
नागपुर- एससी/एसटी एक्ट के एक मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने घुग्घुस (जिला चंद्रपुर) के एक सरकारी कर्मचारी की अग्रिम जमानत की अपील खारिज कर दी है। जस्टिस वाई. जी. खोबरागडे ने 29 सितंबर को फैसले में यह आदेश दिया। मामला एक अनुसूचित जाति की विवाहित महिला के अश्लील वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर भेजने से जुड़ा है।
मामला आपराधिक अपील क्रमांक 127/2026 से जुड़ा है जिसमें आरोपी निखिल पुत्र मधुकर थेपले (28 वर्ष) हैं। वे सरकारी सेवा में है और घुग्घुस के वार्ड क्रमांक 3 में स्नेह प्रभा मंगल कार्यालय के पास रहता है। आरोपी की ओर से अधिवक्ता महेश राय, राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक जी. एस. उमाळे और पीड़िता की ओर से नियुक्त अधिवक्ता संकेत जोशी पेश हुए।
अभियोजन के अनुसार पीड़िता अनुसूचित जाति की विवाहित महिला है। आरोपी और पीड़िता एक ही इलाके में रहते हैं और एक-दूसरे को जानते हैं। आरोप है कि 4 नवंबर 2025 को आरोपी ने महिला से संपर्क कर शारीरिक संबंध की मांग की। महिला के इनकार करने पर उसने अपने मोबाइल से बनाया गया अश्लील वीडियो WhatsApp के जरिए महिला के पति और करीबी रिश्तेदारों को भेज दिया।
एफआईआर के अनुसार नग्न फोटो एक अज्ञात मोबाइल नंबर से महिला की ननद को भी भेजे गए। महिला की बहन को आरोपी के मोबाइल नंबर से कॉल और WhatsApp संदेश भी आया, जिसमें कहा गया कि वह महिला से बात करना चाहता है। एफआईआर में महिला ने अपने पति, ननद, सास और आरोपी के मोबाइल नंबर दर्ज कराए हैं।
इस पर 5 नवंबर 2025 को घुग्घुस थाने में अपराध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 77 और 78, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66(E) और 67, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(r), 3(1)(w)(ii) और 3(2)(va) आदि धाराओं में दर्ज हुआ।
आरोपी ने पहले निचली अदालत में अग्रिम जमानत मांगी, जो खारिज हो गई। इसके बाद उसने उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील क्रमांक 599/2025 दायर की। 9 फरवरी 2026 को उसने यह अपील इस छूट के साथ वापस ले ली कि आरोपपत्र दाखिल होने के बाद वह नया आवेदन दे सकेगा।
इसके बाद आरोपी ने अग्रिम जमानत आवेदन (ABA) क्रमांक 73/2026 दायर किया। 21 फरवरी 2026 को चंद्रपुर के विशेष न्यायाधीश (अत्याचार अधिनियम) एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने इसे भी खारिज कर दिया। इसी आदेश के खिलाफ आरोपी दूसरी बार उच्च न्यायालय पहुंचा था। उच्च न्यायालय ने 12 मार्च 2026 को अंतरिम राहत देते हुए कुछ शर्तों पर अस्थायी अग्रिम जमानत दी थी। आरोपी ने निचली अदालत में मुचलका और जमानती पेश किए। मामले में आरोपपत्र अब दाखिल हो चुका है।
अधिवक्ता राय ने कहा कि एफआईआर के अनुसार आरोपी ने यौन संबंध की मांग की थी और इनकार के बाद वीडियो-फोटो पति व रिश्तेदारों को भेजे। उनके मुताबिक केवल WhatsApp पर भेजने से एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r), 3(1)(w)(ii) और 3(2)(va) के अपराध नहीं बनते, इसलिए अधिनियम की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर रोक लागू नहीं होती। उन्होंने कहा कि निचली अदालत ने तथ्यों और कानून पर विचार किए बिना आदेश दिया, इसलिए उसे रद्द किया जाए।
राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक उमाळे और पीड़िता की ओर से अधिवक्ता जोशी ने अपील का कड़ा विरोध किया। अभियोजन ने कहा: एफआईआर दर्ज होने के दिन से आरोपी फरार है। आरोपी को पीड़िता की जाति की जानकारी थी। आपत्तिजनक वीडियो-फोटो आरोपी के मोबाइल में सुरक्षित हैं, पर वह मोबाइल अब तक जब्त नहीं हुआ है। मोबाइल की जब्ती और अन्य जानकारी जुटाने के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी है।
जस्टिस खोबरागडे ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि आरोपी पीड़िता की जाति से भली-भांति परिचित था। यह भी कहा कि आरोपी अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य नहीं है, जबकि पीड़िता अनुसूचित जाति की सदस्य है। आरोपी ने इस तथ्य से इनकार नहीं किया है।
अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि आरोपी ने महिला के नग्न वीडियो और फोटो बनाए और उसकी यौन इच्छा पूरी न होने पर उन्हें WhatsApp से प्रसारित किया।
आरोपी के फरार होने पर अदालत ने 'लवेश बनाम राज्य (दिल्ली एनसीटी)' (ALL MR (Cri.) 3300) का हवाला दिया और कहा कि सामान्यतः फरार या घोषित अपराधी को अग्रिम जमानत देने का प्रश्न ही नहीं उठता। अदालत की टिप्पणी रही: "इस मामले में आरोपी अपराध दर्ज होने की तारीख से ही फरार है; इसलिए मेरी राय में वह अग्रिम जमानत का हकदार नहीं है।"
'सार्वजनिक दृष्टि' के तर्क पर अदालत ने आरोपी के वकील की इस दलील को नहीं माना कि आरोपी ने पीड़िता को सार्वजनिक रूप से जाति सूचक अपमान नहीं किया। अदालत ने कहा:
"पीड़िता के आपत्तिजनक वीडियो/फोटो बनाकर उन्हें उसके पति, करीबी रिश्तेदारों और अन्य लोगों को WhatsApp जैसे सोशल मीडिया से भेजना निश्चित रूप से अत्याचार अधिनियम की धारा 3 के अर्थ में 'सार्वजनिक दृष्टि' (public view) के दायरे में आता है।"
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के 'किरण बनाम राजकुमार जीवराज जैन' (2025 AIR (SC) 4083) का हवाला दिया। इसके अनुसार एससी/एसटी एक्ट की धारा 18 इन अपराधों में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 439 के तहत अग्रिम जमानत पर रोक लगाती है। अदालत ने अपने ही अंतरिम आदेश पर कहा कि 12 मार्च 2026 को अंतरिम राहत इस आधार पर दी गई थी कि एफआईआर में अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं होते। लेकिन अब रिकॉर्ड पर आई सामग्री देखने पर:
"प्रथम दृष्टया धारा 3(1)(w)(ii) और 3(2)(va) के अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद प्रतीत होते हैं, क्योंकि पीड़िता के आपत्तिजनक वीडियो/फोटो आरोपी के मोबाइल से सोशल मीडिया पर प्रसारित किए गए, जो सार्वजनिक दृष्टि में है। इसलिए अधिनियम की धारा 18 के तहत आरोपी को अग्रिम जमानत देने पर रोक लगती है।"
निचली अदालत के आदेश पर कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने आरोपी के फरार होने के आधार पर अर्जी खारिज की थी। इससे प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है:
"आरोपी स्वयं गिरफ्तारी से बच रहा है और जांच अधिकारी को सबूत जुटाने में बाधा पहुंचा रहा है।"
मामले के विशिष्ट तथ्यों तथा 'लवेश' और 'किरण' के फैसलों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कहा कि निचली अदालत के निष्कर्षों में हस्तक्षेप का कोई ठोस आधार नहीं है। अदालत ने अपील खारिज कर दी। अपील खारिज होने से अंतरिम राहत समाप्त हो गई है। अभियोजन अब आरोपी का मोबाइल जब्त करने और हिरासत में पूछताछ की कार्यवाही कर सकेगा।
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