Dalit History Month | 'पंचायत' एक्टर विनोद सूर्यवंशी ने खोली ग्लैमर वर्ल्ड की पोल; जानें फिल्म इंडस्ट्री के उन दिग्गजों के बारे में जिन्होंने झेला जातिगत अपमान

हाल ही में लोकप्रिय वेब सीरीज 'पंचायत' के अभिनेता विनोद सूर्यवंशी ने अपने गांव और फिल्म उद्योग के शुरुआती संघर्षों में झेले गए जातिगत भेदभाव पर खुलकर बात की है। उनकी यह आपबीती भारतीय मनोरंजन जगत के उस स्याह पहलू को उजागर करती है, जिसे अक्सर 'ग्लैमर' की चकाचौंध में दबा दिया जाता है।
सिर्फ जाति ही नहीं, बल्कि लैंगिक और रंग के आधार पर भी कलाकारों ने भेदभाव की शिकायत की है।
फिल्म उद्योग में न सिर्फ जाति, बल्कि लिंग और रंगभेद के खिलाफ आवाजें उठना तेज हो गई हैं। ग्राफिक- आसिफ़ निसार/ द मूकनायक
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'पंचायत' सीरीज के चौथे सीजन में नए सचिव के किरदार से पहचान बनाने वाले अभिनेता विनोद सूर्यवंशी ने हाल ही में एक साक्षात्कार में जातिगत भेदभाव का शिकार होने की अपनी दर्दनाक कहानी सुनाई है। सूर्यवंशी, जिन्होंने 'पंचायत' और 'जॉली LLB 3' जैसी फिल्मों में काम किया है, ने हाल ही में एक इंटरव्यू में खुलासा किया कि उनके पैतृक गांव कर्नाटक में आज भी जातिवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब फिल्म उद्योग में न सिर्फ जाति, बल्कि लिंग और रंगभेद के खिलाफ आवाजें उठना तेज हो गई हैं।

हाल के समय में एक से एक फिल्में ऐसी बनी हैं जिसमें जातिगत नफरत और समाज में व्याप्त ऊंच-नीच की मानसिकता को बाखूबी फिल्मांकित किया गया है। इसमें सबसे ताज़ा मूवी है वध-2 जिसमें प्रकाश (कुमुद मिश्रा) एक जातिवादी और सख्त जेलर की भूमिका में है, जो जेल में भी जात पात को लेकर कट्टर मानसिकता प्रदर्शित करते हैं, फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे वे अंतरजातीय विवाह करने पर अपनी भतीजी और उसके पति की निर्मम हत्या कर देते हैं और दोष नायिका नीना गुप्ता के किरदार पर आ जाता है जिसके लिए वह लंबा कारावास भुगतती है।

इसी तरह 2025 में शाज़िया इक़बाल द्वारा निर्देशित फिल्म धड़क-2 की मुख्य थीम जाति आधारित भेदभाव, असमानता और अंतर्जातीय प्रेम के सामने आने वाली चुनौतियां थी। यह फिल्म उच्च जाति की लड़की और निम्न जाति के लड़के के बीच के प्रेम के प्रति रूढ़िवादी सामाजिक सोच को दर्शाती है।

बाबा साहब अम्बेडकर के जन्म माह को दुनिया भर में दलित हिस्ट्री मंथ के रूप में मनाया जाता है और इसी कड़ी में द मूकनायक भी यहां इस पूरे मामले और फिल्म जगत के अन्य कलाकारों द्वारा साझा किए गए भेदभाव के अनुभवों पर आधारित एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहा है:

इंडस्ट्री में आने के बाद भी विनोद को ‘लुक’ के आधार पर अपमान झेलना पड़ा- “भिखारी के रोल के लिए भी गोरा रंग (फेयर लुक) मांगा जाता था।
इंडस्ट्री में आने के बाद भी विनोद को ‘लुक’ के आधार पर अपमान झेलना पड़ा- “भिखारी के रोल के लिए भी गोरा रंग (फेयर लुक) मांगा जाता था।

