
जयपुर- राजस्थान पुलिस मुख्यालय ने एक नया परिपत्र जारी कर पुलिस रिकॉर्ड, पत्राचार और आधिकारिक दस्तावेज़ों में 'दलित' शब्द का प्रयोग नहीं करने के निर्देश दिए हैं। इसके स्थान पर केवल 'अनुसूचित जाति' अथवा अंग्रेज़ी में 'Scheduled Caste' लिखने को कहा गया है। इस आदेश के बाद सोशल मीडिया और सामाजिक-राजनीतिक हलकों में नई बहस छिड़ गई है।
2 जुलाई को अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस (सिविल राइट्स एवं एएचटी) कार्यालय से जारी परिपत्र में कहा गया है कि केंद्र सरकार के 15 मार्च 2015 के परिपत्र तथा न्यायालयों की टिप्पणियों के अनुपालन में अनुसूचित जाति के संदर्भ में आधिकारिक कार्यों में "दलित" शब्द का उपयोग नहीं किया जाए। सभी सरकारी पत्राचार, प्रमाण पत्र, अभिलेख और अन्य आधिकारिक दस्तावेज़ों में हिंदी में "अनुसूचित जाति" तथा अंग्रेज़ी में "Scheduled Caste" शब्दावली का ही प्रयोग सुनिश्चित किया जाए।
परिपत्र में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया है कि "दलित शब्द का बोलने व लिखने में इस्तेमाल नहीं किया जाए" और सभी पुलिस अधिकारियों को इसका पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है।
पिछले कुछ दिनों से यह परिपत्र सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर किया जा रहा है। कई पोस्टों में इसे ऐसी ऐतिहासिक घोषणा की तरह प्रस्तुत किया गया मानो "दलित" शब्द का प्रयोग पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया हो। हालांकि परिपत्र मुख्यतः सरकारी रिकॉर्ड और आधिकारिक दस्तावेज़ों की भाषा से संबंधित है।
फिर भी इस आदेश ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या किसी सरकारी परिपत्र से किसी समुदाय की ऐतिहासिक पहचान, उसके संघर्ष और सामाजिक चेतना से जुड़े शब्द को समाप्त किया जा सकता है?
2008 से इस विषय पर लगातार अध्ययन और वैचारिक हस्तक्षेप कर रहे दलित लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी से द मूकनायक ने इस विषय पर बातचीत की।
इस दौरान मेघवंशी ने कहा कि यह केवल एक शब्द का मामला नहीं, बल्कि इतिहास, स्मृति और प्रतिरोध की राजनीति से जुड़ा प्रश्न है। मेघवंशी कहते हैं, "‘हरिजन’, ‘अछूत’ जैसे जातिसूचक शब्द समाज ने हम पर थोपे थे, लेकिन ‘दलित’ वह पहचान है जिसे हमारे समुदाय ने स्वयं स्वीकार किया। ‘दलित’ शब्द ने हमें केवल एक जाति नहीं, बल्कि एक संगठित जमात और साझा संघर्ष की पहचान दी है। इसी शब्द ने हमारे इतिहास, प्रतिरोध और सामाजिक चेतना को स्वर दिया। आज इसी पहचान को मिटाकर हमें फिर से बिखरी हुई जातियों में बदलने की कोशिश की जा रही है। मैं ‘दलित’ शब्द की वैचारिक और ऐतिहासिक महत्ता को लेकर ऐसे प्रयासों का 2008 से लगातार प्रतिरोध करता आ रहा हूँ।’
सबसे पहले एक सीधा सवाल-'क्या भारत का संविधान शब्दकोश है?' क्या संविधान में 'महिला सशक्तिकरण' शब्द लिखा है? क्या 'बहुजन', 'आदिवासी', 'मजदूर', 'किसान', 'अल्पसंख्यक', 'सवर्ण', 'पिछड़ा', 'मध्यम वर्ग ', 'गरीब', 'श्रमिक , 'नारीवादी ' जैसे शब्द संविधान में मौजूद हैं? यदि नहीं,तो क्या ये सभी शब्द भी असंवैधानिक हैं? संविधान अधिकार देता है,शब्दों पर सेंसरशिप नहीं लगाता.संविधान नागरिकों की गरिमा की रक्षा करता है,उनकी भाषा का पुलिसिया नियमन नहीं करता।
मेघवंशी कहते हैं, "'दलित' कोई गाली नहीं है, यह किसी जाति का नाम भी नहीं है। यह किसी सरकारी सूची का प्रशासनिक शीर्षक भी नहीं है। यह एक ऐतिहासिक अनुभव का नाम है। दलित का अर्थ है-जिसका दलन हुआ हो.यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है,क्योंकि यह शब्द केवल पीड़ा नहीं बताता,बल्कि यह भी बताता है कि पीड़ा पैदा किसने की.यहीं से सत्ता और वर्चस्ववादी विचारधाराओं की बेचैनी शुरू होती है। डॉ. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने 'डिप्रेस्ड क्लासेज' शब्द का प्रयोग किया, भारतीय भाषाओं में उसका सबसे सशक्त रूप 'दलित' के रूप में विकसित हुआ। बाद में महाराष्ट्र के दलित पैंथर्स ने इस शब्द को विद्रोह की आवाज़ बना दिया। यह शब्द साहित्य में आया, पत्रकारिता में आया, राजनीति में आया, विश्वविद्यालयों में आया। फिर मान्यवर कांशी राम ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4) बनाई।यदि 'दलित' शब्द अपमानजनक था,तो क्या मान्यवर उसे अपने आंदोलन के नाम में रखते? यदि वह असंवैधानिक था,तो क्या दशकों तक सरकारें उसे सहन करती रहीं?"
