
आज से 70 वर्ष पहले 16 जून 1956 में डॉ. आंबेडकर ने बॉम्बे स्टेट इन्फीरियर विलेज वतनदार एसोसिएशन की स्थापना की थी, वे इसके अध्यक्ष भी थे। इस संगठन के माध्यम से उन्होंने दमनकारी वतन प्रथा के खिलाफ संघर्ष को नई दिशा और तेजी दी। दशकों से बाबासाहब महार वतनों के विरुद्ध अभियान चला रहे थे।
यह वंशानुगत गांव सेवा व्यवस्था हाशिए के समुदायों की गरिमा, भूमि अधिकारों और आर्थिक स्वतंत्रता को छीन लेती थी। उन्होंने वतनदारों के लिए न्याय सुनिश्चित करने और सामाजिक असमानता पर आधारित इस प्रथा को समाप्त करने के लिए संवैधानिक तथा विधायी समाधान खोजे। इस दिन उन्होंने प्रभावित समुदायों को संगठित किया ताकि लोकतांत्रिक और कानूनी माध्यमों से वतन प्रथा का उन्मूलन किया जा सके।
महार समुदाय के लोगों को गाँव की सुरक्षा, संदेश पहुँचाने, और प्रशासनिक कार्यों में सहयोग करने जैसी अनिवार्य सेवाएँ करनी होती थी। इसके बदले में उन्हें जो भूमि दी जाती थी, उसे 'महार वतन भूमि' कहा जाता था।
वतन प्रथा महाराष्ट्र के गांवों में सदियों से चली आ रही एक वंशानुगत व्यवस्था थी। इसमें गांव के कुछ परिवारों, विशेषकर महार समुदाय के सदस्यों को गांव की विभिन्न सेवाओं जैसे चौकीदारी, संदेश पहुंचाना, मृत जानवरों का निपटान, सफाई और अन्य मेहनतकश कार्य आदि के बदले में वतन भूमि दी जाती थी। यह भूमि वंशानुगत थी और आसानी से बेची या हस्तांतरित नहीं की जा सकती थी, इस प्रथा में भूमि पूरी तरह से निजी संपत्ति नहीं होती थी। सेवा बाध्यता के कारण, वतनदार एक प्रकार से सामंतवादी या उच्च जातियों के बंधुआ मजदूर के रूप में जकड़े रहते थे।
डॉ. आंबेडकर 1927 से ही इस प्रथा के खिलाफ संघर्षरत थे। 1937 में उन्होंने बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल में महार वतन समाप्त करने का बिल भी पेश किया था। उनके निरंतर प्रयासों का परिणाम बॉम्बे इन्फीरियर विलेज वतन अबोलिशन एक्ट, 1958 (एक्ट I ऑफ 1959) के रूप में सामने आया, जो 20 जनवरी 1959 को लागू हुआ। इस अधिनियम ने सभी इन्फीरियर वतन समाप्त कर दिए और वतन भूमि को राज्य में विलय कर दिया। वतनदारों को री-ग्रांट के तहत भूमि का अधिकार मिला, जिसमें 3 साल का कर जमा कर कब्जा और 13 साल का कर जमा कर पूर्ण स्वामित्व प्राप्त करने का प्रावधान था।
इन कानूनों का उद्देश्य वतन भूमि को नियमित कृषि भूमि में बदलना था, हालांकि इस ज़मीन के पुनर्वितरण और कब्ज़े को लेकर आज भी विवाद व संघर्ष जारी हैं।
डॉ. आंबेडकर की समानता और सामाजिक लोकतंत्र के प्रति अटूट प्रतिबद्धता ने इस दमनकारी प्रथा के अंत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह अधिनियम सामाजिक-आर्थिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ, जिसने वंशानुगत शोषण को समाप्त करने की राह दिखाई। हालांकि, व्यावहारिक रूप से कई वतंदार परिवारों को भूमि अधिकार प्राप्त करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
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