
रांची- शहर के बिरसा चौक के पास भूसुर कोचा बस्ती में बीते दिनों जिला प्रशासन द्वारा भूसुर क्षेत्र में मुख्य मार्ग डीपीएस स्कूल से बिरसा चौक राजमार्ग के किनारे बनी बस्तियों को हटाने के लिए अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया गया था। इस दौरान कई घरों को तोड़ा गया, जिससे वहां रह रहे गरीब परिवार बेघर हो गए। अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बाद कई ऐसे दलित खिलाड़ी बेघर हो गए हैं, जिन्होंने इन्हीं झोपड़ियों में रहकर राष्ट्रीय और राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में झारखंड के लिए पदक जीते थे।
हालांकि इस कारवाई के बाद जनविरोध के बीच झारखंड हाई कोर्ट ने 18 सितंबर को अतिक्रमण-विरोधी अभियान को तुरंत रोकने का आदेश दिया। कोर्ट ने रांची के डिप्टी कमिश्नर और सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस को निर्देश दिया कि वे फ़िलहाल चल रही कार्रवाई को रोक दें। साथ ही, कोर्ट ने कथित अतिक्रमणकारियों को 31 दिसंबर तक का समय दिया कि वे खुद ही सरकारी ज़मीन खाली कर दें।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस आनंद सेन की बेंच ने कहा कि आने वाले त्योहारों के मौसम को देखते हुए, प्रशासन की ओर से की जा रही तत्काल कार्रवाई को टाल दिया जाना चाहिए। हाईकोर्ट की दखल के बाद फिलहाल तो बुल्डोज कारवाई रुक गई है लेकिन यहां के निवासियों को तीन महीने बाद बस्ती हर हाल में खाली करनी ही होगी।
यहाँ की टूटी हुई झोपड़ियों के बीच बिखरे मेडल और प्रमाणपत्र आज उन बच्चों की कहानी कह रहे हैं, जिन्होंने गरीबी और सीमित संसाधनों के बावजूद खेल के मैदान में झारखंड और देश का नाम रोशन किया। लेकिन अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में नायक समाज के दर्जनों परिवारों के घर उजड़ने के बाद अब इन्हीं खिलाड़ियों के सामने अपने खेल से आगे बढ़ने के साथ-साथ सिर पर छत बचाने की चुनौती भी खड़ी हो गई है।
इस बस्ती से करीब सात से आठ राष्ट्रीय स्तर के और 12 से अधिक राज्य स्तरीय खिलाड़ी निकले हैं। इनमें खो-खो खिलाड़ी शिवम नायक, आयुष नायक और रोहन नायक के अलावा मलखंब खिलाड़ी राकेश नायक तथा राष्ट्रीय खिलाड़ी अनुष्का लोहरा शामिल हैं।
बस्ती के टूटे मकानों के बीच खड़े खिलाड़ियों के पदक और प्रमाणपत्र उनकी उपलब्धियों की गवाही देते हैं। लेकिन जिन घरों से निकलकर उन्होंने ये उपलब्धियां हासिल कीं, उन्हीं घरों के उजड़ने के बाद अब उनके सामने रहने और अपने खेल को जारी रखने का संकट खड़ा हो गया है।
भूसुर कोचा बस्ती में रहने वाले अधिकांश परिवार नायक समुदाय से हैं, जो झारखंड में अनुसूचित जाति (SC) की श्रेणी में आते हैं। यहां रहने वाले कई परिवार मूल रूप से गुमला के निवासी हैं। उनके पूर्वज दशकों पहले मजदूरी के लिए आए थे और बाद में इसी इलाके में बस गए।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, कई परिवार यहां 50 से 60 वर्षों से रह रहे थे। बिजली बिल, आधार और मतदाता पहचान पत्र जैसे दस्तावेजों के जरिए भी उनका इस बस्ती से लंबे समय का जुड़ाव सामने आता है।
हालांकि, प्रशासन की ओर से इस जमीन को सरकार और एचईसी की जमीन बताते हुए मकानों को हटाया गया। इस कार्रवाई के बाद कई परिवारों के सामने आवास का संकट खड़ा हो गया है। अदालत के आदेश के बाद 31 दिसंबर तक आगे की तोड़फोड़ पर रोक लगी हुई है। ऐसे में जिन मकानों पर कार्रवाई का खतरा बना हुआ है, वहां रहने वाले परिवार भी अनिश्चितता में हैं।
