
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों के संचालन और पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि थानों में लगे सीसीटीवी सिस्टम साल के 365 दिन और 24 घंटे पूरी तरह से चालू रहने चाहिए। इसके साथ ही, कोर्ट ने उन परिस्थितियों के लिए नई गाइडलाइंस या एसओपी (SOP) तय की है, जब थाने में कैमरे काम न कर रहे हों।
नए दिशानिर्देशों के अनुसार, यदि किसी थाने का सीसीटीवी सिस्टम खराब होता है, तो एसएचओ (SHO) को तुरंत जनरल डायरी (जीडी) में इसके बंद होने का सटीक समय दर्ज करना होगा। इसके अलावा, यह लिखित में बताना होगा कि खराबी की सूचना किस अधिकारी को दी गई है। सिस्टम को जल्द से जल्द ठीक कराने के लिए उठाए गए कदमों और डाउनटाइम को कम करने की जानकारी जिले के एसपी (SP) को अनिवार्य रूप से देनी होगी।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि कैमरे बंद रहने की अवधि के दौरान थाने में पूछताछ या गिरफ्तारी के लिए लाए गए किसी भी व्यक्ति का पूरा विवरण जीडी में दर्ज किया जाना चाहिए। इस दौरान किसी भी संदिग्ध के आने और जाने का समय भी लिखा जाएगा। रिहाई की स्थिति में उस व्यक्ति या उसके परिजनों से एक हस्ताक्षर युक्त रसीद भी अनिवार्य रूप से लेनी होगी।
यह अहम आदेश जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने राघवेंद्र दुबे और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं चार अन्य के मामले में सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उसे पश्चिम बंगाल के आसनसोल से बालू खनन समझौते के एक विवाद में अवैध रूप से उठाकर चित्रकूट जिले के सरधुवा थाने लाया गया था। इसके उलट, राज्य सरकार की दलील थी कि एफआईआर दर्ज होने के बाद गैर-जमानती वारंट के आधार पर यह गिरफ्तारी की गई है।
मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस की कार्यप्रणाली की बड़ी खामियां उजागर हुईं। सीसीटीवी फुटेज से पता चला कि याचिकाकर्ता 13 जुलाई को सुबह 9 बजे थाने में दाखिल हुआ था। वह सुबह 10:19 बजे जांच अधिकारी के साथ शिकायतकर्ता की ही गाड़ी में बाहर गया और रात 8:24 बजे वापस लौटा। हालांकि, पुलिस के अरेस्ट मेमो में उसकी गिरफ्तारी का समय दोपहर 3:30 बजे और जीडी में लॉक-अप एंट्री शाम 6:41 बजे दिखाई गई थी। इसके अलावा, थाने के अंदर के तीन कैमरों की फुटेज या तो गायब थी या उसे डिलीट कर दिया गया था।
अदालत ने थानों के परिसरों में सीसीटीवी कैमरों से छेड़छाड़ करने की पुलिस की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की। गिरफ्तारी मेमो को बेहद त्रुटिपूर्ण मानते हुए, जिस पर केवल पुलिसकर्मियों के ही गवाह के तौर पर हस्ताक्षर थे, पीठ ने याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को रिहा करने का आदेश देते हुए 24 घंटे की अवैध हिरासत के लिए 10,000 रुपये का मुआवजा भी तय किया है। पूरी घटना पर कड़ी टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि इस मामले के तथ्य प्रथम दृष्टया यह साफ बताते हैं कि पुलिसकर्मियों ने शिकायतकर्ता के पक्ष में 'रिकवरी एजेंट' के रूप में काम किया है।
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