
नई दिल्ली- भारत के ईसाई समुदाय ने दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति (एससी) का विशेष दर्जा देने की समीक्षा में लगातार हो रही देरी पर गहरी नाराजगी जताई है। चर्च के नेताओं का आरोप है कि केंद्र सरकार की यह देरी दलित ईसाइयों और मुसलमानों के साथ हो रहे भेदभाव को दूर करने में अनिच्छा को साफ दिखाती है।
इस मुद्दे के राजनीतिक आयाम जटिल बने हुए हैं। सत्तारूढ़ भाजपा ईसाई और मुस्लिम धर्मांतरितों को एससी दर्जा देने के पक्ष में नहीं है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) के अध्यक्ष किशोर मकवाना ने ईसाई और इस्लाम धर्म में धर्मांतरित दलितों को अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा देने का कड़ा विरोध किया। इसी तरह AJAK राजस्थान ने भी बीते साल जस्टिस बालकृष्णन आयोग से अनुरोध किया कि अनुसूचित जाति सूची में कोई भी बदलाव न किया जाए और मौजूदा SC समुदायों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की जाए।
वहीं दूसरी तरफ, विभिन्न दलित संगठन अधिक समावेशी एससी दर्जे के मानदंडों की वकालत करते रहे हैं। उनका तर्क है कि धार्मिक परिवर्तन इन समुदायों के सामने आने वाली सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों को नहीं मिटाता।
हाल ही में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने 9 अप्रैल को एक नोटिस जारी कर के.जी. बालकृष्णन आयोग की समयसीमा दो महीने और बढ़ा दी है। अब आयोग को 10 जून तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। यह तीन साल में तीसरा एक्सटेंशन है। आयोग की स्थापना अक्टूबर 2022 में हुई थी और शुरू में इसे दो साल का समय दिया गया था।
संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 के तहत एससी का दर्जा वर्तमान में केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्मों के दलितों को ही दिया जाता है। शुरू में यह केवल हिंदुओं तक सीमित था। 1956 में सिखों को और 1990 में बौद्धों को इसमें शामिल किया गया। दलित ईसाई और दलित मुसलमान इस लाभ से बाहर हैं। सरकार का तर्क है कि ईसाई और इस्लाम धर्म में जाति व्यवस्था नहीं होती, इसलिए इनमें धर्म परिवर्तन के बाद भी अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
दलित ईसाई और मुसलमानों को एससी सूची में शामिल करने की मांग लंबे समय से चल रही है। 1996 में एक विधेयक तैयार किया गया था, लेकिन अलग-अलग राय के कारण उसे संसद में पेश नहीं किया गया। यूपीए सरकार ने 2004 में रंगनाथ मिश्रा आयोग का गठन किया, जिसने 2007 में अपनी रिपोर्ट में एससी दर्जे को धर्म से अलग करने की सिफारिश की। इसी तरह सचर समिति (2005) ने भी बताया कि धर्म परिवर्तन के बाद दलित मुसलमानों और ईसाइयों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ।
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने भी दलित ईसाइयों और मुसलमानों को एससी दर्जा देने का समर्थन किया है।
भारत के रजिस्ट्रार जनरल (आरजीआई) के अनुसार, एससी दर्जा उन समुदायों के लिए है जो अछूत प्रथा के कारण सामाजिक विकलांगताओं का शिकार होते हैं। यह मुख्य रूप से हिंदू और सिख समुदायों से जुड़ा माना जाता है। आरजीआई ने चेतावनी दी कि अगर दलित ईसाइयों और मुसलमानों को शामिल किया गया तो देशभर में एससी आबादी में भारी बढ़ोतरी हो सकती है।
2001 में आरजीआई ने 1978 के एक नोट का हवाला देते हुए कहा कि इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने वाले दलित अलग-अलग जाति समूहों से आते हैं, न कि एक एकीकृत समुदाय से। इसलिए उन्हें संविधान के अनुच्छेद 341 के खंड (2) के तहत “एक जातीय समूह” मानकर एससी सूची में शामिल नहीं किया जा सकता।
औपनिवेशिक काल में भी कई निचली जातियों के लोग ईसाई धर्म में परिवर्तित हुए, लेकिन उन्हें स्थापित सेंट थॉमस ईसाई समुदाय में शामिल नहीं होने दिया गया। वे धर्म परिवर्तन के बाद भी भेदभाव का शिकार रहते थे।
आज भी दलित ईसाइयों को चर्च के अंदर जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इसमें अलग चैपल और कब्रिस्तान, चर्च प्रशासन और गतिविधियों में अधिकारों से वंचित रखना तथा चर्च की नेतृत्व भूमिकाओं में सीमित प्रतिनिधित्व शामिल है।