विनोद सूर्यवंशी ने हाल ही एक पॉडकास्ट में सिद्धार्थ कन्नन से बातचीत में बताया कि उनके कर्नाटक के गाँव में आज भी जातिवाद जस का तस है। उन्होंने कहा, “मेरे गाँव में दो हिस्से हैं- एक ऊंची जाति के लिए और एक निचली जाति के लिए। दलितों का इलाका गाँव से अलग है। मैं 12 साल का था जब अपने पिता के साथ गाँव गया और एक होटल में खाना खाया, तो हमें खुद के प्लेट धोने पड़ते थे। साथ ही पैसे भी देने पड़ते थे। हमारे गाँव में एक मंदिर आज भी है जहाँ हमें जाने की इजाजत नहीं है।” 

विनोद ने अपनी आर्थिक तंगी का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनकी माँ घरेलू नौकरानी थीं और पिता राजमिस्त्री। काम न मिलने पर पिता शराब पीकर आते थे और माँ के साथ मारपीट करते थे। उन्होंने कहा, “त्योहारों पर हमें रोना आता था क्योंकि हम उन्हें कभी मना नहीं सकते थे।”

जूनियर कलाकारों से कोई ठीक से बात नहीं करता था। उन्हें अक्सर गाली दी जाती थी और अपमानित किया जाता था। सहायक निर्देशक हमारे साथ बुरा बर्ताव करते थे। बड़े कलाकार कभी हमारा अपमान नहीं करते थे।
विनोद सूर्यवंशी

इतना ही नहीं, इंडस्ट्री में आने के बाद भी विनोद को ‘लुक’ के आधार पर अपमान झेलना पड़ा। एक जूनियर कलाकार के तौर पर जब वह खाना खा रहे थे, तो एक सीनियर ने उनकी प्लेट छीन ली। विनोद ने बताया "भिखारी के रोल के लिए भी गोरा रंग (फेयर लुक) मांगा जाता था। मुझसे कहा गया कि तुम्हारा रंग सांवला है, तुम पैक हो जाओ।” उन्होंने कहा, 'मुझे अपने रंग-रूप के कारण कई बार अस्वीकार किया गया। जब मैंने टीवी के लिए ऑडिशन दिए, तो वे अक्सर ‘अमीर दिखने वाले’ व्यक्ति की तलाश करते थे। यहां तक कि एक भिखारी के रोल के लिए भी, वे अमीर दिखने वाले व्यक्ति को चाहते थे। मुझे बताया गया कि मैं इस लायक नहीं हूं।'

अपनी फिल्म 'होम बाउंड' के एक्टर्स के साथ नीरज
अपनी फिल्म 'होम बाउंड' के एक्टर्स के साथ नीरज

नीरज घेवान ने बयान किया पहचान छिपाने का दर्द

मसान', 'होम बाउंड' जैसे उत्कृष्ट कार्यों के लिए जाने जाने वाले निर्देशक नीरज घेवान  ने कई बार फिल्म इंडस्ट्री में व्याप्त "सवर्ण प्रभुत्व" पर बात की है। नीरज ने स्वीकार किया था कि करियर के शुरुआती दौर में वे अपनी जाति बताने से डरते थे।

वे अक्सर कहते हैं कि बॉलीवुड में दलित किरदारों को या तो 'बेचारा' दिखाया जाता है या 'अपराधी'। वे फिल्म 'हॉमबाउंड' और अपनी कहानियों के जरिए दलितों को "नायक" के रूप में पेश करने की वकालत करते रहे हैं। एक इंटरव्यू में नेशनल अवॉर्ड विजेता इस फ़िल्ममेकर ने कहा था, "परंपरागत रूप से, हिंदी सिनेमा में हम ऐसी कहानियाँ सुनाते रहे हैं जो आबादी के सिर्फ़ 10-15% हिस्से के इर्द-गिर्द घूमती हैं, ज़्यादातर ऊँची जाति की आबादी के। सिनेमा के 100 सालों में, हमने आबादी के बड़े हिस्से को काफ़ी हद तक नज़रअंदाज़ किया है"।

उन्होंने कहा, "दलित या आदिवासी समुदायों से कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कैमरे के सामने हो या कैमरे के पीछे, मौजूद नहीं रहा है। मैं शायद इस समुदाय के उन गिने-चुने लोगों में से एक हूँ जिन्हें पहचान मिली है। यह एक बहुत बड़ी समस्या है। हमें इसकी भरपाई करनी होगी।"

