 2019 में नागरिकता संशोधन कानून विरोधी आंदोलन के दौरान भी राष्ट्रीय सुर्खियां बटोरीं, जब 15 दिसंबर को पुलिस की कार्रवाई हुई।

आंदोलन कैसे बढ़ा

आंदोलन की शुरुआत 12 अक्टूबर को हुई। जासिम खान, नजमुल हुदा और एबिन बेसिल ने विश्वविद्यालय के तय प्रदर्शन-स्थल गेट नंबर 18 पर भूख हड़ताल शुरू की। बाद में धरना गेट नंबर 7 के पास मिर्ज़ा ग़ालिब की प्रतिमा वाले लॉन में पहुंच गया और 16 अक्टूबर तक हड़ताली छात्र पांच हो गए।

टकराव का पहला बड़ा मोड़ 16 और 17 अक्टूबर को आया। 16 अक्टूबर को विश्वविद्यालय ने बीए-एलएलबी के छात्र एबिन बेसिल को एक साल के लिए रस्टिकेट किया, जबकि जासिम और एक अन्य पूर्व छात्र पर छह महीने की कैंपस पाबंदी लगाई गई। अगले दिन तड़के की घटना पर छात्रों का आरोप है कि सुबह करीब 5:30 बजे सुरक्षा गार्ड और दिल्ली पुलिस के जवान गेट नंबर 7 पर आए और उन्हें घसीटकर कैंपस से बाहर कर दिया। छात्रों का यह भी दावा है कि उनके बिस्तर और तिरपाल उखाड़ दिए गए और कुछ छात्र घायल हुए।

शुरुआती दिनों में दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तय प्रदर्शन-स्थल से हटाने की कोशिश की, जिससे आंदोलन और भड़का। उसी दिन सैकड़ों छात्र एकजुटता में जमा हुए, कुछ ने गेट नंबर 7 की जंजीर तोड़ने की कोशिश की, कई छात्र हिरासत में लिए गए और कैंपस में बड़ी पुलिस टुकड़ी तैनात की गई।

इसी बीच कैंपस की दीवारों पर लिखे नारों ने विवाद खड़ा कर दिया। इनमें "फ्री कश्मीर", "फ्री फिलिस्तीन", "फ्री शरजील इमाम", "वीसी गो बैक" और "आरएसएस गो बैक" बताए गए हैं। प्रशासन ने इनकी निंदा की, दीवारें रासायनिक घोल से साफ कराईं और कहा कि कुछ CCTV कैमरों के तार काटे या क्षतिग्रस्त किए गए थे। इन्हें किसने लिखा, यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है। हड़ताली जासिम अली खान ने कहा है कि इसकी जांच होनी चाहिए क्योंकि जामिया की सुरक्षा की जिम्मेदारी प्रशासन की है, और प्रदर्शनकारी तथा हड़ताली इसमें शामिल नहीं हैं।
जामिया में भूख हड़ताल के 13वें दिन ऑनलाइन मोड पर शिफ्ट हुई पढ़ाई
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प्रशासन की पहल और छात्रों का अविश्वास

प्रशासन ने इसके बाद समितियों का रास्ता अपनाया। 18 अक्टूबर को सात सदस्यीय उच्च-स्तरीय समिति बनी, जिसने चार दौर की बातचीत की, और 21 अक्टूबर को छात्र संघ का संविधान तैयार करने के लिए एक और समिति अधिसूचित की गई। इसी दिन की अधिसूचना में 12 अक्टूबर से 21 अक्टूबर की शाम 5:30 बजे तक प्रदर्शन में शामिल छात्रों पर हुई अनुशासनात्मक कार्रवाई की समीक्षा की बात कही गई। संविधान समिति के बारे में बताया गया कि वह 2006 में संघ भंग होने की परिस्थितियों, अदालती फैसलों और 2007 की लिंगदोह समिति की सिफारिशों की पड़ताल करेगी। छात्र इन कदमों से संतुष्ट नहीं हैं। उनका आरोप है कि 20 दिसंबर तक मसौदा तैयार करने का समय देना देरी की रणनीति है। उन्होंने चीफ प्रॉक्टर की उस अधिसूचना पर भी आपत्ति जताई जिसमें शाम 5:30 बजे के बाद की गतिविधि पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी थी।

