रेसिस्टिंग कास्टिस्म इन ऑस्ट्रेलिया: जातिवाद पर नई डॉक्यूमेंट्री का मेलबर्न प्रीमियर 19 को, प्रवासी समाज में भेदभाव पर महिलाओं के खुलासे!

मेलबर्न के सिनेमा नोवा में प्रदर्शित होने वाली विक्रांत किशोर की यह 61 मिनट की डॉक्यूमेंट्री मेलबर्न, सिडनी, न्यूकैसल और कॉफ्स हार्बर तक की 3,500 किलोमीटर की यात्रा के दौरान भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के सदस्यों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पेशेवरों के अनुभवों को सामने लाती है।
फिल्म में यह समझने की कोशिश की गई है कि प्रवास के बाद भी जाति किस तरह पहचान, सामाजिक संबंधों और अपनेपन के अनुभव को प्रभावित करती है।
फिल्म में यह समझने की कोशिश की गई है कि प्रवास के बाद भी जाति किस तरह पहचान, सामाजिक संबंधों और अपनेपन के अनुभव को प्रभावित करती है।फिल्म पोस्टर
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मेलबर्न: फिल्मकार, पत्रकार और शिक्षाविद् डॉ. विक्रांत किशोर की डॉक्यूमेंट्री Resisting Casteism in Australia के 19 जुलाई को मेलबर्न डॉक्यूमेंट्री फिल्म फेस्टिवल (MDFF) 2026 में होने वाले प्रीमियर से पहले फिल्म की महिला प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा है कि यह फिल्म भारतीय प्रवासी समाज में जाति आधारित भेदभाव पर लंबे समय से दबे हुए संवाद को सार्वजनिक मंच पर लाने का प्रयास है।

मेलबर्न के सिनेमा नोवा में प्रदर्शित होने वाली यह 61 मिनट की डॉक्यूमेंट्री मेलबर्न, सिडनी, न्यूकैसल और कॉफ्स हार्बर तक की 3,500 किलोमीटर की यात्रा के दौरान भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के सदस्यों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पेशेवरों के अनुभवों को सामने लाती है। फिल्म में यह समझने की कोशिश की गई है कि प्रवास के बाद भी जाति किस तरह पहचान, सामाजिक संबंधों और अपनेपन के अनुभव को प्रभावित करती है।

फिल्म की प्रमुख प्रतिभागी डॉ. रूपाली एस. भामरे, मोनाश यूनिवर्सिटी के मोनाश कॉलेज में यूनिट लीडर हैं जो पिछले 15 वर्षों से ऑस्ट्रेलिया में आंबेडकरवादी सामाजिक गतिविधियों से जुड़ी रही हैं। रूपाली ने कहा कि उन्होंने इस प्रोजेक्ट से इसलिए जुड़ने का निर्णय लिया क्योंकि जाति आधारित भेदभाव के वास्तविक अनुभवों को दस्तावेज़ करना बेहद जरूरी था।

उन्होंने कहा, "जब डॉ. विक्रांत किशोर ने इस फिल्म के बारे में बताया तो मुझे लगा कि जिन लोगों ने जातिगत भेदभाव का सामना किया है, उनके वास्तविक अनुभवों को सामने लाना जागरूकता बढ़ाने और सार्थक संवाद शुरू करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।"

डॉ. भामरे का मानना है कि प्रवास के बावजूद जातिगत सोच समाप्त नहीं होती। उनके अनुसार भारतीय प्रवासी समुदायों के विस्तार के साथ यह चुनौती भी कई देशों में दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि प्रवास सामाजिक गतिशीलता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अवसर देता है, लेकिन जातिगत पूर्वाग्रह अब भी सामाजिक विभाजन और बहिष्कार का कारण बन सकते हैं। इसलिए जागरूकता, संवाद और शिक्षा के माध्यम से इस विषय पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि फिल्म में दिखाई गई कई घटनाएं उनके अपने अनुभवों से भी जुड़ी हैं। शूटिंग के दौरान हुई चर्चाओं ने उन्हें अपने समुदाय द्वारा झेली गई पीड़ा और अपमान की याद दिलाई।

"इन चर्चाओं ने जातिगत अपमान और भेदभाव की दर्दनाक यादों को फिर से जीवित कर दिया। इससे एहसास हुआ कि किस तरह जाति ने लंबे समय तक लोगों के अवसरों और सामाजिक-आर्थिक प्रगति को सीमित किया है।"

डॉ. भामरे ने उम्मीद जताई कि फिल्म देखने के बाद लोग जातिगत भेदभाव के प्रभाव को बेहतर ढंग से समझेंगे और ऑस्ट्रेलिया में शिक्षा, सामुदायिक संवाद तथा कानूनी संरक्षण के माध्यम से इस मुद्दे पर अधिक प्रभावी कदम उठाए जाएंगे।