रजीत की मूवी  ‘थंगालान’ में बताया गया है कि कैसे तमिलनाडु के दलितों ने अपने खाली हाथों और पक्के इरादे से कोलार गोल्ड फ़ील्ड्स को बनाया और वहाँ खुदाई की।
रजीत की मूवी ‘थंगालान’ में बताया गया है कि कैसे तमिलनाडु के दलितों ने अपने खाली हाथों और पक्के इरादे से कोलार गोल्ड फ़ील्ड्स को बनाया और वहाँ खुदाई की।

पा. रंजीत ने सिनेमा को बनाया प्रतिरोध का हथियार

दक्षिण भारतीय सिनेमा के दिग्गज निर्देशक पा. रंजीत ने न केवल भेदभाव सहा, बल्कि उसे अपनी फिल्मों (कबाली, काला, सरपट्टा परम्परै) का मुख्य विषय बनाया। रजनीकांत स्टारर सुपरहिट फिल्म 'काला' शहरी गरीबों की ज़िंदगी को दिखाती है। 'ज़मीन एक अधिकार है' - यही वह विचार है जिसे 'काला' आगे बढ़ाती है। हमारी शहरी नीतियाँ झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को रातों-रात ज़बरदस्ती बेदखल कर देती हैं, उन्हें विस्थापित कर देती हैं और उनकी ज़िंदगी तबाह कर देती हैं। और यह उन्हें बताती है कि शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों की कोई ज़रूरत नहीं है।

पा रंजीत का मानना है कि फिल्म सेट पर भी लोगों का नजरिया आपकी जाति और पृष्ठभूमि के आधार पर बदल जाता है। उन्होंने संगीत और कला के माध्यम से 'द कैस्टलेस कलेक्टिव' (The Casteless Collective) की स्थापना की ताकि हाशिए पर मौजूद कलाकारों को मंच मिल सके।  कर्नाटक के कोलार स्वर्ण क्षेत्र के पृष्ठभूमि में सेट उनकी फिल्म ‘थंगालान’ सिर्फ़ दलित इतिहास को फिर से लिखने और उसे वापस पाने के बारे में ही नहीं है, बल्कि इसलिए भी खास है क्योंकि यह उस अक्सर अनसुने और अनछुए इतिहास पर आधारित है कि कैसे तमिलनाडु के दलितों ने अपने खाली हाथों और पक्के इरादे से कोलार गोल्ड फ़ील्ड्स (KGF) को बनाया और वहाँ खुदाई की।

पत्रकार से फ़िल्ममेकर बनीं ज्योति निशा बचपन से जातिगत भेदभाव झेलती रही हैं.
पत्रकार से फ़िल्ममेकर बनीं ज्योति निशा बचपन से जातिगत भेदभाव झेलती रही हैं.

2020 में पत्रकार से फ़िल्ममेकर बनीं ज्योति निशा ने 'बहुजन स्पेक्टेटरशिप' का सिद्धांत पेश किया। यह मुख्यधारा के प्रतिनिधित्व और दलित समुदाय को देखने के नज़रिए के विपरीत एक वैकल्पिक दृष्टिकोण है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर तो अनगिनत फ़िल्में बनी हैं, लेकिन संविधान के पिता डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर पर कितनी हिंदी फ़िल्में बनी हैं?

ज्योति निशा, जिन्होंने अम्बेडकर पर डॉक्यूमेंट्री बनाई है, कहती हैं, “ऊपरी जाति के लोग डॉ. अम्बेडकर के आभारी नहीं हैं, इसलिए उनकी कहानी को हाशिए पर रखा गया है। हमारा संघर्ष एक जैसा है- चाहे वह दलित पुरुष हो या दलित महिला, दोनों का एक ही ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ का सामना है। द मूकनायक के प्रतीक्षित सिंह को दिए एक इंटरव्यू में ज्योति निशा कहती हैं, " मैं पश्चिमी UP के बिजनौर इलाके से हूँ, जहाँ मेरे दादाजी किसान थे। मेरे पिताजी, नेत्रराम सिंह, ने अपना डिप्लोमा पूरा करने के लिए घास बेची और जब उन्हें नौकरी मिली, तो वे शहर आ गए। वे अंबेडकर के पक्के अनुयायी थे, और मैंने उन्हें अपने घर पर कैडर कैंप लगाते हुए देखा है। ज़्यादातर लोग जाति-व्यवस्था से लड़ने में इसलिए संघर्ष करते हैं, क्योंकि वे इसकी बनावट को ठीक से समझ नहीं पाते। मैंने जाति-व्यवस्था की बनावट और उसमें मेरी क्या जगह है, यह अपने परिवार से सीखा। मेरे पिताजी 2002 में BAMCEF के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे; उसी साल उनका देहांत हो गया। हालाँकि, TV और अखबारों में दिखाई जाने वाली कहानियों की वजह से, मेरा नज़रिया आम सोच से प्रभावित रहा; ये कहानियाँ मेरे अपने अनुभवों से मेल नहीं खाती थीं।"

