TM Special | जिस यूनिवर्सिटी को बचपन में स्कूल के बाहर से देखा, वहीं मिला गोल्ड मेडल; एक दलित युवा की शिक्षा, संघर्ष और सपनों की कहानी

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में आने के बाद अमय ने बीबीएयू की सामाजिक न्याय से जुड़ी विशिष्ट भूमिका को भी समझा। उन्होंने जाना कि यह एक विशेष अधिनियम के तहत स्थापित केंद्रीय विश्वविद्यालय है और यहां एससी-एसटी विद्यार्थियों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण है।
अमय की कहानी में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी उपलब्धि को केवल एक गोल्ड मेडल की तस्वीर में नहीं देखा जा सकता। उनकी यात्रा में शिक्षा, व्यक्तिगत अनुभव, कानूनी समझ, सामाजिक सरोकार और छात्र नेतृत्व एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।
अमय की कहानी में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी उपलब्धि को केवल एक गोल्ड मेडल की तस्वीर में नहीं देखा जा सकता। उनकी यात्रा में शिक्षा, व्यक्तिगत अनुभव, कानूनी समझ, सामाजिक सरोकार और छात्र नेतृत्व एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।ग्राफिक- द मूकनायक
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लखनऊ- बचपन में जिस विश्वविद्यालय को एक छात्र ने अपने स्कूल की खिड़की और रास्ते से देखा था, कुछ वर्षों बाद वही विश्वविद्यालय उसके लिए केवल पढ़ाई की जगह नहीं रहा। वह वहां का छात्र बना, कानून की पढ़ाई की, अकादमिक और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों में हिस्सा लिया, छात्र राजनीति के जरिए विद्यार्थियों के मुद्दे उठाए, कानूनी जागरूकता के काम से जुड़ा और आखिरकार उसी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में गोल्ड मेडल हासिल किया।

यह कहानी है अमय सोनकर की, जिन्हें 29 अगस्त को बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू), लखनऊ के 11वें दीक्षांत समारोह में अनुसूचित जाति श्रेणी में गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया। उन्होंने 2021-2026 सत्र में बीबीएयू से बीबीए एलएलबी (ऑनर्स) की पढ़ाई पूरी की और 82.5 प्रतिशत अंक हासिल किए।

लेकिन अमय के लिए यह पदक केवल एक अकादमिक उपलब्धि नहीं है। उनके मुताबिक, इसके पीछे परिवार की आर्थिक चुनौतियां, पिता से मिले आंबेडकरवादी विचार, जातिगत भेदभाव के व्यक्तिगत अनुभव, कानून को समझने की इच्छा, छात्र राजनीति, कानूनी जागरूकता और शिक्षा को सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखने की सोच का लंबा सफर है।

अमय का जन्म 2001 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रसड़ा में एक आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे अनुसूचित जाति परिवार में हुआ। उनकी मां ने घर संभाला, जबकि उनके पिता परिवार के लिए काम करते रहे। अमय बताते हैं कि सीमित संसाधनों के बावजूद उनके घर में शिक्षा और सामाजिक समानता को विशेष महत्व दिया जाता था।

उनके पिता मानवाधिकार में पोस्ट ग्रेजुएट हैं और आंबेडकरवादी आंदोलन से जुड़े रहे हैं। उन्होंने बामसेफ के संयोजक के रूप में भी काम किया। अमय के अनुसार, उनके पिता ने 1986 से 2001 के बीच बलिया जिले में मान्यवर कांशीराम साहेब की कई बैठकों का आयोजन किया और बहुजनों को उनके सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों के प्रति जागरूक करने का काम किया।

अमय कहते हैं कि उनके पिता उनके पहले शिक्षक रहे। बचपन से ही उन्होंने पिता को बाबासाहेब डॉ. बी. आर. आंबेडकर के संघर्ष, विचार और दर्शन पर बात करते सुना। उनके लिए सम्मान, समानता और सामाजिक न्याय की समझ इसी पारिवारिक वातावरण में विकसित हुई।

