निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग: AIISCA अध्यक्ष बोले "आरक्षण चैरिटी नहीं, राज्य से जोड़ने वाला एकमात्र धागा"

दलित संगठन ने प्रेस क्लब में छेड़ा देशव्यापी आंदोलन, 2 अक्टूबर को अंबेडकर भवन में बड़ा कार्यक्रम
 डॉ. राहुल सोनपिंपले ने सवाल उठाया कि कैंपसों में दलित-आदिवासी छात्रों के खिलाफ घटनाओं पर सत्ता पक्ष का कोई बयान क्यों नहीं आता।
डॉ. राहुल सोनपिंपले ने सवाल उठाया कि कैंपसों में दलित-आदिवासी छात्रों के खिलाफ घटनाओं पर सत्ता पक्ष का कोई बयान क्यों नहीं आता।
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नई दिल्ली। ऑल इंडिया इंडिपेंडेंट शेड्यूल कास्ट एसोसिएशन (AIISCA) ने दिल्ली के प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर निजी क्षेत्र में रोजगार और निजी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण व सकारात्मक कार्रवाई (अफर्मेटिव एक्शन) की मांग दोहराई। संगठन ने कहा कि सरकारी नौकरियां और सरकारी शिक्षण संस्थान लगातार सिकुड़ रहे हैं, जबकि रोजगार, शिक्षा और आर्थिक ताकत निजी हाथों में केंद्रित हो रही है। ऐसे में सामाजिक न्याय की व्यवस्था को निजी क्षेत्र तक ले जाना जरूरी है।

संगठन ने इस मौके पर "रिजर्वेशन इन द प्राइवेट सेक्टर: फ्रॉम गवर्नमेंट जॉब्स टू प्राइवेट एम्प्लॉयमेंट, एजुकेशन एंड इकोनॉमिक पावर" शीर्षक से एक दस्तावेज जारी किया। कॉन्फ्रेंस को संगठन के अध्यक्ष डॉ. राहुल सोनपिंपले, प्रो. सुमित म्हस्कर, प्रो. एन. सुकुमार, प्रो. सोनाझरिया मिंज और छात्र नेताओं ऐश्वर्या, अश्विनी कुमार, भोमाराम व आशुतोष विद्रोही ने संबोधित किया।

AIISCA के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. राहुल सोनपिंपले ने कहा कि निजी क्षेत्र में आरक्षण "हर तरह से राजनीतिक मुद्दा" है और यह आज का नहीं, ब्रिटिश दौर से जुड़ा सवाल है। उन्होंने गोलमेज सम्मेलन में डॉ. आंबेडकर की पृथक निर्वाचन मंडल की मांग का जिक्र किया। उनके मुताबिक पूना पैक्ट भारत के आने वाले आधुनिक राज्य और अनुसूचित जातियों के बीच एक अनुबंध था। बराबरी के पक्षों के बीच हुए इस करार में अनुसूचित जातियों ने पृथक निर्वाचन छोड़ा और बदले में नौकरियों व राजनीति में आरक्षण का वादा मिला। उन्होंने आदिवासियों से किए गए वादों (पांचवीं-छठी अनुसूची, स्वायत्तता) और संविधान सभा की बहसों का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि जिस तरह जिन्ना ने अलग देश की मांग पर भरोसे की कमी बताई, उसी तरह आंबेडकर ने लोकतंत्र पर भरोसा किया।

उन्होंने आंबेडकर के उस भाषण का जिक्र किया जिसमें राजनीतिक समानता और सामाजिक-आर्थिक विषमता के अंतर्विरोध की बात थी। सोनपिंपले ने सभा से पूछा कि क्या विषमता घटी है, और कहा कि इस पर कोई हाथ उठाकर हां नहीं कह सकता। उनका निष्कर्ष था कि जब विषमता बनी हुई है तो राज्य का अनुबंध अधूरा है।