कई अलग-अलग तरीकों से भेदभाव मेरे जीवन का एक हिस्सा रहा है। मुझे आज भी अच्छी तरह याद है, जब मैं छह साल की थी, तब 'कन्या पूजन' के दौरान मेरी जाति की वजह से मुझे वहाँ से लौटा दिया गया था, जो मेरे लिए बेहद अपमानजनक अनुभव था। जब मैं अपनी बीस की उम्र में थी, तो लोग अक्सर मुझसे पूछते थे कि मैं इतनी अच्छी अंग्रेज़ी कैसे बोल लेती हूँ; या फिर यह टिप्पणी करते थे कि मैं देखने में किसी 'अनुसूचित जाति' की व्यक्ति जैसी नहीं लगती। ऐसे में, मैं भी उन्हें पलटकर जवाब देती थी और उनसे ही पूछ बैठती थी कि आखिर उनकी नज़र में एक 'अनुसूचित जाति' का व्यक्ति कैसा दिखता है।

ज्योति कहती हैं, " 2014 में, मैंने देखा कि बहुजनों की आशंकाएँ सच साबित हो रही हैं, और इन सच्चाइयों को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होता जा रहा था। TISS में पढ़ाई करने से मुझे अपने अनुभवों को शब्दों में बयां करने का तरीका मिला। आप अपने काम में कितने भी माहिर क्यों न हों, सही प्रतिनिधित्व के बिना आपके काम में वह गहराई और बारीकी नहीं आ पाती। मैंने यह सवाल भी उठाया कि अगर सुविधा-संपन्न समुदाय हमारी सोच से वाकिफ़ नहीं है, तो क्या हमारे अपने लोग भी हमारी सोच के बारे में जानते हैं?"

रिलीज में देरी और सीबीएफसी की कटौती ने फुले अनुयायियों और कार्यकर्ताओं में गुस्सा भर दिया है, जो इसे जाति-आधारित अत्याचारों की सच्चाई दबाने की कोशिश मानते हैं।
रिलीज में देरी और सीबीएफसी की कटौती ने फुले अनुयायियों और कार्यकर्ताओं में गुस्सा भर दिया है, जो इसे जाति-आधारित अत्याचारों की सच्चाई दबाने की कोशिश मानते हैं।

गत वर्ष महात्मा ज्योतिबा फुले की बायोपिक फुले को लेकर हुए विवाद ने भी इस बहस को तेज कर दिया है। सेंसर बोर्ड ने फिल्म से ‘महार’, ‘मांग’ और ‘मनु की व्यवस्था’ जैसे शब्दों को हटाने का आदेश दिया, जिससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि क्या सिनेमा में जाति के मुद्दे उठाना अपराध है।

'सैराट' और 'झुंड' के निर्देशक नागराज मंजुले ने स्पष्ट रूप से कहा कि जातिवाद एक ऐसी "बीमारी" है जिसे भारतीय समाज और फिल्म उद्योग स्वीकार करने से कतराता है। मंजुले ने बताया कि उनके पिता पत्थर तोड़ने और सूअर पकड़ने का काम करते थे। फिल्म 'फैंड्री' में उन्होंने उसी अपमान को पर्दे पर उतारा जो एक दलित परिवार ग्रामीण भारत में झेलता है। उनका कहना है कि जब तक हम जाति पर बात नहीं करेंगे, यह खत्म नहीं होगी।

सिर्फ जाति ही नहीं, बल्कि लैंगिक और रंग के आधार पर भी कलाकारों ने भेदभाव की शिकायत की है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे मंझे हुए कलाकार ने कई बार साझा किया है कि उनके "रंग और लुक्स" की वजह से उन्हें लंबे समय तक छोटे और तिरस्कृत किरदार दिए गए। हालाँकि उन्होंने साफ़ किया कि उनके साथ मुस्लिम होने के कारण कभी भी भेदभाव नहीं हुआ।

