
नई दिल्ली: "मैं डॉक्टर बनना चाहती हूं"-12 वर्षीय सपना का यह सपना ही फिल्म 'खिलावड़ी (The One Who Plays)' का केंद्र है। लेकिन यह केवल एक बच्ची के सपनों की कहानी नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के विमुक्त (Denotified) बांछड़ा समुदाय की उन लड़कियों की कहानी है, जिन्हें सामाजिक परंपराओं और आर्थिक मजबूरियों के कारण देह व्यापार में धकेल दिया जाता है।
एफटीआईआई, पुणे की पूर्व छात्रा, फिल्मकार और लेखिका शोभिता ठाकुर द्वारा निर्देशित यह फिल्म अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करेगी। कनाडा के Fascinasian Film Festival में प्रमुख पुरस्कार जीतने के बाद फिल्म का चयन फ्रांस के 31वें Festival International du Film de Nancy और रूस के XXII Kazan International Altyn Minbar Film Festival के लिए हुआ है। वर्तमान में यह दोनों महोत्सवों के लॉन्ग शॉर्ट (Short Feature) वर्ग में भारत की एकमात्र प्रतिनिधि फिल्म है।
फिल्म की नायिका सपना मध्य प्रदेश के बांछड़ा समुदाय की 12 वर्षीय बच्ची है। गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में कार्यरत एक महिला डॉक्टर को देखकर उसके भीतर भी डॉक्टर बनने की इच्छा जागती है। वह पढ़ना चाहती है, अपना भविष्य बनाना चाहती है और उस जीवन से बाहर निकलना चाहती है, जिसे उसकी बिरादरी की अधिकांश लड़कियां जीने के लिए मजबूर हैं। लेकिन उसके सपनों के सामने कई बाधाएं हैं।
फिल्म में दिखाया जाता है कि सपना अवैध संतान होने के कारण जाति प्रमाणपत्र नहीं बनवा पाती। प्रमाणपत्र न होने से उसे निःशुल्क शिक्षा का लाभ नहीं मिलता। दूसरी ओर परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी है कि उसकी मां उसे पढ़ाई छोड़कर रात में देह व्यापार करने के लिए कहती है, ताकि घर चल सके।
फिल्म में एक संवेदनशील महिला डॉक्टर और एक सामाजिक कार्यकर्ता सपना की सहायता करने का प्रयास करते हैं। वे चाहते हैं कि वह अपनी पढ़ाई जारी रख सके और उसके जीवन की दिशा बदल सके। लेकिन प्रशासनिक उदासीनता और सामाजिक परिस्थितियां उनके प्रयासों को सफल नहीं होने देतीं।
आखिरकार सपना को डॉक्टर बनने का सपना छोड़कर उसी जीवन को स्वीकार करना पड़ता है, जिससे बचने की वह कोशिश कर रही थी।
'खिलावड़ी' बांछड़ा समुदाय की लड़कियों के जीवन, शिक्षा, पहचान और सामाजिक परिस्थितियों पर आधारित कथा है। फिल्म मध्य प्रदेश में ही शूट की गई है ताकि कहानी अपने वास्तविक सामाजिक परिवेश से जुड़ी रहे।
निर्देशक शोभिता ठाकुर ने द मूकनायक से बातचीत में कहा, "एक महिला फिल्मकार और कलाकार होने के नाते मुझे लगा कि इन छोटी बच्चियों पर होने वाले अकल्पनीय शोषण और पीड़ा की कहानी को सिनेमा के माध्यम से सामने लाना मेरी जिम्मेदारी है। यह फिल्म केवल उनके दर्द का चित्रण नहीं है, बल्कि समाज से बदलाव की अपील भी है, ताकि इस लगातार जारी अन्याय को पहचाना जाए और उसके खिलाफ कार्रवाई हो।"
उन्होंने कहा कि फिल्म को यथासंभव यथार्थवादी शैली में बनाया गया है। "फिल्म की शूटिंग मध्य प्रदेश में ही की गई है ताकि कहानी अपने वास्तविक सामाजिक परिवेश से जुड़ी रहे। मैंने एक ऐसी सिनेमाई शैली अपनाने की कोशिश की है जो कच्ची, वास्तविक और बिना किसी कृत्रिम सजावट के इन लड़कियों के जीवन को ईमानदारी से प्रस्तुत करे।"