उन्होंने कहा कि आरक्षण कोई उपकार या खैरात नहीं है। उनके अनुसार यह वंचित समुदायों और भारतीय राज्य को जोड़ने वाला एकमात्र धागा है, और साथ ही बहुत नाजुक भी। उनका आरोप था कि इस धागे को आज की सरकार कमजोर कर रही है। उन्होंने सामाजिक न्याय के पक्षधरों से कहा कि आरक्षण का बचाव करने की मुद्रा छोड़ें, क्योंकि यह उनका संवैधानिक हक है।

सोनपिंपले ने कहा कि सरकारी नौकरियां घटी हैं और खनन जैसे क्षेत्र निजी हाथों में जा रहे हैं। उनके अनुसार आदिवासी जमीन पर खनन होता है, पर स्थानीय आदिवासियों को छोटी नौकरियां भी नहीं मिलतीं। उन्होंने "मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस" के नारे की आलोचना की और अडानी समूह का नाम लेकर आरोप लगाए। ये आरोप वक्ता के हैं, किसी स्वतंत्र पुष्टि के बिना।

उन्होंने दावा किया कि अनुसूचित जाति की आबादी सही गिनती में 20 करोड़ से अधिक होगी और ओबीसी मंडल आयोग के अनुमान के मुताबिक लगभग 52% हैं। जाति जनगणना पर उन्होंने कहा कि यह बहुजनों की लंबी लड़ाई की जीत है कि सरकार को इसे मानना पड़ा।

उन्होंने आईआईटी में छात्र की आत्महत्या के मामले में सोशल मीडिया पर होने वाली ट्रोलिंग और टीवी बहसों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि जातिगत भेदभाव की शिकायत देर से करने पर उसे खारिज करना गलत है। प्रधानमंत्री के ओबीसी होने के दावे और कालेलकर आयोग का जिक्र करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि कैंपसों में दलित-आदिवासी छात्रों के खिलाफ घटनाओं पर सत्ता पक्ष का कोई बयान क्यों नहीं आता।

उन्होंने दलित-आदिवासी युवाओं से कहा कि अपमान और गाली-गलौज को "नैतिकता" के नाम पर चुपचाप न सहें और जवाब देने से न हिचकें। उन्होंने कहा, "मरना नहीं है," और माता-पिता के संघर्ष का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि उनके पिता साइकिल रिक्शा चलाते थे और मां निर्माण मजदूर थीं।

उन्होंने कहा कि समुदाय "सिर्फ वोट देने के लिए" नहीं है। उन्होंने सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों से मांग की कि इस मांग को अपनाएं। संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में निजी क्षेत्र में आरक्षण के बिल पर चर्चा हो और उसे पारित किया जाए। उनके शब्दों में, जो इस मांग के साथ होगा, समुदाय उसके साथ रहेगा।

उन्होंने घोषणा की कि गांधी जयंती से इस मुद्दे पर नया संघर्ष शुरू होगा। उन्होंने इसे पूना पैक्ट से जोड़ते हुए कहा कि जिस दिन गांधी ने "हमसे पृथक निर्वाचन छीना था", उसी दिन नई लड़ाई शुरू की जाएगी।

 डॉ. राहुल सोनपिंपले ने सवाल उठाया कि कैंपसों में दलित-आदिवासी छात्रों के खिलाफ घटनाओं पर सत्ता पक्ष का कोई बयान क्यों नहीं आता।
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अन्य वक्ताओं ने क्या कहा

दिल्ली विश्वविद्यालय की विधि विभाग की शोधार्थी ऐश्वर्या ने संवैधानिक और कानूनी पहलू रखे। उन्होंने अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण 2023-24 के हवाले से कहा कि 2013 से 2023 के बीच निजी विश्वविद्यालयों की संख्या में 149% की वृद्धि हुई, जबकि सरकारी में 45% की।

विनिवेश, आउटसोर्सिंग और संविदाकरण का जिक्र करते हुए उन्होंने दावा किया कि 2018 से ग्रुप-ए स्तर के 63 पदों (संयुक्त सचिव, निदेशक, उप-निदेशक आदि) पर लेटरल एंट्री से नियुक्ति हुई, जिनमें आरक्षण लागू नहीं था। 2024 में 45 ऐसे पदों को विरोध के बाद वापस लेना पड़ा। उनके अनुसार कुल कार्यबल का अधिकतम लगभग 4% ही सरकारी रोजगार में है, और जनगणना न होने से सटीक आंकड़े नहीं हैं।

