
नई दिल्ली- केंद्र सरकार की सार्वजनिक खरीद नीति के तहत अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) स्वामित्व वाले सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों (MSEs) से न्यूनतम 4 प्रतिशत खरीद का कानूनी लक्ष्य 9 वर्ष बाद भी सिर्फ 1.79 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया है।
यह खुलासा राज्यसभा में 9 मार्चको स्टार्ड प्रश्न संख्या 171 के लिखित जवाब में हुआ है। लोकसभा सांसद प्रो. वर्षा एकनाथ गायकवाड़ (मुंबई उत्तर-मध्य) ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर नीति के “असंगत और उपेक्षित” कार्यान्वयन पर तत्काल हस्तक्षेप की अपील की।
सांसद गोल्ला बाबूराव ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री से सवाल पूछा कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति उद्यमियों के लिए कार्यान्वित की जा रही राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति हब योजना के उद्देश्य क्या हैं; क्या यह सच नहीं है कि सरकार ने सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए सार्वजनिक खरीद नीति के तहत अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों से 4 प्रतिशत खरीद अनिवार्य की है; और (ग) यदि हां, तो अनिवार्य 4 प्रतिशत खरीद के कार्यान्वयन के बाद से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति उद्यमों से की गई खरीद का प्रतिशत, विशेष रूप से आंध्र प्रदेश राज्य के संदर्भ में क्या है?
माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (MSME) मंत्री जीतन राम मांझी ने राज्यसभा में सवाल का जवाब देते हुए स्पष्ट किया:
(a) नेशनल SC/ST हब (NSSH) योजना का उद्देश्य: अक्टूबर 2016 से लागू इस योजना का मकसद SC/ST उद्यमिता को बढ़ावा देना और पब्लिक प्रोक्योरमेंट पॉलिसी के तहत MSEs से अनिवार्य 4% खरीद को पूरा करना है।
(b) 4% लक्ष्य की पुष्टि: हां, पब्लिक प्रोक्योरमेंट पॉलिसी फॉर MSEs ऑर्डर 2012 के तहत केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों, विभागों और केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (CPSEs) को कुल वार्षिक खरीद का 25% MSEs से और उसमें से 4% SC/ST स्वामित्व वाले MSEs से खरीदना अनिवार्य है।
(c) वास्तविक आंकड़े: MSME संबध पोर्टल (8 दिसंबर 2017 को लॉन्च) पर दर्ज आंकड़ों के अनुसार, देशभर में SC/ST MSEs से खरीद का प्रतिशत इस प्रकार रहा (05 मार्च 2026 तक):
कुल खरीद का 25% MSEs से अनिवार्य।
उसमें 4% SC/ST स्वामित्व वाले MSEs से (कुल खरीद का 4%, न कि 25% का 4%)।
3% महिला स्वामित्व वाले MSEs से।
SC/ST MSE की परिभाषा: प्रोप्राइटरशिप में SC/ST मालिक, पार्टनरशिप में 51% हिस्सेदारी या कंपनी में 51% प्रमोटर शेयर SC/ST के पास।
टेंडर फॉर्म मुफ्त, ईएमडी छूट, 358 वस्तुओं का आरक्षण और वेंडर डेवलपमेंट प्रोग्राम अनिवार्य।
राज्यसभा जवाब और MSME संबध पोर्टल के आंकड़े साफ दिखाते हैं कि 9 साल में प्रतिशत 0.48% से बढ़कर सिर्फ 1.79% ही हुआ है। यानी 4% लक्ष्य का लगभग 55% भी पूरा नहीं हुआ। कई CPSEs और मंत्रालय 25% MSE लक्ष्य तो पूरा कर लेते हैं, लेकिन SC/ST उप-लक्ष्य को नजरअंदाज कर देते हैं। कारण:
SC/ST उद्यमियों की क्षमता निर्माण और बाजार पहुंच की कमी।
कुछ विभागों में टेंडर दस्तावेजों में SC/ST को शामिल न करना या L1 (सबसे कम बोली) मिलने पर भी प्राथमिकता न देना।
राज्य सरकारों द्वारा केंद्र की नीति को पूरी तरह अपनाने या लागू न करने की प्रवृत्ति।
निगरानी की कमी।
इसी अनदेखी को लेकर प्रो. वर्षा गायकवाड़ ने 24 मार्च को राष्ट्रपति को लिखे पत्र में कहा: “ केंद्रीय नीति में यह अनिवार्य है कि सरकारी खरीद और टेंडरों के कुल मूल्य का न्यूनतम 10 प्रतिशत एससी/एसटी उद्यमियों से प्राप्त किया जाए। यह नीति समावेशी आर्थिक विकास को बढ़ावा देने, हाशिए पर खड़े समुदायों के बीच उद्यमिता को प्रोत्साहित करने और राष्ट्रीय विकास में उनकी समान भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाई गई थी। नीति को राज्य स्तर पर असंगत और ज्यादातर मामलों में नजरअंदाज किया जा रहा है। परिणामस्वरूप SC/ST उद्यमी अपना हक नहीं पा रहे और सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के उद्देश्य अधूरे रह गए हैं।” उन्होंने राष्ट्रपति से अनुरोध किया कि केंद्र सभी मंत्रालयों, विभागों और राज्य सरकारों को सख्ती से समान कार्यान्वयन का निर्देश दे। साथ ही निगरानी तंत्र, खरीद अधिकारियों में जागरूकता और SC/ST उद्यमियों के लिए क्षमता-निर्माण कार्यक्रम शुरू किए जाएं।
सरकारी खरीद नीति का 4% SC/ST उप-लक्ष्य कागजों पर है, अमल में नहीं। जब देश आत्मनिर्भर भारत और वंचित वर्गों के सशक्तिकरण की बात करता है, तब यह लगातार उल्लंघन सिर्फ कानूनी कमी नहीं, बल्कि संवैधानिक न्याय की अनदेखी भी है। राष्ट्रपति के हस्तक्षेप और सख्त निगरानी से ही लाखों SC/ST उद्यमी वास्तविक लाभ उठा सकेंगे।
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