स्कूल के सामने था बीबीएयू, वहीं पढ़ने का सपना देखा

अमय ने अपनी शुरुआती पढ़ाई रसड़ा के सेंट मैरी स्कूल से की। पिता के आजमगढ़ स्थानांतरण के बाद उन्होंने सेंट जेवियर्स स्कूल में पढ़ाई जारी रखी। बाद में परिवार लखनऊ आ गया और उन्होंने द मिलेनियम स्कूल, लखनऊ में दाखिला लिया। उन्होंने कक्षा 10 और 12 दोनों में 75 प्रतिशत से अधिक अंक हासिल किए।

उनके स्कूल के ठीक सामने बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय था। अमय कहते हैं रोज स्कूल जाते समय उसकी नजर विश्वविद्यालय पर पड़ती थी।

पिता से बाबासाहेब के बारे में सुनते हुए बड़े हुए अमय के लिए बाबासाहेब के नाम पर बने विश्वविद्यालय को देखना सामान्य अनुभव नहीं था। धीरे-धीरे उनके मन में यह सपना बनने लगा कि एक दिन वह भी बीबीएयू के छात्र होंगे। उस समय वे इस जुड़ाव को पूरी तरह शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते थे, लेकिन उनके भीतर यह इच्छा स्पष्ट थी कि उन्हें इस विश्वविद्यालय में पढ़ना है।

अमय ने स्नातक स्तर पर ही कानूनी शोध में रुचि विकसित की। उन्होंने खाद्य सुरक्षा और जेलों में जातिगत भेदभाव जैसे विषयों पर शोध पत्र लिखे और प्रकाशित किए।
अमय ने स्नातक स्तर पर ही कानूनी शोध में रुचि विकसित की। उन्होंने खाद्य सुरक्षा और जेलों में जातिगत भेदभाव जैसे विषयों पर शोध पत्र लिखे और प्रकाशित किए।

कानून केवल करियर का विकल्प नहीं

अमय के मुताबिक, स्कूल के दिनों में उन्हें जातिगत भेदभाव के कुछ ऐसे अनुभवों से गुजरना पड़ा, जिन्होंने उनके सोचने का तरीका बदल दिया। उस समय उनकी उम्र करीब 16-17 वर्ष थी।

उनका कहना है कि इससे पहले जातिगत भेदभाव उनके लिए मुख्यतः एक ऐसी समस्या थी, जिसके बारे में उन्होंने सुना या जाना था। लेकिन जब उन्होंने इसे स्वयं अनुभव किया, तो उन्हें इसकी वास्तविकता और पीड़ा का एहसास हुआ। उनके लिए यह सवाल भी महत्वपूर्ण था कि एक शिक्षक किसी विद्यार्थी को उसकी जाति के आधार पर अलग व्यवहार क्यों करे।

इन्हीं अनुभवों ने उनके भीतर कानून को समझने की इच्छा पैदा की। अमय के अनुसार, वे जानना चाहते थे कि उनके साथ ऐसा क्यों हुआ, वे इस तरह के अन्याय पर सवाल कैसे उठा सकते हैं और बहुजनों के अधिकारों के लिए किस तरह प्रभावी ढंग से खड़ा हुआ जा सकता है।

इसलिए उनके लिए कानून केवल करियर का विकल्प नहीं था। उनके शब्दों में, कानून की पढ़ाई उनके व्यक्तिगत अनुभवों से निकली उस इच्छा का परिणाम थी, जिसके जरिए वे अन्याय को समझना और उसे चुनौती देने के साधन हासिल करना चाहते थे।

2021 में अमय ने बीबीएयू की प्रवेश परीक्षा दी और बीबीए एलएलबी कार्यक्रम में प्रवेश हासिल किया। उनके लिए यह भावनात्मक क्षण था, क्योंकि जिस विश्वविद्यालय को उन्होंने अपने स्कूल के बाहर से रोज देखा था, अब अगले पांच वर्षों के लिए वही उनका शैक्षणिक परिसर बनने जा रहा था।