'मिस इंडिया' रह चुकीं अभिनेत्री निहारिका सिंह ने फिल्म इंडस्ट्री में मौजूद 'सवर्ण पितृसत्ता' (Upper-caste patriarchy) और महिलाओं के साथ होने वाले दोहरे भेदभाव पर सवाल उठाए हैं। 2019 में एक इंटरव्यू में निहारिका ने कहा था, " मैं काफ़ी हद तक सुरक्षित माहौल में पली-बढ़ी, इसलिए बचपन में मुझे जाति और उसकी पेचीदगियों की समझ नहीं थी। मुझे पता था कि हम 'SC' हैं, लेकिन बड़े राजनीतिक संदर्भ में इसका क्या मतलब था, यह मेरे लिए बिल्कुल अनजान था। देश के सबसे कॉस्मोपॉलिटन शहर में जाने और 'मिस इंडिया' के तौर पर मशहूर होने के बाद, मुझे पहली बार जाति-आधारित हिंसा का सामना करना पड़ा और तब मुझे एहसास हुआ कि मुझे अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।"

बिग बॉस 18 सीजन से चर्चित हुई अभिनेत्री चुम दरांग ने भी कहा है कि वे अपने चेहरे की वजह से भेदभाव सहती रही हैं. अपने दर्द को बया करते हुए उन्होंने कहा, "मैं साफ-साफ पर कह रही हूं, यह सच है कि हम थोड़े अलग दिखते हैं. लोग उस इलाके (नॉर्थ ईस्ट) के बारे में नहीं जानते हैं जहां से मैं ताल्लुक रखती हूं."

मई 2024 में अभिनेत्री जाह्नवी कपूर ने लल्लनटॉप को दिए अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि वे बाबा साहब आंबेडकर और गांधी जी के बीच डिबेट सुनना चाहेंगी। जान्हवी ने आगे कहा कि उन्होंने फिल्ममेकर नीरज घेवान के साथ काफी समय बिताया और घेवान जो एक दलित समुदाय से आते हैं , ने उन्हें अपने जीवन अनुभव , समुदाय से जुडी बाते शेयर की जिसको जानने के बाद जान्हवी के मन में जिज्ञासा जाग्रत हुई. उन्हें लगा कि मैं हिन्दू हूँ, मैं समाज का हिस्सा हूँ लेकिन मुझे अपने समाज से जुडी जानकारी कितनी कम है. "

" मैं अम्बेडकर रोड पे रहती हूँ लेकिन मुझे इनके इतिहास के बारे में जानकारी इतनीं कम है ...शर्म आनी चाहिए मुझे". इस अनुभूति ने जान्हवी को ट्रिगर किया और उसके बाद अभिनेत्री ने नीरज के द्वारा सुझाने पर बाबा साहब की पुस्तक "  Annihilation Of Caste" को पढ़ा और इस विषय पर अनेक वीडियोज देखे. उन्होने बताया की उसके बाद उनकी समझ और चीजों को देखने के नजरिये में बदलाव आया. जान्हवी ने इंटरव्यू में युवाओं से अपील की कि "इस देश के युवाओं के लिए अतीत के बारे में जानकारी के साथ समाज के लिए सूचित निर्णय लेना बहुत महत्वपूर्ण है।"

सिर्फ जाति ही नहीं, बल्कि लैंगिक और रंग के आधार पर भी कलाकारों ने भेदभाव की शिकायत की है।
दलित हिस्ट्री मंथ विशेष: -" हम हरिजनों को हजारों सालों से यह अपमान ओढ़ने बिछाने की आदत सी हो गई है..."
सिर्फ जाति ही नहीं, बल्कि लैंगिक और रंग के आधार पर भी कलाकारों ने भेदभाव की शिकायत की है।
बुद्धिस्ट वेडिंग्स इन इण्डिया : अग्नि की बजाय नवयुगल मान रहे बुद्ध -भीम को विवाह का साक्षी !
सिर्फ जाति ही नहीं, बल्कि लैंगिक और रंग के आधार पर भी कलाकारों ने भेदभाव की शिकायत की है।
अभिनेत्री जान्हवी कपूर ने कहा- आंबेडकर रोड पे रहती हूँ लेकिन मुझे इनके इतिहास के बारे में इतनी कम जानकारी...शर्म आनी चाहिए !

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