द फोलोअप के सनी शरद ने मौके पर पहुंचकर नायक समुदाय के इन खिलाडियों का दर्द समझा। राष्ट्रीय स्तर के मलखंब खिलाड़ी राकेश नायक ने बताया कि वह इसी झोपड़ी में रहकर खेल की दुनिया में आगे बढ़े। उनके मुताबिक, उन्होंने विभिन्न प्रतियोगिताओं में झारखंड का प्रतिनिधित्व किया और राज्य के लिए पदक जीते।
राकेश ने कहा, “इसी झोपड़ी से अपना नाम कमाया था। जगह-जगह पर मेरा नाम था। साथ में झारखंड का भी नाम था। मगर आज झारखंड सरकार ने हमारे साथ अच्छा नहीं किया।”
अपने घर को तोड़े जाने से दुखी राकेश ने कहा कि प्रशासन को मकान गिराने से पहले उनके रहने की व्यवस्था करनी चाहिए थी। उन्होंने कहा, “घर तोड़ने से पहले घर दिया होता, फिर तोड़ते तो कुछ हद तक लगता कि यहां तोड़ने से पहले घर दिए हैं। वो भी नहीं मिला।”
राकेश के मुताबिक, उनके परिवार और बस्ती के अन्य खिलाड़ियों ने सीमित संसाधनों के बीच रहकर खेल में अपनी पहचान बनाई थी। उन्होंने बताया कि उनकी झोपड़ी में लगभग सात से आठ राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रहते थे, जबकि राज्य स्तर पर खेलने वाले खिलाड़ियों की संख्या 12 से अधिक थी।
गुमला के मूल निवासी राकेश ने बताया कि उनके परिवार के लोग बचपन से ही यहां रह रहे हैं। उनके पूर्वज काम की तलाश में आए थे और बाद में यहीं बस गए। राकेश ने बताया कि उन्होंने जिला स्तर से खेलना शुरू किया, फिर राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे। उनका अगला लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलना था। उन्होंने अपने खेल करियर में राष्ट्रीय स्तर पर 15 से अधिक पदक और राज्य स्तर पर करीब 18 पदक जीतने की बात कही।
खो-खो खिलाड़ी शिवम नायक भी उन खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिन्होंने इसी बस्ती में रहकर खेल की शुरुआत की और विभिन्न प्रतियोगिताओं में झारखंड का प्रतिनिधित्व किया। उनके पदक और प्रमाणपत्र उनकी उपलब्धियों को दर्शाते हैं, लेकिन उनका घर भी तोड़ दिया गया है।
शिवम के साथी खिलाड़ी और खो-खो खिलाड़ी आयुष नायक ने बताया कि उनका अपना घर फिलहाल बचा हुआ है, लेकिन उसे भी तोड़े जाने का खतरा है। उन्होंने कहा कि उनके घर को तीन महीने का समय दिया गया है।
आयुष ने बताया कि बस्ती के जिन खिलाड़ियों के घर टूट चुके हैं, वे बारिश के दौरान भी परेशान रहे हैं। यदि उनके साथी उनके घर में रहने आते, तो वह उन्हें अपने साथ रख लेते।
जब उनसे पूछा गया कि यदि उनका घर भी तोड़ दिया गया तो वे कहां जाएंगे, तो आयुष ने कहा, “टूटेगा तो यहीं रहेंगे।”
आयुष ने यह भी बताया कि वह पढ़ाई के साथ खो-खो खेलते हैं और प्रतियोगिताओं के लिए राजस्थान तथा बोकारो जा चुके हैं। फिलहाल उन्हें भी सरकार की ओर से किसी सहायता की जानकारी नहीं मिली है।
इस कार्रवाई का असर खिलाड़ियों के साथ-साथ उनके परिवारों पर भी पड़ा है। शिवम नायक की मां अपने टूटे घर की चौखट पर बैठी हैं। उनके सामने सबसे बड़ा सवाल है कि अब परिवार कहां रहेगा और बेटे के खेल का भविष्य क्या होगा।
उन्होंने बताया कि परिवार ने बेटे को खिलाड़ी बनाने के लिए इस उम्मीद से मेहनत की थी कि वह आगे बढ़ेगा और परिवार की स्थिति सुधरेगी।उन्होंने कहा, “सोच के तो बनाए थे। अब क्या करें?”