विश्वविद्यालय में आने के बाद उन्होंने बीबीएयू की सामाजिक न्याय से जुड़ी विशिष्ट भूमिका को भी समझा। अमय के अनुसार, उन्होंने जाना कि यह एक विशेष अधिनियम के तहत स्थापित केंद्रीय विश्वविद्यालय है और यहां एससी-एसटी विद्यार्थियों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण है। उनके मुताबिक, विश्वविद्यालय के छात्र समुदाय में भी एससी-एसटी पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों की बड़ी संख्या है।

इसी वजह से अमय ने विश्वविद्यालय को केवल डिग्री हासिल करने की जगह के रूप में नहीं देखा। उनके लिए यह विद्यार्थियों और उन समुदायों के लिए काम करने का अवसर भी बना, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से समान अवसरों से वंचित रखा गया है।

विश्वविद्यालय में आने के बाद उन्होंने बीबीएयू की सामाजिक न्याय से जुड़ी विशिष्ट भूमिका को भी समझा।
विश्वविद्यालय में आने के बाद उन्होंने बीबीएयू की सामाजिक न्याय से जुड़ी विशिष्ट भूमिका को भी समझा।

छात्र राजनीति के साथ पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान

बीबीएयू में पढ़ाई के साथ अमय छात्र राजनीति और अन्य गतिविधियों में सक्रिय रहे, लेकिन उनके अनुसार इसका असर उनकी पढ़ाई पर नहीं पड़ा। बीबीए एलएलबी के दौरान उन्होंने कई अकादमिक और सह-पाठ्यक्रम प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और उनमें सफलता हासिल की।

उन्होंने विश्वविद्यालय की विभिन्न कानूनी समितियों में काम किया और बीबीएयू की मूट कोर्ट समिति के सह-संयोजक और बाद में संयोजक रहे। इसी दौरान उन्होंने पहली और दूसरी बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर राष्ट्रीय मूट कोर्ट प्रतियोगिता आयोजित की। इसके अलावा वे राष्ट्रीय और राज्य स्तर के कई सेमिनारों और अकादमिक कार्यक्रमों में अलग-अलग भूमिकाओं में शामिल हुए।

उनके लिए कानूनी शिक्षा का अर्थ केवल कक्षा, परीक्षा और प्रतियोगिताओं तक सीमित रहना नहीं था। वे इसे बाबासाहेब की विरासत और सामाजिक न्याय के सवालों से जोड़कर देखते रहे।

अमय ने स्नातक स्तर पर ही कानूनी शोध में रुचि विकसित की। उन्होंने खाद्य सुरक्षा और जेलों में जातिगत भेदभाव जैसे विषयों पर शोध पत्र लिखे और प्रकाशित किए। उनके कुछ अन्य शोध पत्र फिलहाल समीक्षा के अधीन हैं।

उन्होंने कई सरकारी और कानूनी संस्थानों में इंटर्नशिप भी की। इनमें हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के साथ काम करने के अवसर, राज्य और सरकारी प्राधिकरणों के साथ इंटर्नशिप तथा हाईकोर्ट और जिला अदालतों में प्रैक्टिस करने वाले निजी अधिवक्ताओं के साथ काम शामिल था। उनके अनुसार, इन अनुभवों ने उन्हें अदालतों, कानूनी संस्थानों और न्याय व्यवस्था की व्यावहारिक समझ दी।

अमय का मानना रहा कि कानूनी शिक्षा का अंतिम उद्देश्य समाज की सेवा होना चाहिए।
अमय का मानना रहा कि कानूनी शिक्षा का अंतिम उद्देश्य समाज की सेवा होना चाहिए।

स्लम क्षेत्रों में कानूनी जागरूकता से जुड़ा काम

अमय का मानना रहा कि कानूनी शिक्षा का अंतिम उद्देश्य समाज की सेवा होना चाहिए। इसी सोच के साथ वे स्लम क्षेत्रों में कानूनी सहायता से जुड़ी पहलों में शामिल हुए और उन्हें आयोजित करने में मदद की।

