
उत्तर प्रदेश: कानपुर स्थित छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) के स्कूल ऑफ टीचर एजुकेशन विभाग से एक बेहद शर्मनाक और अमानवीय मामला सामने आया है। यहां एमएड की एक होनहार अनुसूचित जाति (एससी) की छात्रा को सुनियोजित तरीके से जातिगत भेदभाव और गंभीर मानसिक प्रताड़ना का शिकार बनाने का आरोप लगाया गया है।
विभाग की वर्तमान विभागाध्यक्ष (एचओडी) डॉ. तनुजा भट्ट और अन्य शिक्षकों पर आरोप है कि उन्होंने छात्रा को मानसिक रूप से इतना प्रताड़ित किया कि वह अब गंभीर अवसाद से जूझ रही है। पीड़ित छात्रा को न्याय दिलाने के लिए उसके परिवार ने यूजीसी, आईजीआरएस और महिला आयोग से लेकर अनुसूचित जाति आयोग तक गुहार लगाई है।
पीड़िता के भाई ने द मूकनायक को उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों और फोन पर हुई बातचीत में बताया कि उनकी बहन को जानबूझकर परीक्षाओं में कम अंक दिए गए ताकि वह प्रथम श्रेणी न प्राप्त कर सके। यूजीसी पोर्टल पर दर्ज शिकायत के अनुसार, छात्रा को 6.50 सीजीपीए की जगह 6.49 सीजीपीए पर रोक दिया गया।
आरोप है कि एचओडी ने उसे सबके सामने "गोबर पाथने वाली गँवार" और "रहोगे चार गज जमीन के नीचे ही" जैसे गंभीर जातिसूचक और अपमानजनक ताने मारे। पीड़िता के भाई के मुताबिक एक बार भरी क्लास में छात्रा पर "चमारिन" शब्द का प्रयोग कर भद्दी टिप्पणी भी की गई।
प्रताड़ना का यह सिलसिला केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं रहा बल्कि आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप में भी उसे सरेआम जलील किया गया। द मूकनायक को प्राप्त वॉयस रिकॉर्डिंग्स में विभागाध्यक्ष यह कहती सुनाई दे रही हैं कि छात्रा को नर्सरी में एडमिशन लेना चाहिए जहां नाम बताना सिखाया जाता है।
एक अन्य संदेश में धमकी भरे लहजे में कहा गया कि तीसरे सेमेस्टर में लौटकर आने पर उसे सबक सिखाया जाएगा। भाई का आरोप है कि प्रवेश परीक्षा के समय से ही एचओडी ने उसकी बहन को निशाना बनाना शुरू कर दिया था और अन्य शिक्षकों ने भी पूरी कक्षा के सामने उसे सबसे कमजोर और बेकार छात्रा साबित करने की कोशिश की।
इस भयावह माहौल ने छात्रा की मानसिक स्थिति को बुरी तरह झकझोर दिया है। पीड़िता के भाई ने बताया कि उनकी बहन रातों में डर कर चीखने लगती है और तनाव के कारण कई बार बेहोश भी हो चुकी है। उसकी बिगड़ती हालत को देखते हुए उसे हॉस्टल से निकाल कर घर ले जाना पड़ा और एक मेडिकल कॉलेज में उसका इलाज कराया गया। परिवार के पास ऑडियो और व्हाट्सएप चैट के पुख्ता सबूत मौजूद हैं, फिर भी उन्हें न्याय के लिए भटकना पड़ रहा है।
न्याय की गुहार लगाते हुए छात्रा ने 18 जुलाई 2026 को यूजीसी ई-समाधान पोर्टल पर अपनी पहली शिकायत दर्ज कराई थी। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने पूरे मामले की लीपापोती कर दी। विश्वविद्यालय द्वारा जारी प्रतिवेदन रिपोर्ट में दावा किया गया कि आंतरिक जांच समिति ने आरोपों को निराधार पाया है।
रिपोर्ट में यह दलील दी गई कि सेमेस्टर परीक्षाओं में नाम व पहचान गुप्त रहती है इसलिए पक्षपात संभव नहीं है, और छात्रा को डॉ. भट्ट के विषय में अच्छे अंक मिले हैं। हालांकि, पीड़िता के भाई का कहना है कि यह जांच पूरी तरह एकतरफा थी, छात्रों पर दबाव बनाया गया और सबूतों को दरकिनार कर मामले को रफा-दफा कर दिया गया।
विश्वविद्यालय स्तर पर लगातार निराशा हाथ लगने के बाद पीड़ित परिवार ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) का दरवाजा खटखटाया। आयोग ने इस गंभीर मामले का संज्ञान लेते हुए 1 अक्टूबर 2026 को कानपुर नगर के पुलिस आयुक्त और सीएसजेएमयू के कुलसचिव को कड़ा नोटिस जारी किया है।
आयोग ने 15 दिनों के भीतर इस मामले में दर्ज एफआईआर, गिरफ्तारियों और की गई पूरी कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। आयोग ने चेतावनी दी है कि यदि समय सीमा में संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो वह सिविल न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग करते हुए अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से तलब करेगा।
दूसरी तरफ, इस पूरे मामले पर विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष जानने के लिए द मूकनायक ने इन उक्त घटना पर विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर और रजिस्टार के आधिकारिक इमेल आईडी पर सवालों को पूछते हुए जवाब मांगा है. जैसे ही विश्वविद्यालय प्रशासन का जवाब मिलता है, उसे इस खबर में शामिल कर लिया जाएगा.
नोट- इस रिपोर्ट में पीड़िता के परिजन के आग्रह के कारण उनकी व पीड़िता की व्यक्तिगत सभी पहचान गुप्त रखी गयी है.
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