
बिलासपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जाति आयोग को किसी आरोपी के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने की सिफारिश करते समय यह घोषित करने का अधिकार नहीं है कि अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 की धारा 3(1) के तहत आरोप "सिद्ध" हो चुका है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने यह आदेश कोरबा जिले के शासकीय महाविद्यालय, बरपाली में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत मृगेश कुमार यादव द्वारा दायर याचिका पर सुनाया।
याचिकाकर्ता के विरुद्ध कथित शिकायतकर्ता, जो परीक्षा में नकल करते हुए पकड़ी गई थी, ने राज्य अनुसूचित जाति आयोग, रायपुर के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता नकल के मामले का हवाला देकर उसे प्रताड़ित कर रहा था। आयोग ने 21 जनवरी 2020 को याचिकाकर्ता को नोटिस जारी किया, जिसका उसने 3 फरवरी 2020 को विस्तृत जवाब देते हुए यह भी बताया कि इसी प्रकार के आरोपों पर पूर्व में जांच हो चुकी है और शिकायत झूठी पाई गई थी। इसके बावजूद आयोग ने 16 मार्च 2021 को याचिकाकर्ता के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने की सिफारिश जारी कर दी, जिसमें स्पष्ट रूप से यह उल्लेख किया गया कि धारा 3(1) के तहत आरोप सिद्ध पाया गया है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता कबीर कलवानी ने तर्क दिया कि आयोग ने सिफारिश की आड़ में वस्तुतः एक ऐसा आदेश पारित किया है जो आपराधिक न्यायालय के क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण करता है, क्योंकि आयोग ने स्वयं आरोप को सिद्ध घोषित कर दिया, जबकि यह अधिकार केवल सक्षम आपराधिक अदालत को है। वहीं आयोग की ओर से अधिवक्ता पूर्णिमा सिंह ने दलील दी कि आयोग ने मामले के हर पहलू पर विस्तार से विचार करने के बाद ही 17 पृष्ठों की विस्तृत सिफारिश जारी की और अनुसूचित जाति आयोग अधिनियम, 1995 की धारा 9 के तहत आयोग की सलाह सामान्यतः राज्य सरकार पर बाध्यकारी होती है, इसलिए यह केवल एक अनुशंसा है।
न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला देते हुए अपना फैसला सुनाया। भबानी प्रसाद जेना बनाम कन्वीनर सेक्रेटरी, उड़ीसा राज्य महिला आयोग मामले (2010) 8 SCC 633 का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि राज्य आयोग शिकायतें प्राप्त कर सकता है, जांच कर सकता है और संबंधित प्राधिकारियों के समक्ष उपचारात्मक कार्रवाई के लिए मामला उठा सकता है, किंतु उसे पक्षकारों के अधिकारों का न्यायनिर्णयन (adjudicate) करने की शक्ति प्राप्त नहीं है।
इसी क्रम में हाल ही के मुंबई पोर्ट अथॉरिटी बनाम राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (2026 SCC OnLine SC 1398) के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आयोग को दिए गए सिविल कोर्ट जैसे अधिकार केवल साक्ष्य एकत्र करने और तथ्यात्मक निष्कर्ष दर्ज करने तक सीमित हैं। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उद्धृत करते हुए अदालत ने लिखा, "आयोग तथ्यात्मक निष्कर्ष दर्ज कर संबंधित सरकार से उस पर कार्रवाई करने के लिए कह सकता है, परंतु उसे स्पष्ट रूप से न्यायनिर्णयन की शक्ति प्राप्त नहीं है, अधिक से अधिक यह अनुशंसात्मक प्रकृति की है।"
न्यायालय ने ऑल इंडिया इंडियन ओवरसीज़ बैंक एससी-एसटी कर्मचारी कल्याण संघ बनाम भारत संघ, (1996) 6 SCC 606 का भी संदर्भ देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत आयोग को दी गई सिविल कोर्ट की शक्तियां केवल जांच और अनुसंधान की सीमित प्रक्रिया के लिए हैं, न कि निषेधाज्ञा जैसे स्थायी या अस्थायी आदेश पारित करने के लिए।
इन सभी उदाहरणों के आधार पर अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि "आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से यह कहकर कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध अधिनियम, 1989 की धारा 3(1) के तहत आरोप सिद्ध है, अपने क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण किया है, क्योंकि यह विषय आपराधिक न्यायालय के दायरे में आता है।" इसी आधार पर कोर्ट ने आयोग की सिफारिश को दोषपूर्ण मानते हुए याचिका को स्वीकार कर लिया।
इस निर्णय को छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जाति आयोग सहित अन्य वैधानिक आयोगों के क्षेत्राधिकार की सीमाओं को स्पष्ट करने वाला एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें यह रेखांकित किया गया है कि आयोग प्राथमिकी दर्ज कराने की सिफारिश तो कर सकते हैं, किंतु आपराधिक आरोपों को स्वयं "सिद्ध" घोषित नहीं कर सकते।
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