शिवम की मां के मुताबिक, उनका काम-धंधा भी छूट गया है और आमदनी बंद हो गई है। उन्होंने बताया कि शिवम को अगले महीने किसी प्रतियोगिता में खेलने के लिए जाना था, लेकिन घर उजड़ने के बाद अब उनके सामने उसे भेजने का खर्च जुटाने की चुनौती है।
उन्होंने कहा कि उन्हें ठीक से यह भी नहीं पता कि बेटा कहां खेलने जाने वाला था, लेकिन उसने बताया था कि अगले महीने उसे जाना है।
यह स्थिति उन परिवारों की मुश्किलों को सामने लाती है, जिनके लिए बच्चों का खेलना केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य की उम्मीद भी है।
भूसुर कोचा बस्ती में खिलाड़ियों के बेघर होने का मामला ऐसे समय सामने आया है, जब झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने खेल विभाग की समीक्षा के दौरान कहा था कि किसी खिलाड़ी को सड़क किनारे सब्जी बेचने के लिए मजबूर होने की स्थिति नहीं आनी चाहिए।
इससे पहले रांची में अंतरराष्ट्रीय थ्रोबॉल खिलाड़ी अमरदीप कुमार और तीन बार की गोल्ड मेडलिस्ट पैरा-एथलीट पुष्पा मिंज के सब्जी बेचने की खबरें सामने आने के बाद खिलाड़ियों की आर्थिक स्थिति और रोजगार का मुद्दा चर्चा में आया था। इन खबरों के बाद राज्य सरकार ने खिलाड़ियों को आर्थिक सहायता और खेल नीति के तहत रोजगार उपलब्ध कराने के लिए कदम उठाने के निर्देश दिए थे।
लेकिन भूसुर कोचा के खिलाड़ियों का सवाल अलग है। उनके सामने केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि सिर छिपाने की जगह और खेल जारी रखने की चुनौती भी है।
राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी राधिका नायक भी बस्ती पहुंचीं और प्रभावित परिवारों से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर वीडियो देखने के बाद वह खिलाड़ियों की स्थिति जानने के लिए यहां आईं।
द मूकनायक से बातचीत में राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी रह चुकीं राधिका नायक ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि भूसुर कोचा में रहने वाले बच्चों ने बेहद कठिन परिस्थितियों में खेलकर राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर पदक हासिल किए हैं, लेकिन उनकी मदद के लिए अब तक कोई ठोस व्यवस्था नहीं हुई है।
राधिका खुद भी खिलाड़ी रही हैं। हालांकि, कमजोर आर्थिक स्थिति और पारिवारिक मजबूरियों के कारण उन्हें टीम गेम फुटबॉल छोड़ जेवलीन और डिस्कस थ्रो जैसे व्यक्तिगत गेम चुनना पड़ा। लेकिन उसमे भी ट्रेनिंग के लिए संसाधन नहीं होने के कारण राधिका प्रतिस्पर्धाओं में नहीं शामिल हो सकी और अब वह खेल प्रशिक्षक बनने की तैयारी कर रही हैं। उनका कहना है कि इसी वजह से वह इन बच्चों की परेशानी को और करीब से समझती हैं।
