धर्मांतरित लोगों के एससी दर्जे पर विचार करने वाले आयोग का कार्यकाल तीसरी बार बढ़ा, पैनल पर उठे सवाल

धर्मांतरित लोगों (दलित ईसाई और मुस्लिम) को एससी (SC) का दर्जा मिलेगा या नहीं? इस मामले की जांच कर रहे केजी बालकृष्णन आयोग का कार्यकाल केंद्र सरकार ने तीसरी बार बढ़ा दिया है।
Former Chief Justice of India K G Balakrishnan
बालकृष्णन आयोग का कार्यकाल तीसरी बार बढ़ा
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नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने पिछले तीन सालों में तीसरी बार एक महत्वपूर्ण जांच आयोग के कार्यकाल को विस्तार दिया है। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन की अध्यक्षता वाले इस आयोग का गठन एक विशेष उद्देश्य से किया गया था। इसका काम उन लोगों को अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा देने की संभावनाओं का अध्ययन करना है, जिन्होंने हिंदू, ईसाई, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपना लिया है।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा नौ अप्रैल को एक अधिसूचना जारी की गई है। इस अधिसूचना के अनुसार, जांच आयोग का कार्यकाल दो महीने के लिए और बढ़ा दिया गया है। अब यह नया विस्तार 11 अप्रैल से लेकर 10 जून, 2026 तक पूरी तरह से प्रभावी रहेगा।

इस जांच आयोग की नियुक्ति मूल रूप से अक्टूबर 2022 में दो साल की निर्धारित अवधि के लिए की गई थी। इसके बाद पहली बार इसके कार्यकाल को एक साल बढ़ाकर 10 अक्टूबर 2025 तक किया गया। फिर दूसरी बार इसे छह महीने का विस्तार मिला, जो 10 अप्रैल तक के लिए था।

आयोग को यह तीसरा विस्तार 24 मार्च को आए सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले के ठीक बाद दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने हालिया आदेश में स्पष्ट किया था कि एससी का दर्जा केवल हिंदुओं, सिखों और बौद्धों के लिए ही उपलब्ध है। कोर्ट का कड़ाई से कहना था कि किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करने पर उसी क्षण से व्यक्ति का जातिगत दर्जा तत्काल और पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा।

संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुच्छेद 341 के पैरा 3 में एससी दर्जे को लेकर स्पष्ट नियम बनाए गए हैं। इसके तहत यह प्रावधान है कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता है। शुरुआती आदेश में केवल हिंदू शामिल थे, लेकिन बाद में कानून में संशोधन करके 1956 में सिखों और 1990 में बौद्धों को इस सूची में जगह दी गई।

फिलहाल इस जांच आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को नहीं सौंपी है। वहीं दूसरी तरफ, 1950 के आदेश की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाला एक बड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट में अभी भी लंबित है। इस मामले में दलित ईसाइयों ने अदालत के समक्ष कड़ा तर्क दिया है कि मौजूदा प्रतिबंध उनके धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का खुला उल्लंघन करते हैं।

नेशनल काउंसिल ऑफ दलित क्रिश्चियंस (एनसीडीसी) के पूर्व अध्यक्ष और राष्ट्रीय सलाहकार वीजे जॉर्ज ने इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखा है। उन्होंने बताया कि उनके संगठन के कई प्रतिनिधिमंडल जस्टिस बालकृष्णन आयोग से मुलाकात कर चुके हैं। जॉर्ज ने इस बात पर गहरी हैरानी जताई कि आखिर आयोग को अपनी अंतिम रिपोर्ट और सिफारिशें तैयार करने में इतना लंबा समय क्यों लग रहा है।

वहीं, पसमांदा मुस्लिम समाज के अध्यक्ष और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव मोहम्मद अनीस मंसूरी ने भी जांच प्रक्रिया पर अपनी बात साझा की। मुस्लिम समुदाय के पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस संगठन ने जांच आयोग को पत्र लिखकर अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा था। मंसूरी ने बताया कि उन्होंने अपना बयान दर्ज कराने के लिए आयोग को कई बार पत्र लिखा, लेकिन निराशाजनक रूप से उन्हें वहां से कोई जवाब नहीं मिला।

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