'शूद्रों को उच्च वर्गों की सेवा करनी चाहिए’: IIT मंडी में जन्माष्टमी पर जाति आधारित पोस्टर पर बवाल, निदेशक ने बिठाई जांच

संस्थान ने पोस्टर की सामग्री से खुद को अलग कर लिया है और स्पष्ट किया है कि वह जातिगत भेदभाव का समर्थन नहीं करता।
पोस्टर में चार सामाजिक समूहों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का उल्लेख किया गया था। इसमें ब्राह्मणों के लिए “ईश्वर का संदेश फैलाना”, क्षत्रियों के लिए “समाज और आध्यात्मिकता की रक्षा करना” और वैश्यों के लिए “अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना तथा दूसरों की सहायता करना” जैसी भूमिकाएं लिखी गई थीं। वहीं शूद्रों के लिए “उच्च वर्गों की सेवा करना” लिखा था। यही हिस्सा विवाद का मुख्य कारण बना।
पोस्टर में चार सामाजिक समूहों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का उल्लेख किया गया था। इसमें ब्राह्मणों के लिए “ईश्वर का संदेश फैलाना”, क्षत्रियों के लिए “समाज और आध्यात्मिकता की रक्षा करना” और वैश्यों के लिए “अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना तथा दूसरों की सहायता करना” जैसी भूमिकाएं लिखी गई थीं। वहीं शूद्रों के लिए “उच्च वर्गों की सेवा करना” लिखा था। यही हिस्सा विवाद का मुख्य कारण बना। ग्राफिक- द मूकनायक
Published on

मंडी: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मंडी में जन्माष्टमी समारोह के दौरान लगाए गए एक पोस्टर को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। पोस्टर में समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्गों में बांटते हुए अलग-अलग भूमिकाएं बताई गई थीं। इसमें शूद्रों की भूमिका “उच्च वर्गों की सेवा करना” बताई गई, जिसके बाद सोशल मीडिया पर संस्थान की आलोचना शुरू हो गई। विवाद बढ़ने के बाद IIT मंडी ने मामले की जांच के लिए समिति गठित कर दी है।

संस्थान के निदेशक प्रोफेसर लक्ष्मीधर बेहरा ने पोस्टर की निंदा करते हुए स्पष्ट किया है कि इसे IIT मंडी ने किसी भी रूप में अनुमोदित नहीं किया था। सभी स्टूडेंट्स को किये गये मेल में निदेशक ने लिखा, " यह संस्थान समानता, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक सोच और हमारे संविधान में शामिल अन्य सभी मूल्यों को बनाए रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। संस्थान जाति-आधारित भेदभाव के किसी भी रूप की कड़ी निंदा करता है। मैं इस मामले में आपके सहयोग की अपेक्षा करता हूँ ताकि हम सब मिलकर किसी भी रूप में ऐसे पूर्वाग्रहों या भेदभाव के खिलाफ खड़े हो सकें।"

विवादित पोस्टर
विवादित पोस्टर

जन्माष्टमी समारोह के दौरान लगाया गया था पोस्टर

विवादित पोस्टर " भगवत गीता- द टाइमलेस विसडम शीर्षक से था और इसे संस्थान के सभागार के बाहर लगाया गया था। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक यह पोस्टर 4 सितंबर को जन्माष्टमी समारोह के दौरान प्रदर्शित किया गया था। IIT मंडी के निदेशक ने इसे एक छात्र-आधारित कार्यक्रम का हिस्सा बताया है।

पोस्टर में चार सामाजिक समूहों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का उल्लेख किया गया था। इसमें ब्राह्मणों के लिए “ईश्वर का संदेश फैलाना”, क्षत्रियों के लिए “समाज और आध्यात्मिकता की रक्षा करना” और वैश्यों के लिए “अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना तथा दूसरों की सहायता करना” जैसी भूमिकाएं लिखी गई थीं। वहीं शूद्रों के लिए “उच्च वर्गों की सेवा करना” लिखा था। यही हिस्सा विवाद का मुख्य कारण बना।

