
नई दिल्ली- भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित, आदिवासी और ओबीसी छात्र-छात्राओं के साथ होने वाला जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न एक पुरानी और गंभीर समस्या रही है। एम्स, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, आईआईटी बॉम्बे, कानपुर सहित कई प्रतिष्ठित संस्थानों में हुई आत्महत्याओं और लगातार बढ़ते मामलों के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने भेदभाव रोकने के लिए एक नई नियमावली बनाई । 13 जनवरी को जारी अधिसूचना के माध्यम से यूजीसी ने 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) नियम, 2026' को मंजूरी प्रदान की है। ये नियम 2012 के पुराने नियमों के स्थान पर लागू होंगे और भारत के सभी उच्च शिक्षा संस्थानों (एचईआई) पर बाध्यकारी रूप से अमल में लाए जाएंगे।
हालांकि UGC के पूर्व अध्यक्ष और इस मुद्दे पर गहन शोध करने वाले प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रोफेसर सुखदेव थोराट का कहना है कि नये नियम 2012 के नियम से भी कमजोर है और यह जानबूझकर भेदभाव के स्वरूपों को स्पष्ट परिभाषित करने से बच रहा है। 'अंबेडकरनामा' यूट्यूब चैनल को दिए एक लंबे इंटरव्यू में प्रोफेसर थोराट ने इसकी गंभीर कमियों को उजागर किया और चेताया कि यदि इन्हें ठीक नहीं किया गया तो कैंपसों में भेदभाव का सिलसिला यूं ही जारी रहेगा। "क्या यूजीसी एक्ट 2026 को 2012 के एंटी-डिस्क्रिमिनेशन ढांचे को कमजोर करने के लिए लाया गया है?" शीर्षक इस चर्चा में प्रो. रतनलाल द्वारा आयोजित साक्षात्कार ने लेटेस्ट दिशानिर्देशों की गंभीर कमियों को उजागर किया।
प्रो. थोराट ने बताया कि 2012 का नियम कैसे बना। 2008 में एम्स में दो दलित छात्रों ने आत्महत्या की। इसके बाद एक कमेटी बनी। प्रो. थोराट इस कमेटी के अध्यक्ष थे। कमेटी ने पाया कि मेडिकल कॉलेजों में दलित छात्रों के साथ भेदभाव होता है। इस रिपोर्ट के आधार पर 2012 का नियम बना। इस नियम ने भेदभाव के 28 रूपों को स्पष्ट रूप से बताया। इनमें कक्षा में अपमान, हॉस्टल में अलगाव और मूल्यांकन में पक्षपात शामिल थे।
चर्चा की शुरुआत अनियंत्रित जातिवाद के मानवीय मूल्य से हुई। प्रो. थोराट ने कैंपस को झकझोर देने वाली आत्महत्याओं का जिक्र किया जिनमे 2006 के एम्स मामलों से जहां दो दलित छात्रों ने लगातार उत्पीड़न से जान दी, रोहित वेमुला (2016, हैदराबाद विश्वविद्यालय), अनिकेत अंब्होरे (2017, आईआईटी बॉम्बे) और पायल तड़वी (2019, मुंबई के टोपिवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज) तक गिनाया। प्रो. थोराट ने कहा, "भेदभाव सिर्फ मौखिक अपमान नहीं; यह गरिमा पर दैनिक हमला है, एक सर्वे को उद्धृत करते हुए वे कहते हैं कि दलित लड़कियों को अक्सर कोटे को कोठे (वेश्यालय) से जोड़ते हुए अपमानित किया जाता है – "क्या आप कोटे से हैं या कोठे से?"
यूजीसी चेयरमैन (2006-2011) और आईसीएसएसआर प्रमुख के अनुभव से प्रो. थोराट ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर के दृष्टिकोण को याद किया कि शिक्षा "दो धारी तलवार" है, जो समाज को लोकतांत्रिक बना सकती है या उत्पीड़न को बनाए रख सकती है। उन्होंने बताया, "उच्च जाति के शिक्षक और प्रशासक एससी/एसटी छात्रों को 'कोटा एडमिशन' मानते हैं, समान सुविधाओं के लायक नहीं. हॉस्टल में अलगाव (जैसे, उच्च जाति के कमरों से दलित लड़कों को बाहर करना), सांस्कृतिक आयोजनों और खेलों से बहिष्कार, मूल्यांकन पूर्वाग्रह से उचित ग्रेड न मिलना, और एससी/एसटी फैकल्टी के लिए लैब एक्सेस की समस्या प्रचलित है.
