
मदुरै- मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि किसी भी सार्वजनिक धार्मिक उत्सव में जाति के आधार पर किसी वर्ग के नागरिकों को बहिष्कृत करने वाली कोई भी प्रथा या रिवाज संवैधानिक रूप से मान्य नहीं हो सकती। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 17 अछूतता को पूर्णतः समाप्त करता है और यह प्रतिबंध किसी भी रिवाज, परंपरा या सामाजिक स्वीकृति के अधीन नहीं है।
जस्टिस एल.विक्टोरिया गौरी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने बकियाराज की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण निर्देश दिए। याचिकाकर्ता देवेन्द्र कुल वेल्लालर समुदाय से हैं और उन्होंने आरोप लगाया कि दिंडीगुल जिले के निलाकोट्टई तालुक के मुथलापुरम गांव में अरुलमिघु अयिरम अरुवल कोट्टई करुप्पसामी मंदिर के वार्षिक उत्सव के दौरान रेशमी वस्त्र से सुसज्जित लकड़ी के संदूक को उनके समुदाय के बहुल नॉर्थ स्ट्रीट में प्रवेश करने से रोका जाता है।
याचिकाकर्ता बाकियारज देवेंद्र कुला वेल्लालर समुदाय से हैं और मुथलापुरम गांव की उत्तर सड़क के निवासी हैं, उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि गांव का यह देवता सार्वजनिक है और सभी जाति-वर्ग के लोग उसकी पूजा करते हैं। थाई मास में हर साल रेशमी कपड़े से सजा लकड़ी का संदूक जुलूस के रूप में गांव की सड़कों पर निकाला जाता है। लेकिन पिछले कई वर्षों से प्रतिवादियों (कुमनेसन, रघुपति, सीनी, सतीश, कथिनिसन और कन्नन) ने जानबूझकर इस जुलूस को उत्तर सड़क में प्रवेश नहीं करने दिया। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह रोक पूरी तरह जातिगत आधार पर है। निजी प्रतिवादी यह कहते हैं कि देवता का जुलूस उत्तर सड़क में आने से अशुद्ध और अपवित्र हो जाएगा। साथ ही, देवेंद्र कुला वेल्लालर समुदाय के लोगों को मंदिर प्रशासन में शामिल नहीं किया जाता, चढ़ावा चढ़ाने से रोका जाता है और उत्सव संबंधी फैसले लेने से बाहर रखा जाता है।
याचिकाकर्ता ने जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, राजस्व मंडलीय अधिकारी, तहसीलदार और पुलिस निरीक्षक सहित अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की थी कि वे जुलूस को उत्तर सड़क में प्रवेश सुनिश्चित करें और उत्सव समिति में देवेंद्र कुला वेल्लालर समुदाय के कुछ सदस्यों को शामिल कर शांतिपूर्ण उत्सव करवाएं।
निजी प्रतिवादियों ने जवाब में कहा कि गांव में कोई जातिगत भेदभाव नहीं है। हर समुदाय के अपने मंदिर और अपनी प्रथाएं हैं। जुलूस का रास्ता सदियों से वही चला आ रहा है और कभी भी याचिकाकर्ता के समुदाय वाली सड़क से नहीं निकाला गया। सभी समुदाय के लोग मंदिर में प्रवेश कर पूजा कर सकते हैं और कोई जातिगत रोक नहीं है। उन्होंने पहले के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा कि यह याचिका उसी मुद्दे को दोबारा खोलने की कोशिश है।
सरकारी पक्ष ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है और सभी भक्तों को जाति की परवाह किए बिना मंदिर में पूजा और धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति दी जाएगी।
अदालत ने इस मामले को सिर्फ एक गांव के जुलूस के रास्ते का विवाद नहीं माना। बल्कि इसे संवैधानिक नैतिकता और सामाजिक लोकतंत्र का मुद्दा बताया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा:
“भारत का संविधान केवल राजनीतिक लोकतंत्र स्थापित नहीं करता। यह स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित सामाजिक लोकतंत्र की कल्पना करता है। संविधान निर्माताओं ने जानबूझकर स्वीकार किया था कि जातिगत भेदभाव ने सदियों से भारतीय समाज के बड़े हिस्से को गरिमा और समान दर्जा से वंचित रखा है। इसलिए संविधान ने अनुच्छेद 14 के तहत कानून के समक्ष समानता की गारंटी दी, अनुच्छेद 15 के तहत भेदभाव पर रोक लगाई और अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता को उसके सभी रूपों में समाप्त कर दिया।”
अदालत ने आगे कहा कि जब किसी अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों को सार्वजनिक धार्मिक उत्सव में भाग लेने या सार्वजनिक मंदिर में समान पहुंच से रोका जाता है तो यह सिर्फ निजी विवाद नहीं होता।