इन पहलों के दौरान आर्थिक और सामाजिक रूप से हाशिये पर रहने वाले लोगों से बातचीत की गई। उन्हें बुनियादी कानूनी जानकारी दी गई, उनके अधिकारों के बारे में बताया गया और उपलब्ध कानूनी उपायों को समझाने का प्रयास किया गया।

इन अनुभवों ने अमय के भीतर यह विश्वास और मजबूत किया कि कानून की जटिलता के अलावा जानकारी, मार्गदर्शन और संसाधनों की कमी भी आम लोगों के लिए न्याय तक पहुंच में बाधा बनती है।

अमय के छात्र राजनीति में आने के फैसले में उनके पिता की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। वे बताते हैं कि जब उन्होंने छात्र राजनीति में प्रवेश करने का फैसला किया, तो उनके पिता ने उन्हें रोकने के बजाय बहुजनों के अधिकारों के लिए खड़े होने और लोगों की मदद करने के लिए प्रोत्साहित किया।

अमय के अनुसार, उनके पिता अक्सर उनसे कहते थे: “हम लोग नहीं बोलेंगे तो कौन बोलेगा? बाबासाहेब ने जो करा है, हमें किसी तरह आगे बढ़ाना है।”

अमय के लिए यह समर्थन महत्वपूर्ण था। इसी प्रोत्साहन ने उन्हें छात्र राजनीति में सक्रिय होकर विद्यार्थियों और सामाजिक मुद्दों पर काम करने का साहस दिया।

अमय ने छात्र कल्याण, भेदभाव, एससी-एसटी विद्यार्थियों के खिलाफ हिंसा और विद्यार्थियों से जुड़े अन्य मुद्दों पर काम किया।
अमय ने छात्र कल्याण, भेदभाव, एससी-एसटी विद्यार्थियों के खिलाफ हिंसा और विद्यार्थियों से जुड़े अन्य मुद्दों पर काम किया।

बीबीएयू में छात्र संगठन और विद्यार्थियों के मुद्दे

अमय ने नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) के माध्यम से छात्र राजनीति और छात्र कल्याण से जुड़े काम किए। बीबीएयू में 2022-23 में छात्र संघ अध्यक्ष बने, उन्होंने अपने अनुसार विश्वविद्यालय की पहली औपचारिक छात्र इकाई गठित की, जिसमें 15 सदस्यीय संरचित समिति और पदाधिकारी शामिल थे।

इस मंच के माध्यम से उन्होंने छात्र कल्याण, भेदभाव, एससी-एसटी विद्यार्थियों के खिलाफ हिंसा और विद्यार्थियों से जुड़े अन्य मुद्दों पर काम किया। एक सदस्यता अभियान के दौरान 15 दिनों में 500 से अधिक विद्यार्थियों से जुड़े।

इसके बाद उन्हें एनएसयूआई उत्तर प्रदेश का प्रदेश सचिव बनाया गया, जहां उन्हें श्रावस्ती और कानपुर विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी मिली। उन्होंने विभिन्न स्तरों पर संगठनात्मक ढांचे और इकाइयां बनाने का काम किया।

इसके बाद वे रायबरेली में चुनाव प्रभारी रहे और फिर एनएसयूआई के राष्ट्रीय समन्वयक बने। इस भूमिका में उन्हें गुजरात, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव की जिम्मेदारी दी गई।

अमित शाह का विरोध
अमित शाह का विरोध

बाबासाहेब के सम्मान के मुद्दे पर विरोध और उसके बाद की मुश्किलें

अमय के छात्र जीवन में एक ऐसा प्रसंग भी आया, जिसे वे अपनी यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। अमित शाह की ओर से बाबासाहेब डॉ. बी. आर. आंबेडकर को लेकर की गई टिप्पणियों के बाद उन्होंने बीबीएयू में विरोध प्रदर्शन आयोजित किया।

