दुष्कर्म पीड़िता की बेटी को मिला था आरोपी का सरनेम, स्कूल ने बदलने से किया इनकार: Bombay HC का फैसला: मां का नाम और 'महार' जाति होगी दर्ज

हाईकोर्ट ने संवैधानिक सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए कहा कि यह धारणा कि पहचान पिता के माध्यम से प्रवाहित होनी चाहिए, पितृसत्तात्मक ढांचे की देन है। इस पर जोर देना महिलाओं और उनके बच्चों पर संरचनात्मक बोझ डालना है।
यह फैसला बदलते समय के साथ मां की जाति के आधार पर बच्चों की जाति  तय करने की दिशा में विचार करने का संकेत देता है।
यह फैसला बदलते समय के साथ मां की जाति के आधार पर बच्चों की जाति तय करने की दिशा में विचार करने का संकेत देता है।एआई निर्मित सांकेतिक चित्र
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औरंगाबाद/बीड- बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने एक ऐतिहासिक और संवेदनशील फैसले में कहा है कि यदि कोई बच्चा पूरी तरह से अपनी एकल माँ द्वारा पाला-पोसा जा रहा है, तो उसे स्कूल रिकॉर्ड में अपनी माँ का नाम, उपनाम और जाति दर्ज कराने का पूरा अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी बच्चे की सार्वजनिक पहचान को एक अनुपस्थित पिता से जोड़कर नहीं देखा जा सकता, जबकि उसके पालन-पोषण का पूरा भार माँ वहन कर रही हो।

यह फैसला एक 12 वर्षीय बालिका और उसकी माँ द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और जस्टिस हितेन एस. वेनेगांवकर की खंडपीठ ने 2 फरवरी को सुनाया। याचिका में बीड के एक स्कूल में दर्ज बच्ची के नाम और जाति में सुधार की मांग की गई थी, जिसे शिक्षा अधिकारियों ने 2 जून 2025 को ठुकरा दिया था।

जैविक पिता ने किया था मां के साथ दुष्कर्म

याचिकाकर्ता बालिका की माँ के साथ उसके जैविक पिता ने बलात्कार किया था। डीएनए रिपोर्ट ने पितृत्व की पुष्टि की, जिसके बाद आरोपी का नाम बच्ची के जन्म प्रमाण पत्र और स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज हो गया। हालांकि, 14 दिसंबर 2022 को दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ, जिसमें आरोपी पिता ने बच्ची की स्थायी अभिरक्षा (कस्टडी) माँ को सौंप दी और भविष्य में उसका कोई रोल नहीं होने की बात कही। इसके बाद माँ ने राजपत्र (गजट) अधिसूचना जारी कर अपनी बेटी का नाम बदलवाया और 9 अप्रैल 2025 को स्कूल प्रशासन से रिकॉर्ड में नाम और जाति (पिता की 'मराठा' से बदलकर माँ की जाति 'अनुसूचित जाति-महार') सुधारने का अनुरोध किया। लेकिन शिक्षा अधिकारी (प्राथमिक) ने 'माध्यमिक स्कूल कोड' (Secondary School Code) का हवाला देते हुए यह कहकर प्रस्ताव खारिज कर दिया कि इस तरह के सुधार की अनुमति नहीं है।

यह पितृसत्ता से संवैधानिक विकल्प की ओर यात्रा है। एक माँ हर मायने में पूर्ण माता-पिता है।
बॉम्बे हाईकोर्ट

अदालत ने अपने फैसले में क्या कहा?

हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग के इस रुख को पूरी तरह से खारिज कर दिया और फैसले में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं।

हाईकोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक रजिस्टर किसी की पहचान को जीवाश्म (fossilise) बनाने के लिए नहीं बल्कि केवल कल्याण और शासन में सहायता के लिए तथ्यों को दर्ज करने के लिए होते हैं। खंडपीठ ने राज्य सरकार के 14 मार्च 2024 के सरकारी प्रस्ताव (जीआर) का हवाला दिया, जो सरकारी दस्तावेजों में माँ का नाम अनिवार्य रूप से शामिल करने का निर्देश देता है।