“ऐसे आरोप संवैधानिक नैतिकता के मूल पर चोट करते हैं।”
अदालत ने अनुच्छेद 17 की व्याख्या करते हुए लिखा —
“अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है और उसके किसी भी रूप में अभ्यास को मना करता है। यह संवैधानिक प्रतिबंध पूर्ण है। यह प्रथा, रिवाज, स्थानीय परंपरा या सामाजिक स्वीकृति के अधीन नहीं है। संविधान सिर्फ शारीरिक अलगाव पर रोक नहीं लगाता। जाति की पहचान के कारण किसी नागरिक पर थोपी गई कोई भी अक्षमता अनुच्छेद 17 के व्यापक संवैधानिक दृष्टिकोण के दायरे में आती है, जिसे वह मिटाना चाहता है।”
अनुच्छेद 25 के बारे में अदालत ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और भाग-III के अन्य प्रावधानों के अधीन है।
“कोई भी धार्मिक प्रथा या प्रथागत उपयोग संवैधानिक जांच में नहीं टिक सकता यदि वह समानता, गरिमा या बंधुत्व का उल्लंघन करता है। संवैधानिक नैतिकता को सामाजिक नैतिकता पर हमेशा प्राथमिकता मिलनी चाहिए जब दोनों में टकराव हो।”
अनुच्छेद 51ए(ई) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि मंदिर उत्सव सिर्फ धार्मिक कार्यक्रम नहीं है।
“यह एक सामाजिक संस्था भी है जो लोगों को एकजुट करने के लिए होती है। अगर कोई उत्सव बहिष्कार का माध्यम बन जाए तो सामुदायिक पूजा का उद्देश्य ही हार जाता है।”
अदालत ने याचिकाकर्ता के आरोपों और प्रतिवादियों के इनकार को देखते हुए कहा कि ऐतिहासिक मार्ग, प्रथाओं और उत्सव प्रशासन से जुड़े विवादित सवाल रिट याचिका में सिर्फ शपथ-पत्रों के आधार पर तय नहीं किए जा सकते। लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया:
“जब सार्वजनिक धार्मिक उत्सव से जातिगत बहिष्कार के आरोप लगाए गए हों तो संवैधानिक अदालतें याचिकाकर्ता को सिविल फोरम में भेजकर नहीं बैठ सकतीं। समानता, गरिमा और बंधुत्व के मुद्दों पर संवैधानिक अदालतें मूक दर्शक नहीं रह सकतीं।”
अदालत ने जिला कलेक्टर को मुख्य जिम्मेदारी सौंपते हुए कहा:
“जिला कलेक्टर को याद रखना चाहिए कि मुद्दा सिर्फ मार्ग प्रबंधन का नहीं है। यह समान नागरिकता के संवैधानिक वादा से जुड़ा है। संविधान जातिगत पदानुक्रम के आधार पर सार्वजनिक धार्मिक जीवन में श्रेणीबद्ध भागीदारी को नहीं मानता। आस्था को जाति की लकीरों पर सड़क-दर-सड़क बांटा नहीं जा सकता। पूरे गांव द्वारा पूजे जाने वाले देवता पूरे गांव के हैं। सार्वजनिक धार्मिक संस्थाएं सामाजिक बहिष्कार को बनाए रखने का औजार नहीं बन सकतीं।”
अदालत ने 12 सप्ताह के अंदर विस्तृत जांच का आदेश देते हुए कलेक्टर को निर्देश दिए कि वे सभी हितधारकों (याचिकाकर्ता समुदाय, निजी प्रतिवादी, गांव के बुजुर्ग, राजस्व, पुलिस और जरूरत पड़े तो एचआरसीई विभाग) की बैठक बुलाएं। खुद या राजस्व मंडलीय अधिकारी के माध्यम से गांव और मौजूदा जुलूस मार्ग का निरीक्षण करें। यह पता लगाएं कि ऐतिहासिक मार्ग क्या था, क्या याचिकाकर्ता समुदाय को उत्सव या प्रशासन से बाहर रखा गया है, क्या कोई जातिगत भेदभाव या अस्पृश्यता है, क्या उत्तर सड़क को जुलूस में शामिल करना संभव है और सभी वर्गों की समावेशी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाने होंगे।
यदि कलेक्टर पाते हैं कि उत्तर सड़क को शामिल करना संभव है और इससे समानता, बंधुत्व और सामाजिक समावेश के संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा मिलेगा तो इसके लिए उचित व्यवस्था की जाए। कोई भी भक्त जाति के आधार पर मंदिर में प्रवेश, पूजा, प्रार्थना या वैध धार्मिक गतिविधियों से वंचित न हो। अस्पृश्यता या जातिगत भेदभाव के किसी भी कृत्य पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो। पुलिस अधीक्षक पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराएं।
अदालत ने अपने आदेश का अंत एक गहरी टिप्पणी के साथ किया: एक लोकतांत्रिक समाज की असली ताकत बहिष्कार वाली परंपराओं को बचाने में नहीं, बल्कि उन्हें संवैधानिक नैतिकता की रोशनी में सुधारने में है। प्रथाओं का सम्मान हो सकता है, भेदभाव का कभी नहीं।”
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