उन्होंने कहा कि जिन बच्चों ने झोपड़ियों में रहते हुए अपने खेल के जरिए झारखंड और देश का नाम रोशन किया, उनके घर टूटने के बाद उनकी स्थिति देखकर वह खुद को रोक नहीं पाईं।
राधिका ने मुख्यमंत्री के उस बयान का हवाला दिया, जिसमें खिलाड़ियों को सब्जी बेचने के लिए मजबूर न होने देने की बात कही गई थी। उन्होंने सवाल उठाया कि जब खिलाड़ी बारिश में भीग रहे थे और उनके घर टूट गए, तब उनकी मदद के लिए कोई मंत्री या विधायक क्यों नहीं पहुंचा।
राधिका ने बताया कि उन्होंने प्रभावित खिलाड़ियों और बच्चों की स्थिति को देखते हुए रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ को भी पत्र लिखकर मदद की गुहार लगाई है।
उनका कहना है कि जिन परिवारों के घर टूट चुके हैं, उनके सामने तत्काल रहने की समस्या है और खिलाड़ियों के सामने अपना प्रशिक्षण तथा प्रतियोगिताओं में भाग लेना जारी रखने की चुनौती है। राधिका चाहती हैं कि सरकार और जनप्रतिनिधि इन बच्चों की उपलब्धियों को देखते हुए उनके लिए विशेष सहायता और पुनर्वास की व्यवस्था करें।
उन्होंने कहा, “इन बच्चों को सिर्फ इसलिए पीछे नहीं छूटना चाहिए क्योंकि वे गरीब परिवारों से आते हैं। इनकी प्रतिभा को बचाना जरूरी है।" उन्होंने कहा, “मेरा नायक समाज के साथ इतना बड़ा अन्याय है। हम लोग चुप नहीं बैठेंगे।” राधिका ने प्रभावित खिलाड़ियों के साथ खड़े रहने और उनकी समस्या को आगे उठाने की बात कही।राधिका ने बहुजन नेताओं, खासकर आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद, से अपील की कि वे भूसुर कोचा आएं और इन बच्चों से मिलें।
“यहां आकर इन बच्चों को देखिए। इन्होंने कितने मेडल जीते हैं। इतनी मुश्किल परिस्थितियों में रहकर ये देश और अपने समाज का नाम रोशन कर रहे हैं, लेकिन इन्हें किसी तरह की मदद नहीं मिल रही है।"
भूसुर कोचा की टूटी झोपड़ियों के बीच बिखरे पदक, प्रमाणपत्र और घरेलू सामान एक ऐसे विरोधाभास को सामने रखते हैं, जिसमें राज्य का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों को अपने ही शहर में रहने की जगह के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। इन खिलाड़ियों के लिए अब सवाल सिर्फ अगला पदक जीतने का नहीं, बल्कि अपने परिवार के साथ सुरक्षित छत के नीचे रहने और खेल की दुनिया में आगे बढ़ने का भी है।
झारखंड हाईकोर्ट के आदेश से फिलहाल उन परिवारों को कुछ समय जरूर मिला है, जिनके घर अभी कार्रवाई की जद में हैं। लेकिन जिन परिवारों के घर पहले ही टूट चुके हैं, उनके लिए सवाल अभी भी वही है, अब जाएं तो जाएं कहां?
और उन खिलाड़ियों के लिए, जिनके मेडल आज भी उनके टूटे घरों की कहानी कह रहे हैं, एक और सवाल है: क्या उनकी प्रतिभा को बचाने के लिए कोई उनके घर के मलबे तक पहुंचेगा?
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