आईएलओ 2024 के अनुमान के हवाले से उन्होंने कहा कि 88.4% कार्यबल अनौपचारिक है। औपचारिक रोजगार में अनुसूचित जाति के 7.3% और अनुसूचित जनजाति के 5.1% लोग हैं, जबकि अनारक्षित वर्ग में यह 16.2% है। सफाई से जुड़े कामों में अपने फील्डवर्क के आधार पर उन्होंने अघोषित "आरक्षण" की बात कही। 93वें संविधान संशोधन (2006) से जुड़े अनुच्छेद 15(5) का जिक्र किया, जो निजी (सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त) शिक्षण संस्थानों में भी पिछड़े वर्गों के लिए कानून बनाने की गुंजाइश देता है। उन्होंने बताया कि हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार, अरुणाचल, केरल और असम ने अपने-अपने तरीके से कानून बनाए हैं। उन्होंने केंद्रीय कानून, श्रेणीवार निश्चित कोटा, पारदर्शी प्रवेश और जाति जनगणना की मांग की।

ऐश्वर्या ने कहा कि अगस्त 2025 में संसदीय स्थायी समिति ने निजी उच्च शिक्षा संस्थानों में अनुच्छेद 15(5) लागू करने के लिए केंद्रीय कानून की सिफारिश की, पर शिक्षा मंत्रालय ने इसे राज्यों का विवेकाधिकार बताया। उन्होंने चेन्नई के एक अध्ययन का हवाला दिया, जिसके अनुसार निचली जाति के आवेदकों को समान योग्यता के बावजूद लगभग 20% अधिक आवेदन भेजने पड़े। साथ ही कैलिफोर्निया का सिस्को मामला, आईएलओ कन्वेंशन 111, कनाडा का एम्प्लॉयमेंट इक्विटी एक्ट और दक्षिण अफ्रीका का ब्रॉड-बेस्ड ब्लैक इकोनॉमिक एम्पावरमेंट मॉडल भी गिनाए।

आंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन के अश्विनी कुमार के अनुसार मंडल आयोग के बाद 1991 में एलपीजी सुधार लाए गए और बीते वर्षों में सब कुछ बेचा जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकारी नौकरियां घटने का दोष आरक्षण पर मढ़कर समुदायों के बीच टकराव पैदा किया जाता है। उनका संदेश था कि "आरक्षण खत्म" की बहस के बजाय आरक्षण बढ़ाने और निजी क्षेत्र में लागू करने की बात होनी चाहिए। उन्होंने 2 अक्टूबर को अंबेडकर भवन में बड़े कार्यक्रम की घोषणा की और बताया कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा समेत अन्य राज्यों में भी कार्यक्रम होंगे। एक समन्वय टीम बनाई गई है, जिसमें शामिल होने की अपील की गई।

स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जेएनयू के भोमाराम ने बताया कि वे अपने परिवार में 10वीं पास करने वाली पहली पीढ़ी के हैं। उन्होंने जेएनयू साथियों की पहल "सीमांत से शिखर" का जिक्र किया, जिसमें लगभग 1,900 विद्यार्थियों ने सीयूईटी के लिए आवेदन किया और करीब 1,100 ने परीक्षा पास की, लेकिन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में सिर्फ कुछ सौ ही पहुंच सके। उन्होंने कहा कि आंबेडकर निजी संपत्ति को भेदभाव का कारण मानते थे और सार्वजनिक स्वामित्व की ओर बढ़ने की बात करते थे। दक्षता के तर्क पर उन्होंने 2016 के एक अध्ययन (अश्विनी देशपांडे और थॉमस वाइस्कोफ) का हवाला दिया। उसके अनुसार रेलवे के ग्रुप-ए और बी के एससी/एसटी अधिकारियों की कार्यकुशलता कम नहीं पाई गई। उन्होंने स्कॉलरशिप में कटौती और कैंपस में सहयोग तंत्र के अभाव की आलोचना की।