अमय बताते हैं कि उस समय तक बाबासाहेब उनके लिए केवल एक नाम नहीं थे। शिक्षा, गरिमा और समानता को लेकर उनकी समझ में बाबासाहेब के विचार केंद्रीय भूमिका ले चुके थे। इसी वजह से उन्होंने विरोध करना जरूरी समझा। उन्होंने बीबीएयू में अमित शाह का पुतला जलाकर प्रदर्शन किया।

अमय के अनुसार, इस प्रदर्शन के बाद उन्हें विश्वविद्यालय में इसके परिणामों का सामना करना पड़ा। वे कहते हैं कि इस घटना ने उन्हें यह समझाया कि अपने विश्वासों के साथ खड़े रहने की व्यक्तिगत कीमत भी हो सकती है।

उनके सक्रिय छात्र जीवन के दौरान उन्हें विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कई तरह की कार्रवाई और औपचारिक नोटिसों का सामना भी करना पड़ा। एक अवसर पर उनके अनुसार, प्रॉक्टर ने उन्हें बिना किसी स्पष्टीकरण के आठ घंटे से अधिक समय तक विश्वविद्यालय परिसर में बंद रखा।

इन मुश्किल परिस्थितियों में अमय को अपने कानून विभाग से महत्वपूर्ण समर्थन मिला। वे अपने कानून विभाग के प्रोफेसरों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने कठिन समय में उनका मार्गदर्शन किया और उनका साथ दिया। वे विशेष रूप से अपने विभागाध्यक्ष के सहयोग, मार्गदर्शन और आशीर्वाद को अपनी यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हैं।

CLAT PG में SC ऑल इंडिया रैंक 84, यूपी रैंक 18

बीबीए एलएलबी के नौवें सेमेस्टर के दौरान अमय ने आगे की पढ़ाई को लेकर गंभीरता से तैयारी शुरू की। उनका लक्ष्य किसी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में पढ़ाई करना था। उन्होंने CLAT PG 2026 की तैयारी की और परीक्षा में ऑल इंडिया एससी रैंक 84 और उत्तर प्रदेश एससी रैंक 18 हासिल की। इसके बाद उन्हें डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (आरएमएलएनएलयू), लखनऊ के एलएलएम कार्यक्रम में प्रवेश मिला।

उन्होंने ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (एआईबीई) भी दिया और अपने पहले प्रयास में इसे पास किया। इसके बाद जून 2026 में उन्होंने यूजीसी-नेट की परीक्षा दी। अमय के अनुसार, शुरुआत में उन्होंने इसे एक तरह के प्रयास के रूप में लिया था क्योंकि वे उस समय अभी पीजी स्तर की पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन वे पीएचडी प्रवेश के लिए यूजीसी-नेट क्वालिफाई करने में सफल रहे।

11वें दीक्षांत समारोह में उन्हें अनुसूचित जाति श्रेणी में गोल्ड मेडल प्रदान किया गया।
11वें दीक्षांत समारोह में उन्हें अनुसूचित जाति श्रेणी में गोल्ड मेडल प्रदान किया गया।

फिर आया वह दिन, जिसे अमय अपनी पूरी शैक्षणिक यात्रा का सबसे भावनात्मक क्षण मानते हैं।

29 अगस्त 2026 को बीबीएयू के 11वें दीक्षांत समारोह में उन्हें अनुसूचित जाति श्रेणी में गोल्ड मेडल प्रदान किया गया। उन्होंने बीबीए एलएलबी में 82.5 प्रतिशत अंक हासिल किए थे।

इस उपलब्धि की खासियत अमय के लिए केवल गोल्ड मेडल नहीं है। जिस विश्वविद्यालय को उन्होंने बचपन में अपने स्कूल के सामने से देखा था और जहां पढ़ने का सपना देखा था, उसी विश्वविद्यालय में वर्षों बाद वे छात्र के रूप में पढ़े और फिर उसी परिसर में गोल्ड मेडल प्राप्त किया।