पोस्टर में भगवद्गीता के एक श्लोक का भी उल्लेख किया गया था, जिसमें समाज के चार विभाजनों को प्रकृति के तीन गुणों और उनसे जुड़े कर्मों के आधार पर बताया गया है। हालांकि, पोस्टर में इस विचार की जिस तरह व्याख्या की गई, उसे लेकर सोशल मीडिया पर तीखी आपत्तियां सामने आईं।

विवाद सामने आने के शुरुआती चरण में IIT मंडी के रजिस्ट्रार कुमार संभवन पांडेय ने कहा था कि जिस कार्यक्रम में पोस्टर प्रदर्शित किया गया, वह संस्थान द्वारा आधिकारिक रूप से आयोजित नहीं था। उन्होंने कहा था कि संभव है कि इसे जन्माष्टमी के अवसर पर किसी छात्र समूह ने प्रदर्शित किया हो और संस्थान ने न तो इसका समर्थन किया था और न ही इसमें योगदान दिया था। उन्होंने मामले को देखने की बात कही थी।इसके बाद मामले में IIT मंडी की ओर से नया और अधिक स्पष्ट कदम सामने आया है।

IIT मंडी के निदेशक प्रोफेसर लक्ष्मीधर बेहरा ने रविवार को संस्थान के समुदाय को भेजे ईमेल में पोस्टर की कड़ी निंदा की। निदेशक के मुताबिक उन्हें पोस्टर के बारे में जानकारी मिलने पर झटका लगा। उन्होंने कहा कि पोस्टर को IIT मंडी ने “किसी भी रूप में” अनुमोदित नहीं किया था। उन्होंने यह भी कहा कि स्वयं वे हर फोरम पर जातिगत भेदभाव का विरोध करते रहे हैं और संस्थान जाति आधारित भेदभाव के किसी भी रूप की निंदा करता है।

बेहरा ने कहा कि उन्होंने मामले की जांच के लिए एक समिति गठित की है ताकि संस्थान के परिसर का इस्तेमाल सामाजिक सौहार्द के उल्लंघन के लिए न हो। उन्होंने उन लोगों के प्रति सहानुभूति भी व्यक्त की जिन्हें इस घटना से ठेस पहुंची है।

उन्होंने IIT मंडी की प्रतिबद्धता को समानता, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संविधान में निहित सिद्धांतों से जोड़ा और परिसर के सदस्यों से जातिगत पूर्वाग्रह और भेदभाव के खिलाफ खड़े होने की अपील की।

निदेशक ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में बताया कि पोस्टर एक छात्र-आधारित कार्यक्रम के लिए तैयार किया गया था। मामले की जांच के लिए बनाई गई समिति में संकाय सदस्यों के साथ अलग-अलग सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है। इनमें अनुसूचित जाति (SC) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के प्रतिनिधि भी शामिल हैं।

बेहरा ने यह भी कहा कि वह कुछ समय से संस्थान से बाहर थे और शनिवार को लौटे। उनके अनुसार उन्हें इस विवाद की जानकारी रविवार सुबह मिली। उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वयं पोस्टर नहीं देखा है और जांच समिति को मामले की पड़ताल करने देना चाहते हैं।

सोशल मीडिया पर क्यों उठा विवाद?

पोस्टर की तस्वीर सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद कई लोगों ने सवाल उठाया कि देश के प्रमुख उच्च शिक्षण और शोध संस्थानों में से एक IIT के परिसर में जाति आधारित भूमिकाओं को इस तरह कैसे प्रदर्शित किया जा सकता है।

सोशल मीडिया पर आलोचना करने वालों ने इसे समानता और गरिमा के मूल्यों के विपरीत बताया। कुछ लोगों ने सवाल किया कि क्या किसी शैक्षणिक संस्थान के परिसर में इस तरह की जातिगत श्रेणीकरण वाली सामग्री प्रदर्शित की जानी चाहिए।

हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस मामले में अब तक किसी व्यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने की पुष्टि नहीं हुई है। वर्तमान में IIT मंडी ने आंतरिक जांच शुरू की है और समिति यह देखेगी कि पोस्टर किसने तैयार किया, उसे किस परिस्थिति में परिसर में प्रदर्शित किया गया।