शोभिता ठाकुर ने पुणे के फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया (FTII) से फ़िल्म एडिटिंग में तीन साल का कोर्स किया है। उनका प्रोफ़ेशनल सफ़र सिनेमा, एडवरटाइज़िंग और लंबी कहानी कहने (long-form storytelling) के क्षेत्रों में फैला हुआ है। उन्होंने नेशनल अवॉर्ड विजेता डायरेक्टर राजन खोसा के साथ डायरेक्टर के असिस्टेंट के तौर पर और बाद में अनुराग बसु के साथ एडवरटाइज़िंग फ़िल्मों में काम किया है; इन अनुभवों ने उनकी कहानी कहने की समझ और विज़ुअल भाषा को गहराई से आकार दिया है।
शोभिता ने नेटफ़्लिक्स इंडिया के साथ फ़्रीलांस एडिटोरियल क्रिएटिव के तौर पर भी काम किया है और असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में कई बड़ी एडवरटाइज़िंग फ़िल्म प्रोडक्शन कंपनियों के साथ काम किया है।
फ़िल्म 'खिलावड़ी' शोभिता की पहली शॉर्ट है और इसे काफ़ी पसंद किया गया है। इसे कनाडा के फ़ैसिनेशियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में दिखाया गया, कैलगरी के फ़ैसिनेशियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में 'ऑडियंस चॉइस अवॉर्ड' जीता, और एडमोंटन के फ़ैसिनेशियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में 'बेस्ट शॉर्ट फ़िल्म अवॉर्ड' और 'बिल्डिंग ब्रिजेस अवॉर्ड' हासिल किया। साथ ही, इसने पुणे, भारत में बुद्ध इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में 'बेस्ट शॉर्ट फ़िल्म अवॉर्ड' भी जीता। यह फ़िल्म अलग-अलग फ़ेस्टिवल में दिखाई जा रही है।
'खिलावड़ी' का चयन 4 जुलाई से शुरू हो रहे 31वें Festival International du Film de Nancy (France) के International Competition वर्ग में हुआ है।
फिल्म की टीम के अनुसार, दुनिया भर से आई हजारों फिल्मों में से केवल लगभग 150 फिल्मों का चयन इस प्रतिष्ठित महोत्सव के लिए किया गया है। यह महोत्सव तीन दशकों से अधिक समय से स्वतंत्र और सामाजिक सरोकारों वाली फिल्मों के लिए जाना जाता है।
शोभिता कहती हैं, " एक फ़िल्म स्टूडेंट के तौर पर, यह चुनाव एक खूबसूरत 'फुल-सर्कल' पल जैसा लगता है। इस फ़ेस्टिवल की शुरुआत असल में 'यूरोपियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ सिनेमा एंड ऑडियोविज़ुअल' (IECA) के फ़िल्म स्टूडेंट्स ने की थी, जिससे इसे एक आर्टिस्टिक, पूरी तरह से आज़ाद और "फ़िल्ममेकर-फ़र्स्ट" वाला मिज़ाज मिला। इतने शानदार और आदर्शवादी इतिहास वाले संस्थान का हमारी आवाज़ को अपनाना, हमारे लिए एक तरह की मान्यता और एक शांत प्रेरणा, दोनों ही है।"
फिल्म का चयन 4 सितंबर से आयोजित होने वाले XXII Kazan International Altyn Minbar Film Festival में भी हुआ है।
फिल्म की टीम के अनुसार, इस वर्ष 66 देशों से प्रविष्टियां प्राप्त हुईं। इनमें से 21 देशों की 54 फिल्मों का अंतिम चयन किया गया, जबकि शॉर्ट फीचर श्रेणी में केवल 10 फिल्मों को स्थान मिला। इस श्रेणी में भारत से केवल 'खिलावड़ी' का चयन हुआ है।
फ्रांस और रूस में चयन से पहले 'खिलावड़ी' को कनाडा के Fascinasian Film Festival में प्रमुख पुरस्कार मिल चुका है। इसके साथ ही यह फिल्म अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में अपनी यात्रा जारी रखे हुए है।
बांचड़ा समुदाय की बच्चियों के जीवन पर केंद्रित यह फिल्म अब भारत की सीमाओं से बाहर वैश्विक दर्शकों के सामने प्रस्तुत होगी, जहां उनकी कहानी अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिखाई जाएगी।
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