प्रो. थोराट के आईसीएसएसआर कार्यकाल के 2019-2024 अध्ययन से पता चला कि लगभग 25% एससी/एसटी छात्र "जातिगत अपमान और होमिसेशन" से मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते हैं। अनिकेत की आत्महत्या के बाद आईआईटी मुंबई के आंतरिक सर्वे ने अलग डाइनिंग हॉल, शैक्षणिक ताने जैसे "कोटा छात्र परफॉर्म नहीं कर सकते," और जाति से जुड़ी रैगिंग आदि को उजागर किया।
प्रोफेसर थोराट के अनुसार, 2012 के नियम की सबसे बड़ी ताकत थी कि उसमें भेदभाव के 28 विशिष्ट रूपों (फॉर्म्स ऑफ डिस्क्रिमिनेशन) को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया था। इसमें प्रवेश प्रक्रिया, फीस, कक्षा में उपेक्षा या अपमानजनक टिप्पणियां, हॉस्टल में अलग-थलग रखना, लैब सुविधाएं न देना, मूल्यांकन में पक्षपात और यहां तक कि 'कोटा स्टूडेंट' या 'कोठे से आया है' जैसी घृणास्पद टिप्पणियां शामिल थीं। इस स्पष्ट सूची का फायदा यह था कि पीड़ित छात्र या शिक्षक जान सकते थे कि उनके साथ क्या हो रहा है वह भेदभाव की परिभाषा में आता है और वे उसकी शिकायत कर सकते हैं।
1. संस्थानों का बड़ा हिस्सा दायरे से बाहर: प्रोफेसर थोराट ने सबसे गंभीर चिंता यह जताई कि नए ड्राफ्ट में 'उच्च शिक्षण संस्थान' की परिभाषा अस्पष्ट है और इस तरह से बनाई गई है कि देश के बड़े और प्रतिष्ठान संस्थान इसकी जद में नहीं आएंगे। उनके मुताबिक, 23 आईआईटी, 21 आईआईएम और लगभग 12,000 स्टैंडअलोन संस्थान (जैसे पॉलिटेक्निक, नर्सिंग कॉलेज, शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान) इस नए नियम के दायरे से बाहर रह जाएंगे। उन्होंने कहा, "जल्दी-जल्दी में प्रेशर आया तो इन्होंने किया, तो इंस्टीट्यूशन को डिफाइन नहीं किया।" इसका मतलब है कि उच्च शिक्षा के एक विशाल क्षेत्र पर यह कानून लागू ही नहीं होगा।
2. भेदभाव की स्पष्ट सूची का गायब होना: यह सबसे विवादास्पद बदलाव है। 2012 के नियम में मौजूद भेदभाव के 28 रूपों की सूची को नए ड्राफ्ट से हटा दिया गया है। अब यह अधिकार संस्थान स्तर पर गठित 'इक्विटी कमेटी' को दे दिया गया है कि वह तय करेगी कि कौन-सा व्यवहार भेदभाव माना जाएगा। थोराट इस पर सख्त आपत्ति जताते हैं। उनका कहना है कि जिन संस्थानों में भेदभाव की संस्कृति पनपी हुई है, उनकी कमेटी कैसे तय करेगी कि क्या भेदभाव है? उन्होंने इसे "जाति और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक गंदगी को सामने लाने से बचने की कोशिश" बताया। उन्होंने कहा, "आपने देखा होगा कि करिकुलम में अंबेडकर साहब के कोर्स, अनटचेबिलिटी, दलित पैंथर ये सारा निकाल दिया है... वो टॉलरेट नहीं कर पाते।"
3. इक्विटी कमेटी में हितों का टकराव (कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट): नए प्रावधान के अनुसार, भेदभाव की शिकायत की जांच और उस पर निर्णय लेने का काम उसी संस्थान की 'इक्विटी कमेटी' करेगी, जिसके अध्यक्ष स्वयं उस संस्थान के वाइस-चांसलर या प्रिंसिपल होंगे। प्रोफेसर थोराट ने इसे गंभीर विसंगति बताया। उन्होंने कहा, "हेड ऑफ द इंस्टीट्यूशन दोनों साइड पर है। डिसीजन लेने में भी है और फाइनल पनिशमेंट डिसाइड करने में भी है।... ये सारासार इलीगल है।" दूसरे शब्दों में, यदि भेदभाव का आरोप प्रिंसिपल या किसी वरिष्ठ प्रोफेसर पर है, तो वही व्यक्ति जांच समिति का भी अध्यक्ष होगा, जो एक स्पष्ट हितों के टकराव की स्थिति है।
4. अगर दलित टीचर के साथ डिस्क्रिमिनेशन हो रहा है, चाहे वाइस चांसलर करे, प्रिंसिपल करे, एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर करे, तो क्या इस एक्ट में वो भी कवर्ड है?" उनका जवाब है "मेरा ख्याल है वो कवर्ड नहीं है, क्लेरिटी नहीं है।" 2012 के नियम में शिक्षकों के साथ भेदभाव (जैसे पदोन्नति, शोध मार्गदर्शन, लैब एक्सेस) के रूप भी स्पष्ट थे, लेकिन नए ड्राफ्ट में यह विस्तार गायब है।
5. दंड प्रणाली में स्पष्टता का अभाव: पीड़ित पक्षों की लंबे समय से यह मांग रही है कि शैक्षणिक भेदभाव को केवल सिविल या प्रशासनिक दंड (जैसे जुर्माना, सेवा समाप्ति) तक सीमित न रखकर, इसे एक आपराधिक (क्रिमिनल) अपराध भी माना जाए, जैसा कि रैगिंग के मामले में है। रैगिंग के खिलाफ कठोर कानून बनने से उसमें काफी कमी आई है। हालांकि, नए ड्राफ्ट में इस बारे में कोई स्पष्ट और अनिवार्य प्रावधान नहीं है, बल्कि यह वाइस-चांसलर के विवेक पर छोड़ दिया गया है कि वह मामले को आपराधिक मामला मानते हुए पुलिस को सौंपे या नहीं।
प्रोफेसर थोराट ने यह भी बताया कि कर्नाटक सरकार ने उनकी अध्यक्षता वाले शिक्षा आयोग की सिफारिश पर 'वेमुला एक्ट' लागू करने का निर्णय लिया है, जो शैक्षणिक भेदभाव को एक आपराधिक अपराध मानेगा। उन्होंने कहा कि UGC के नए ड्राफ्ट में कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं, जैसे ओबीसी समुदाय को शामिल करना, संवेदनशीलता कार्यक्रम चलाना और 'डिस्क्रिमिनेशन स्पॉट' नियुक्त करने का प्रस्ताव लेकिन उपरोक्त गंभीर खामियों के कारण ये सकारात्मक कदम भी प्रभावहीन हो सकते हैं।
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