अस्मिता महिरे-सिंह को यकीन है कि यह डॉक्यूमेंट्री जातिगत भेदभाव के बारे में लोगों को जागरूक करने और सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
अस्मिता महिरे-सिंह को यकीन है कि यह डॉक्यूमेंट्री जातिगत भेदभाव के बारे में लोगों को जागरूक करने और सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

फिल्म की एक अन्य प्रतिभागी अस्मिता महिरे-सिंह, जो मेलबर्न में पीपुल सिस्टम्स मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं, ने कहा कि उन्होंने फिल्म का हिस्सा बनने का निर्णय इसलिए लिया क्योंकि उनका मानना है कि इससे दक्षिण एशियाई प्रवासी समुदायों में जातिगत भेदभाव के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।

उन्होंने कहा, "मुझे विश्वास है कि यह डॉक्यूमेंट्री जातिगत भेदभाव के बारे में लोगों को जागरूक करने और सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।"

अस्मिता ने कहा कि फिल्म के लिए दिए गए इंटरव्यू के दौरान उन्हें अपने परिवार की सामाजिक यात्रा और पूर्वजों के योगदान पर गहराई से विचार करने का अवसर मिला।

"जब मैं अपने परिवार की यात्रा के बारे में बात कर रही थी, तब मुझे अपने माता-पिता और दादा-दादी द्वारा समाज के लिए किए गए कार्यों का गहरा एहसास हुआ। इससे मैंने यह भी सोचा कि मैं उस विरासत को आगे बढ़ाने में क्या योगदान दे सकती हूं।"

उन्होंने उम्मीद जताई कि फिल्म उन लोगों तक भी पहुंचेगी जिन्हें यह जानकारी नहीं है कि भारत से बाहर बसे समुदायों में भी जातिगत भेदभाव मौजूद हो सकता है।

"बहुत से लोग शायद यह जानते ही नहीं कि ऐसा भेदभाव आज भी मौजूद है। मेरी उम्मीद है कि यह फिल्म इस मुद्दे को सामने लाएगी और लोगों के बीच समझ, संवेदनशीलता तथा संवाद को बढ़ावा देगी।"

अपर्णा कहती हैं उन्होंने फिल्म का हिस्सा बनने का फैसला इसलिए किया क्योंकि जाति से जुड़े कई अनुभव लोगों की निजी बातचीत तक सीमित रह जाते हैं।
अपर्णा कहती हैं उन्होंने फिल्म का हिस्सा बनने का फैसला इसलिए किया क्योंकि जाति से जुड़े कई अनुभव लोगों की निजी बातचीत तक सीमित रह जाते हैं।

डॉक्यूमेंट्री में शामिल अपर्णा रामटेके ने फिल्म में रोजमर्रा की सामाजिक बातचीत में दिखाई देने वाले जातिगत संकेतों पर बात की है। उनका कहना है कि ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों के बीच बातचीत के अंत में अक्सर एक-दूसरे का सरनेम पूछना सामान्य माना जाता है, लेकिन कई बार इसका उद्देश्य सामने वाले की जातीय पृष्ठभूमि जानना होता है।

उन्होंने कहा, "लोग इसे सामान्य सामाजिक व्यवहार समझते हैं, लेकिन इसके पीछे एक ऐसा अर्थ छिपा होता है जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता।"

अपर्णा का कहना है कि ऐसे छोटे-छोटे व्यवहार यह तय करते हैं कि कौन किसी समूह का हिस्सा महसूस करता है और कौन खुद को अलग-थलग पाता है।

उन्होंने कहा, "ये छोटी-छोटी बातें तटस्थ नहीं होतीं। समय के साथ इनका असर लोगों के सामाजिक अनुभवों और रिश्तों पर पड़ता है।"

अपर्णा ने फिल्म में अपने आंबेडकरवादी विचारों और 'जय भीम' अभिवादन के महत्व पर भी बात की है। उनके अनुसार यह केवल अभिवादन नहीं बल्कि समानता, सम्मान और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि उन्होंने फिल्म का हिस्सा बनने का फैसला इसलिए किया क्योंकि जाति से जुड़े कई अनुभव लोगों की निजी बातचीत तक सीमित रह जाते हैं।

"जब तक इन अनुभवों पर खुलकर बात नहीं होगी, तब तक वे अनदेखे और अनसुने बने रहेंगे। मुझे लगा कि जो मैंने देखा और महसूस किया है, उसे ईमानदारी से साझा करना जरूरी है।"

Resisting Casteism in Australia का प्रीमियर 19 जुलाई को दोपहर 12:15 बजे मेलबर्न के सिनेमा नोवा में होगा। स्क्रीनिंग के बाद निर्देशक डॉ. विक्रांत किशोर और फिल्म में शामिल प्रतिभागियों के साथ प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया जाएगा।

फिल्म में यह समझने की कोशिश की गई है कि प्रवास के बाद भी जाति किस तरह पहचान, सामाजिक संबंधों और अपनेपन के अनुभव को प्रभावित करती है।
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