2022 में केंद्र सरकार ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय आयोग गठित किया। आयोग में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी डॉ. रविंद्र कुमार जैन और यूजीसी सदस्य प्रो. सुषमा यादव शामिल हैं।
आयोग का काम है कि वह जांचे कि सिख या बौद्ध धर्म के अलावा अन्य धर्मों (ईसाई और इस्लाम) में परिवर्तित दलितों को एससी दर्जा दिया जा सकता है या नहीं। आयोग सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवर्तनों का अध्ययन करेगा जो धर्म परिवर्तन के बाद दलितों के जीवन में आते हैं। साथ ही वह यह भी देखेगा कि क्या ये परिवर्तन उन्हें एससी श्रेणी में शामिल करने का आधार बन सकते हैं। आयोग केंद्र सरकार से परामर्श लेकर अन्य संबंधित मुद्दों पर भी विचार कर सकता है।
चर्च के नेता इसे “देरी और इनकार की रणनीति” बता रहे हैं। इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक फादर प्रकाश लुईस ने कहा, “सरकार ने इन दलित समुदायों की उम्मीदों के साथ फिर खेला है। पैनल रिपोर्ट नहीं सबमिट कर पाएगा और अगर जमा भी हुई तो सरकार उसे संसद में पेश नहीं करेगी। हिंदू दलित भी इसे साझा नहीं करना चाहते।”
कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया के फादर विजय कुमार नायक ने कहा कि इस आयोग में मिश्रा आयोग की तरह उचित तरीका नहीं अपनाया गया। बहुत कम फील्ड विजिट हुईं और कोई प्रश्नावली नहीं भेजी गई। फिर भी बिशप्स कॉन्फ्रेंस ने चर्च के अंदर और समाज में दलित ईसाइयों के साथ हो रहे जातिगत भेदभाव के हालिया मामलों का प्रमाण जुटाकर आयोग को सौंपा है।
ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन के प्रवक्ता जॉन दयाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीजेपी सरकार हिंदू धर्म से परिवर्तन करने वालों को लाभ देने का विरोध करती है, क्योंकि इससे दलितों का हिंदू धर्म छोड़ने का सिलसिला बढ़ सकता है। बौद्ध धर्म को सरकार हिंदू परंपरा का हिस्सा मानती है, इसलिए उसमें रूपांतरण को सहन कर लेती है।
चेन्नई के लोयोला संस्थानों के रेक्टर फादर फ्रांसिस पी. जेवियर ने कहा, “कई दलित सामाजिक भेदभाव और शोषण से बचने के लिए ईसाई बनते हैं, लेकिन चर्च के अंदर भी वे जातिगत व्यवहार से नहीं बच पाते। धर्म परिवर्तन से जातिगत भेदभाव, सामाजिक कलंक या आर्थिक पिछड़ापन नहीं मिटता। इसलिए दलित ईसाइयों को एससी दर्जा मिलना चाहिए।”
डॉ. अंबेडकर अनुसूचित जाति अधिकारी-कर्मचारी एसोसिएशन (AJAK राजस्थान) ने अनुसूचित जाति (SC) समुदायों के हितों की रक्षा के लिए अप्रेल 2025 में के.जी. बालकृष्णन आयोग को एक विस्तृत पत्र भेजा था। इस पत्र में संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जाति सूची में संभावित बदलावों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई। साथ ही इसमें दलित ईसाई या मुसलमानों जैसे नए समूहों को सूची में शामिल किए जाने का कड़ा विरोध किया। एसोसिएशन का मानना है कि ऐसा करने से मौजूदा SC समुदायों के अधिकारों और लाभों पर संकट आ सकता है।
पत्र में अनुसूचित जाति समुदायों के सामने आने वाली समस्याओं जैसे जातिगत अत्याचार, निजीकरण के कारण घटती नौकरी के अवसर, और सरकारी भर्ती में "नॉट फाउंड सूटेबल" (NFS) के रूप में अनुचित अस्वीकृति का उल्लेख किया गया है। संगठन ने जोर दिया कि संविधान इन ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिए शिक्षा, रोजगार, और सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में विशेष संरक्षण प्रदान करता है।
AJAK राजस्थान ने जस्टिस बालकृष्णन आयोग से अनुरोध किया है कि अनुसूचित जाति सूची में कोई भी बदलाव न किया जाए और मौजूदा SC समुदायों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की जाए। संगठन ने धर्म के आधार पर किसी भी भेदभाव को रोकने और अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जाति सूची को संरक्षित करने की मांग की है।
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