 डॉ. राहुल सोनपिंपले ने सवाल उठाया कि कैंपसों में दलित-आदिवासी छात्रों के खिलाफ घटनाओं पर सत्ता पक्ष का कोई बयान क्यों नहीं आता।
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विधि छात्र, दिल्ली विश्वविद्यालय के आंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन अध्यक्ष आशुतोष विद्रोही ने कहा कि यह मुद्दा पूना पैक्ट के वादे से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि मंडल के बाद निजीकरण बढ़ा और अब देश के संसाधनों का बड़ा हिस्सा निजी हाथों में है। उन्होंने "लगभग 98%" निजी और "1.7%" सार्वजनिक क्षेत्र का आंकड़ा दिया, पर यह भी माना कि यह सटीक डेटा नहीं है। उन्होंने बताया कि प्रेस रिलीज जारी की जा रही है और 2 अक्टूबर को दिल्ली में बड़ा कार्यक्रम होगा। उन्होंने इस मांग को देशव्यापी आंदोलन बनाने की अपील की।

समाजशास्त्री प्रो. सुमित म्हस्कर ने बताया कि 2004-05 के आसपास प्रो. थोराट के आयोजन में सभी दलों के नेताओं में इस मुद्दे पर सहमति दिखी थी, पर आज किसी सरकार में राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखती। स्कूली शिक्षा पर उन्होंने कहा कि स्कूल व्यवस्था की हालत बेहद खराब है, जिसका सबसे ज्यादा असर गरीब, दलित और आदिवासी बच्चों पर पड़ता है।

उन्होंने स्कॉलरशिप राशि को महंगाई के अनुरूप बढ़ाने की तात्कालिक मांग की। उनका कहना था कि निजी उच्च शिक्षा में आरक्षण आने पर भी फीस का सवाल हल न हुआ तो वह "ना के बराबर" रह जाएगा। उन्होंने कहा कि 1950 में भी औपचारिक रोजगार 8-9% था, आज सरकारी नौकरियां 2-3% बची हैं, और उनमें भी क्लास-थ्री और फोर के 50-60% से ज्यादा कर्मचारी संविदा पर हैं। उन्होंने बीबीसी मराठी की एक रिपोर्ट का जिक्र किया, जिसमें महाराष्ट्र में "क्लॉक-आवर" पर पढ़ाने वाले शिक्षक शाम को सब्जी बेचते दिखे। उनके अनुसार ईडब्ल्यूएस कोटे की मांग भी नौकरियों की कमी से निकली है, इसलिए यह मुद्दा सिर्फ एक समुदाय का नहीं है। उन्होंने मांग रखी कि सरकारी ठेकों, सब्सिडी, मुफ्त बिजली-पानी और सस्ती जमीन जैसे प्रोत्साहन दलित-आदिवासी उद्यमियों को भी मिलें।

प्रो. एन. सुकुमार (राजनीति विज्ञान, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने कहा कि निजी क्षेत्र को भी संवैधानिक सामाजिक न्याय का सम्मान करना होगा, क्योंकि जमीन, पानी, बिजली और सब्सिडी सरकार से मिलती है। उन्होंने 2003-04 में वाजपेयी सरकार के दौरान एससी/एसटी सांसदों की बैठक, मनमोहन सिंह के दौर में उद्योग संगठनों (सीआईआई, फिक्की आदि) की "स्वैच्छिक" पहल और 2024 में चंद्रशेखर आजाद के निजी विधेयक का जिक्र किया।

उन्होंने कहा कि 2001 की तुलना में केंद्र सरकार के स्वीकृत पदों और कर्मचारियों की संख्या में गिरावट आई है और रिक्तियां लगभग 9.5 लाख हैं। सामाजिक न्याय मंत्रालय के जवाब के हवाले से बताया कि 2019 से 2023-24 के बीच केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में नियमित कर्मचारी 9.2 लाख से घटकर 8.12 लाख रह गए। उन्होंने कोल इंडिया में कर्मचारियों की संख्या करीब 7 लाख से घटकर लगभग 2.4 लाख होने का भी जिक्र किया। साथ ही बीएसएनएल, डीआरडीओ, एयर इंडिया, बाल्को और संविदाकरण पर चिंता जताई।

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