विश्वविद्यालय का तर्क है कि चुनाव यूं ही बंद नहीं हुए थे। प्रशासन का कहना है कि 2006 में हिंसक झड़पों, शिक्षकों पर हमलों और कक्षाओं के बाधित होने के कारण चुनाव रोके गए थे, और 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मुद्दे की याचिका निपटा दी थी लेकिन चुनाव कराने का निर्देश नहीं दिया। मौजूदा प्रशासन अक्टूबर 2024 से कार्यरत है।

शनिवार का घटनाक्रम तनाव को और गहरा गया। प्रशासन के मुताबिक 1,500 से अधिक शिक्षक और कर्मचारी कुलपति प्रो. मज़हर आसिफ और रजिस्ट्रार के साथ बैठक के बाद मार्च करके प्रदर्शन-स्थल पहुंचे और लगभग दो घंटे छात्रों को आंदोलन खत्म करने के लिए मनाते रहे।

मीडिया से बातचीत में विरोध-प्रदर्शन के मुद्दे पर, जामिया के रजिस्ट्रार प्रो. मो. महताब आलम रिज़वी ने कहा, "मैं खुद उन छात्रों से बात करने गया जो भूख हड़ताल पर बैठे थे। यूनियन चुनाव कराने की उनकी मांग पर, मैंने उन्हें बताया कि हमने पहले ही एक ड्राफ्ट कमेटी बना दी है, जिसका काम संविधान का मसौदा तैयार करना है। फिर उन्होंने एक समय-सीमा (डेडलाइन) मांगी। मैंने उनसे कहा कि वे जितनी जल्दी संविधान का मसौदा तैयार कर लेंगे, हम उतनी ही जल्दी चुनाव करा देंगे, इस प्रस्ताव पर वे सहमत हो गए। फिर उन्होंने पूछा, 'सर, चुनाव कब होंगे?' मैंने जवाब दिया, 'चूंकि आपने खुद संविधान का मसौदा तैयार करने की पेशकश की है और इस कमेटी में आपके प्रतिनिधि भी शामिल हैं, इसलिए जैसे ही आप मसौदा सौंप देंगे, हम चुनाव की घोषणा कर देंगे।' उनकी एक और मांग कुछ छात्रों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर थी; मैंने उन्हें भरोसा दिलाया कि हम इन कार्रवाइयों की समीक्षा करेंगे, मामले को अनुशासनात्मक समिति (DC) के सामने रखेंगे, और जो छात्र निर्दोष पाए जाएंगे, उन्हें बहाल कर दिया जाएगा... कुछ ऐसे लोग जो हमारे छात्र भी नहीं थे, पिछले गेट से अंदर आ गए... कल जो दीवार पर 'फ्री कश्मीर' (आज़ाद कश्मीर) का नारा लिखा गया था, हम उसकी कड़े शब्दों में निंदा करते हैं; हम किसी भी हाल में इसका समर्थन नहीं करेंगे... कल इमरान मसूद आए थे, वे दीवार तोड़कर अंदर घुसे। इमरान प्रतापगढ़ी भी आए थे, उन्होंने ताला तोड़कर प्रवेश किया। ये लोग बिना अनुमति के अंदर आए हैं... हमने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है और उनसे कार्रवाई करने को कहा है... इनके अलावा AIMIM के कुछ और लोग भी यहां अंदर आए थे।"