उनके लिए यह यात्रा एक तरह से पूरी तरह गोल होकर वापस उसी जगह पहुंचने जैसी थी। विश्वविद्यालय के बाहर से उसे देखने वाला बच्चा उसी विश्वविद्यालय के भीतर कानून का विद्यार्थी बना और फिर उसी संस्थान से अपनी शैक्षणिक उपलब्धि के लिए सम्मानित हुआ।

अमय बाबासाहेब डॉ. बी. आर. आंबेडकर को अपना आदर्श मानते हैं। बचपन में पिता से मिले उनके विचारों का प्रभाव बीबीएयू में बिताए वर्षों के दौरान और गहरा हुआ।

उनके लिए बाबासाहेब की सबसे प्रेरणादायक विरासत शिक्षा, समानता, गरिमा, संवैधानिकता और सामाजिक परिवर्तन की सोच है। इसी वजह से वे गोल्ड मेडल को केवल अकादमिक प्रदर्शन की मान्यता नहीं मानते। उनके अनुसार, शिक्षा के साथ जिम्मेदारी भी आती है।

यही विचार उनकी आगे की योजना में भी दिखाई देता है। गोल्ड मेडल के बाद अमय का सफर रुकने वाला नहीं है। वे वर्तमान में आरएमएलएनएलयू, लखनऊ में एलएलएम कर रहे हैं। आगे उनका लक्ष्य पीएचडी करना और अकादमिक क्षेत्र में प्रवेश करना है।

वे कानूनी शोध और अध्यापन के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं। इसके साथ ही वे आंबेडकरवादी आंदोलन से जुड़े रहकर बहुजन समुदायों के सशक्तीकरण में योगदान देना चाहते हैं।

उनकी दीर्घकालिक आकांक्षा शिक्षा, कानूनी जागरूकता, शोध और सामाजिक भागीदारी के माध्यम से एक मजबूत आंबेडकरवादी आंदोलन के निर्माण में योगदान देना है। वे उन लोगों के लिए काम करना चाहते हैं जो भेदभाव और असमानता का सामना करते हैं या जिन्हें अपने अधिकारों की जानकारी और ज्ञान तक पर्याप्त पहुंच नहीं मिलती।

दूसरे दलित युवाओं के लिए क्या संदेश देती है यह यात्रा?

अमय की कहानी में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी उपलब्धि को केवल एक गोल्ड मेडल की तस्वीर में नहीं देखा जा सकता। उनकी यात्रा में शिक्षा, व्यक्तिगत अनुभव, कानूनी समझ, सामाजिक सरोकार और छात्र नेतृत्व एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।

एक आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे अनुसूचित जाति परिवार से निकलकर बीबीएयू में प्रवेश करना, उसी विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई करते हुए अकादमिक उपलब्धि हासिल करना, शोध और कानूनी अनुभव जुटाना, विद्यार्थियों के मुद्दों पर काम करना, छात्र राजनीति में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाना, CLAT PG में एससी श्रेणी में ऑल इंडिया रैंक 84 हासिल करना, एआईबीई पहली कोशिश में पास करना, यूजीसी-नेट क्वालिफाई करना और अंततः बीबीएयू के दीक्षांत समारोह में एससी श्रेणी में गोल्ड मेडल हासिल करना-अमय के अब तक के सफर की प्रमुख कड़ियां हैं। और इस पूरी यात्रा के केंद्र में अमय एक विचार को रखते हैं: शिक्षा केवल अवसर नहीं, जिम्मेदारी भी है।

अमय की कहानी में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी उपलब्धि को केवल एक गोल्ड मेडल की तस्वीर में नहीं देखा जा सकता। उनकी यात्रा में शिक्षा, व्यक्तिगत अनुभव, कानूनी समझ, सामाजिक सरोकार और छात्र नेतृत्व एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।
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अमय की कहानी में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी उपलब्धि को केवल एक गोल्ड मेडल की तस्वीर में नहीं देखा जा सकता। उनकी यात्रा में शिक्षा, व्यक्तिगत अनुभव, कानूनी समझ, सामाजिक सरोकार और छात्र नेतृत्व एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।
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