IIT मंडी की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध आरक्षण प्रकोष्ठ की जानकारी के अनुसार संस्थान सभी संकाय सदस्यों, अधिकारियों, विद्यार्थियों और कर्मचारियों के लिए ऐसा वातावरण बनाए रखने की बात करता है जो जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव से मुक्त हो। प्रकोष्ठ SC, ST, OBC और दिव्यांग विद्यार्थियों तथा कर्मचारियों की शिकायतों के निवारण से भी जुड़ा है।

यही वजह है कि मौजूदा विवाद में जांच समिति की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल संस्थान ने पोस्टर की सामग्री से खुद को अलग कर लिया है और स्पष्ट किया है कि वह जातिगत भेदभाव का समर्थन नहीं करता।

अब जांच का मुख्य सवाल यही है कि विवादित पोस्टर किसने तैयार किया, उसे परिसर में किस अनुमति या प्रक्रिया के तहत लगाया गया और क्या इसके लिए संस्थान के किसी नियम का उल्लंघन हुआ। समिति की जांच के बाद ही इन सवालों पर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होगी।

पोस्टर में चार सामाजिक समूहों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का उल्लेख किया गया था। इसमें ब्राह्मणों के लिए “ईश्वर का संदेश फैलाना”, क्षत्रियों के लिए “समाज और आध्यात्मिकता की रक्षा करना” और वैश्यों के लिए “अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना तथा दूसरों की सहायता करना” जैसी भूमिकाएं लिखी गई थीं। वहीं शूद्रों के लिए “उच्च वर्गों की सेवा करना” लिखा था। यही हिस्सा विवाद का मुख्य कारण बना।
स्वतंत्र भारद्वाज की गिरफ्तारी के बाद दलित कंटेंट क्रिएटर निशु के घर पथराव, पुलिस से मांगी सुरक्षा
पोस्टर में चार सामाजिक समूहों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का उल्लेख किया गया था। इसमें ब्राह्मणों के लिए “ईश्वर का संदेश फैलाना”, क्षत्रियों के लिए “समाज और आध्यात्मिकता की रक्षा करना” और वैश्यों के लिए “अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना तथा दूसरों की सहायता करना” जैसी भूमिकाएं लिखी गई थीं। वहीं शूद्रों के लिए “उच्च वर्गों की सेवा करना” लिखा था। यही हिस्सा विवाद का मुख्य कारण बना।
लिव-इन पार्टनर की हत्या के आरोपी की सरेआम पिटाई: गुजरात पुलिस बोली- "अपराधी डरेंगे, मिसाल कायम होगी" लेकिन सवाल मानवाधिकार का
पोस्टर में चार सामाजिक समूहों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का उल्लेख किया गया था। इसमें ब्राह्मणों के लिए “ईश्वर का संदेश फैलाना”, क्षत्रियों के लिए “समाज और आध्यात्मिकता की रक्षा करना” और वैश्यों के लिए “अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना तथा दूसरों की सहायता करना” जैसी भूमिकाएं लिखी गई थीं। वहीं शूद्रों के लिए “उच्च वर्गों की सेवा करना” लिखा था। यही हिस्सा विवाद का मुख्य कारण बना।
TM Special | जिस यूनिवर्सिटी को बचपन में स्कूल के बाहर से देखा, वहीं मिला गोल्ड मेडल; एक दलित युवा की शिक्षा, संघर्ष और सपनों की कहानी
पोस्टर में चार सामाजिक समूहों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का उल्लेख किया गया था। इसमें ब्राह्मणों के लिए “ईश्वर का संदेश फैलाना”, क्षत्रियों के लिए “समाज और आध्यात्मिकता की रक्षा करना” और वैश्यों के लिए “अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना तथा दूसरों की सहायता करना” जैसी भूमिकाएं लिखी गई थीं। वहीं शूद्रों के लिए “उच्च वर्गों की सेवा करना” लिखा था। यही हिस्सा विवाद का मुख्य कारण बना।
“तुम्हें फेलोशिप जाति के कारण मिली…”: केरल की इस यूनिवर्सिटी में दलित शोध छात्रा का सम्मान के लिए एक साल से संघर्ष, नेहा बोरा साथ देंगी!

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

द मूकनायक को सब्सक्राइब करें

'द मूकनायक' जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है। अगर आप भी चाहते हैं कि 'द मूकनायक' हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहें तो सब्सक्राइब करें।

यहां सब्सक्राइब करें
The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com