विश्वविद्यालय का कहना है कि 2006 में हिंसक झड़पों, शिक्षकों पर हमलों और कक्षाओं में व्यवधान के चलते चुनाव बंद किए गए। 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले की याचिका निस्तारित कर दी और चुनाव कराने का निर्देश नहीं दिया।

प्रशासन का आरोप है कि छात्रों ने उन्हें जाने के नारे दिए और कुछ ने सुरक्षाकर्मियों, शिक्षकों और कर्मचारियों को धक्का दिया। इसके बाद कक्षाएं अगले आदेश तक ऑनलाइन कर दी गईं। 24 अक्टूबर की यह अधिसूचना रजिस्ट्रार के हस्ताक्षर से जारी हुई और इसमें "बोनाफाइड छात्रों" की सुरक्षा का हवाला दिया गया।

छात्रों का अलग कहना है। एबिन बेसिल के अनुसार सुबह प्रोफेसरों और रजिस्ट्रार से बातचीत बेनतीजा रही और बाद में गार्डों ने तंबू हटा दिया। हड़ताली छात्रों को इकोनॉमिक्स फैकल्टी की इमारत में ले जाया गया और जबरन हिरासत में लेने के लिए एम्बुलेंस बुलाई गई, जिसे बाहर खड़े छात्रों ने रोक दिया। SFI की जामिया इकाई ने आरोप लगाया कि प्रॉक्टर, रजिस्ट्रार और सिक्योरिटी एडवाइज़र समेत अधिकारियों ने हड़ताली छात्रों को जबरन हटाने की कोशिश की, तंबू उखाड़े और छात्राओं को घसीटा। AISA ने भी बातचीत के बीच छात्रों पर हमले का आरोप लगाया। ऑनलाइन कक्षाओं पर AISA की जामिया इकाई के सचिव सौरभ त्रिपाठी ने कहा कि यह कदम आंदोलन को कमजोर करने और छात्रों को कमरों तक सीमित रखने के लिए उठाया गया है।

Disha Students’ Organization की जामिया इकाई का भी आरोप है कि प्रशासन ने हबीबा समेत कई छात्राओं के खिलाफ बल प्रयोग किया, जबकि वे हड़ताली छात्रों को ले जाने से बचाने के लिए मानव शृंखला बनाए खड़ी थीं। कैंपस के बाहर बिना नेम प्लेट वाले ITBP जवानों की तैनाती का दावा भी है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में गेट नंबर 7 के बाहर नोटिस चस्पा किया गया है, जिसमें विश्वविद्यालय के सभी गेट अगले आदेश तक बंद रखने की सूचना दी गई है। इसके साथ ही कैंटीन और लाइब्रेरी को भी बंद रखने का निर्देश दिया गया है।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में गेट नंबर 7 के बाहर नोटिस चस्पा किया गया है, जिसमें विश्वविद्यालय के सभी गेट अगले आदेश तक बंद रखने की सूचना दी गई है। इसके साथ ही कैंटीन और लाइब्रेरी को भी बंद रखने का निर्देश दिया गया है।

विश्लेषकों की नजर में असली पेच

विश्लेषकों के अनुसार असली पेच दो बातों में है। पहली बात समय-सीमा की है। छात्र लिखित तारीख चाहते हैं, जबकि प्रशासन का आश्वासन मसौदा जमा होने की शर्त से बंधा है और मसौदे की अंतिम तिथि 20 दिसंबर बताई गई है। दूसरी बात भरोसे की है। 17 अक्टूबर की कार्रवाई और रस्टिकेशन के बाद मांग सिर्फ संघ तक सीमित नहीं रही, उसमें चीफ प्रॉक्टर की जवाबदेही और अनुशासनात्मक कार्रवाई की वापसी भी जुड़ गई है। प्रशासन की 2006 की हिंसा और अदालती स्थिति वाली दलील कानूनी रूप से वजनदार है, पर छात्र पूछते हैं कि दो दशक बाद वही तर्क कब तक चलेगा, जबकि लिंगदोह सिफारिशें 2007 से मौजूद हैं और प्रशासन की अपनी समिति उन्हीं को देखने वाली है। नारों के विवाद ने बहस को और जटिल कर दिया है, क्योंकि जब तक यह साफ नहीं होता कि इन्हें किसने लिखा, पूरे आंदोलन को उससे जोड़ना या उसे बिल्कुल अलग मानना दोनों अधूरे निष्कर्ष होंगे।