अदालत ने कहा, "जब राज्य ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि पहचान दस्तावेजीकरण में माँ का नाम केंद्रीय है, तो यह समझना मुश्किल है कि कोई अधीनस्थ प्राधिकारी 'कोई शक्ति नहीं है' जैसे बहाने के पीछे छिपकर ऐसे अनुरोध पर विचार करने से कैसे इनकार कर सकता है।"

अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन में गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है, जिसमें यह भी शामिल है कि पहचान किसी अनुपस्थित माता-पिता से जबरन नहीं जोड़ी जा सकती। 

"एक बच्चा जो पूरी तरह से अपनी माँ द्वारा पाला जा रहा है, उसे पिता का नाम और उपनाम धारण करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, सिर्फ इसलिए कि किसी फॉर्मेट ने कभी ऐसी मांग की थी। यदि वास्तविक अभिभावकत्व मातृसत्तात्मक है, तो रिकॉर्ड पितृसत्तात्मक दृश्यता पर जोर नहीं दे सकता और फिर इसे प्रशासनिक तटस्थता नहीं कह सकता।"

सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दा जाति सुधार का था। राज्य ने तर्क दिया कि जाति सामान्यतः पिता का अनुसरण करती है। अदालत ने इस कठोर धारणा को खारिज कर दिया।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले रमेशभाई दभाई नायका बनाम गुजरात राज्य (2012) का हवाला देते हुए कहा कि अंतरजातीय मामलों में यह धारणा कि बच्चा पिता की जाति लेगा, अंतिम नहीं है। यह बच्चे के पालन-पोषण और सामाजिक परिवेश पर निर्भर करता है। इस मामले में बच्ची का पालन-पोषण पूरी तरह से अपनी माँ के 'महार' समुदाय में हुआ है और उसका पिता से कोई सामाजिक या कानूनी संबंध नहीं है।

अदालत ने कहा, "बच्ची को, उसके शैक्षणिक रिकॉर्ड में, उस व्यक्ति की जातिगत पहचान ढोने के लिए मजबूर करना, जिसने खुद को उससे पूरी तरह से अलग कर लिया है, सामाजिक वास्तविकता और निष्पक्षता के विपरीत होगा।"

हाईकोर्ट ने संवैधानिक सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए कहा कि यह धारणा कि पहचान पिता के माध्यम से प्रवाहित होनी चाहिए, पितृसत्तात्मक ढांचे की देन है। इस पर जोर देना महिलाओं और उनके बच्चों पर संरचनात्मक बोझ डालना है।

पीठ ने आगे कहा, "एकल माँ को उसके बच्चे की नागरिक पहचान के लिए एक पूर्ण माता-पिता के रूप में मान्यता देना कोई दान नहीं है; यह संवैधानिक निष्ठा है। यह पितृसत्तात्मक दबाव से संवैधानिक विकल्प की ओर, भाग्य के रूप में वंश से अधिकार के रूप में गरिमा की ओर एक आंदोलन को दर्शाता है।"

हाईकोर्ट ने शिक्षा अधिकारी के 2 जून 2025 के आदेश को रद्द करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. नाम सुधार: स्कूल के प्रधानाध्यापक गजट अधिसूचना के आधार पर बच्ची के नाम में संशोधन का प्रस्ताव शिक्षा अधिकारी को भेजेंगे जो केस के अनुसार सुधार करेंगे।

  2. जाति सुधार: मुख्याध्यापक स्कूल रिकॉर्ड में बच्ची के पिता की जाति 'मराठा' के स्थान पर उसकी माँ की जाति 'अनुसूचित जाति-महार' दर्ज करेंगे।

  3. जाति प्रमाण पत्र: माँ को अपनी जाति के आधार पर बच्ची के लिए जाति प्रमाण पत्र जारी करने का आवेदन करने की अनुमति दी गई है। संबंधित प्राधिकारी इस आवेदन पर संवेदनशीलता और तथ्यों के आधार पर शीघ्रता से विचार करेगा।

  4. सुरक्षा: अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान बच्ची को किसी भी प्रकार के कलंक, उत्पीड़न या अनावश्यक सार्वजनिक चर्चा का सामना न करना पड़े।

यह फैसला बदलते समय के साथ मां की जाति के आधार पर बच्चों की जाति  तय करने की दिशा में विचार करने का संकेत देता है।
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