मेघवंशी आगे कहते हैं, " हजारों वर्षों में इस समाज के लिए कितने नाम गढ़े गए-दास,दस्यु,अंत्यज,चांडाल,अस्पृश्य,अछूत,हरिजन,अनुसूचित जाति,दलित,बहुजन,मूलनिवासी..हर नाम के पीछे राजनीति थी। कुछ नाम अपमान देने के लिए थे, कुछ दया दिखाने के लिए तो कुछ प्रशासनिक सुविधा के लिए,लेकिन दलित पहली ऐसी पहचान बनी जिसे समुदाय ने स्वयं स्वीकार किया। यह आत्मसम्मान की पहचान थी,इसीलिए उसे मिटाने की कोशिश हो रही है।
दलित शब्द के पर्याय के तौर पर चलन में आये एक और शब्द के बारे में मेघवंशी कहते हैं, " यह भी दिलचस्प है कि कुछ वैचारिक समूह वर्षों से 'दलित' की जगह 'वंचित' शब्द पर ज़ोर देते रहे हैं। आखिर क्यों? क्योंकि "वंचित" बताता है कि कोई पीछे रह गया,लेकिन यह नहीं बताता कि पीछे किसने धकेला। जबकि दलित कहता है कि दलन हुआ है। दलन करने वाले भी थे। यही अपराधबोध इतिहास में दर्ज रहता है, शायद यही मिटाना चाहते हैं वे लोग जिन्हें इतिहास की नहीं,केवल सत्ता की चिंता है।"
राजस्थान में आज भी दलितों पर अत्याचार के हजारों मामले दर्ज होते हैं.आज भी सीवर में उतरकर सफाईकर्मी मरते हैं.आज भी मंदिर प्रवेश रोका जाता है.आज भी अंतरजातीय विवाह पर हत्याएँ होती हैं.आज भी सामाजिक बहिष्कार होता है.आज भी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमे दर्ज हो रहे हैं.तो क्या केवल 'दलित' शब्द हटा देने से यह सब समाप्त हो जाएगा? या सरकार केवल शब्द बदलकर समाज बदलने का भ्रम पैदा करना चाहती है?
एक्टिविस्ट सवाल करते हैं कि राजस्थान पुलिस का काम अपराध रोकना है या भाषा तय करना? क्या पुलिस यह भी तय करेगी कि लेखक कौन सा शब्द लिखे? पत्रकार कौन सा शब्द बोले?विश्वविद्यालय कौन सी शब्दावली पढ़ाए? क्या अगला परिपत्र यह होगा कि जातिवाद शब्द मत लिखिए? फिर तो मनुवाद भी हटाइए,ब्राह्मणवाद भी हटाइए,सामंतवाद भी हटाइए। इतिहास के सारे असुविधाजनक शब्द मिटा दीजिए। क्या इससे इतिहास बदल जाएगा ?
वे आगे कहते हैं कि 'अनुसूचित जाति' संविधान की प्रशासनिक श्रेणी है। वह आरक्षण,जनगणना और सरकारी योजनाओं की भाषा है,लेकिन 'दलित' सामाजिक चेतना, राजनीतिक संघर्ष और सांस्कृतिक अस्मिता का शब्द है.दोनों की भूमिका अलग है। सरकारी फाइल में 'अनुसूचित जाति' लिखा जा सकता है,लेकिन समाज किसी समुदाय को किस नाम से पुकारेगा,यह पुलिस मुख्यालय तय नहीं करेगा।
दलित चिन्तक मानते हैं यह पहली बार नहीं है,पहले भी 'दलित 'शब्द के खिलाफ सलाहें जारी हुईं। कुछ अदालतों ने टिप्पणियाँ कीं। कुछ सरकारों ने परिपत्र निकाले,लेकिन न दलित साहित्य रुका, न दलित आंदोलन रुका। न दलित पत्रकारिता रुकी.न दुनिया ने दलित स्टडीज पढ़ाना छोड़ा,क्योंकि इतिहास सरकारी फाइलों से बड़ा होता है। यदि 'दलित' शब्द असंवैधानिक है,तो फिर दलित साहित्य अकादमी क्यों है? दलित अध्ययन क्यों है? दलित पैंथर भारतीय इतिहास का हिस्सा क्यों हैं? दलित महिला आंदोलन क्यों है? दलित मानवाधिकार संगठनों का अस्तित्व क्यों है? मेघवंशी ने बताया कि वे इन दिनों 'दलित शब्द का वैचारिक इतिहास ' लिख रहे हैं,जो जल्दी लोगों के सामने आएगा।
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