सोशल मीडिया पर बंटी राय

विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने X पर तस्वीरें साझा करके कहा कि "प्रतिष्ठित जामिया विश्व विद्यालय में ‘Free Kashmir’, ‘Free Palestine’, ‘Free Sharjeel Imam,’ 'VC Go back' और ‘RSS Go Back’ जैसे नारे लिखे जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और शिक्षा के मंदिर को अपवित्र करने का कोई गहरा षड्यंत्र है। क्या कुछ मुट्ठीभर लोग केंद्रीय विश्व विद्यालय को भारत-विरोधी गतिविधियों का अड्डा बनाने की कोशिश कर रहे हैं? प्रशासन और पुलिस ऐसे नारों के लिए जिम्मेदारों की पहचान कर कार्रवाई त्वरित कार्यवाही करें और दोषियों को शीघ्र परिसर से बाहर खदेड़ें। जामिया को "भारत-विरोधी गतिविधियों का अड्डा" नहीं बनने दिया जाएगा।"

बिहार भाजपा अध्यक्ष संजय सरावगी ने कहा कि ऐसे नारे छात्रों की आड़ में अलगाववाद को बढ़ावा देने की कोशिश दिखाते हैं। आरएसएस से जुड़े ABVP का रुख मिला-जुला रहा। संगठन के दिल्ली राज्य सचिव सार्थक शर्मा ने छात्र संघ की मांग को जायज लोकतांत्रिक चिंता बताया और प्रशासन की समिति का स्वागत किया, पर "फ्री कश्मीर" नारों पर गंभीर चिंता जताते हुए एफआईआर और जांच की मांग की। विपक्षी खेमे में भी रुख एक सा नहीं रहा।

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा कि छात्रों की चिंताएं जायज हैं और पूछा कि विश्वविद्यालय छात्र संघ बहाल क्यों नहीं करता। उन्होंने "फ्री कश्मीर" पोस्टरों की निंदा की और कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताया। सपा प्रवक्ता आशुतोष वर्मा ने नारों के विवाद को छात्र संघ की मांग से अलग रखकर देखने की बात कही।

राजद सांसद संजय यादव ने कुलपति को पत्र लिखकर संघ की बहाली, छात्रों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की वापसी और पारदर्शी, समयबद्ध चुनाव योजना की मांग की। उन्होंने JNU और DU में लिंगदोह सिफारिशों के तहत चुनावों का हवाला दिया। आइसा ने कहा संगठन की जामिया इकाई प्रदर्शन के साथ है और सचिव सौरभ त्रिपाठी ने प्रशासन पर बातचीत के दौरान हमले का आरोप लगाया।

आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि हड़ताली छात्रों की सेहत कैसी रहती है, प्रशासन कोई लिखित समय-सीमा देता है या नहीं, अनुशासनात्मक कार्रवाई की समीक्षा किस नतीजे पर पहुंचती है, और 17 अक्टूबर की घटना पर पुलिस व विश्वविद्यालय का औपचारिक जवाब क्या आता है। यह भी देखा जाएगा कि दीवार पर नारा लेखन मामले में कोई एफआईआर होती है या नहीं और ऑनलाइन कक्षाओं तथा बंद कैंपस की व्यवस्था कब तक चलती है। जामिया का 106वां स्थापना दिवस नजदीक है, जिसके समारोह विश्वविद्यालय पहले ही रद्द कर चुका है।

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