
चेन्नई- मद्रास हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में जिला स्तरीय सतर्कता समिति, तिरुवन्नामलाई का वह आदेश रद्द कर दिया है, जिसमें सीमा शुल्क विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का "हिंदू आदि द्रविड़" समुदाय प्रमाणपत्र यह कहकर अवैध घोषित किया गया था कि वे और उनके परिजन गोरे, लंबे-चौड़े हैं, घुंघराले बाल वाले हैं और तमिल के साथ अंग्रेज़ी भी बोलते हैं। जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती ने 11 सितंबर को यह आदेश सुनाया। कोर्ट ने मामले को नए सिरे से विचार के लिए समिति को लौटा दिया है। "आदि द्रविड़"दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु में रहने वाला एक प्रमुख समुदाय है जिसे अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा प्राप्त है।
याचिकाकर्ता एम. रविकुमार चेन्नई स्थित सीमा शुल्क आयुक्त (चेन्नई जनरल आयुक्तालय) कार्यालय में सहायक आयुक्त के पद पर कार्यरत थे और 30 मई 2026 को सेवानिवृत्त होने वाले थे। उनकी सेवानिवृत्ति से ठीक पहले उनके सामुदायिक प्रमाणपत्र की वैधता की जांच शुरू हुई। 4 मई को जिला स्तरीय सतर्कता समिति ने आदेश (R.C.No.K4/112/2026) पारित कर प्रमाणपत्र को असली नहीं माना।
कोर्ट के आदेश में दर्ज तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता के पिता मूलतः हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय से थे और 1960 में उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था। याचिकाकर्ता का जन्म 1966 में ईसाई परिवार में हुआ। वर्ष 1983 में पिता और पुत्र दोनों ने हिंदू धर्म में वापसी का निर्णय लिया। याचिकाकर्ता के अनुसार, उन्हें चेन्नई के आर्य समाज केंद्र में ले जाकर पुनः धर्मांतरण की विधि संपन्न कराई गई। इसके बाद पिता का नाम आर. अय्यावु जेम्स से बदलकर आर. मुनुसामी और पुत्र का नाम ए. सुंदरराजन से बदलकर एम. रविकुमार हो गया।
10 दिसंबर 1986 को उन्हें सामुदायिक प्रमाणपत्र जारी हुआ, जिसमें साफ लिखा था कि वे मूलतः हिंदू आदि द्रविड़ हैं, ईसाई बने, फिर हिंदू धर्म में लौटे और अब आदि द्रविड़ समुदाय से हैं। इसी प्रमाणपत्र के आधार पर उन्हें केंद्र सरकार की नौकरी मिली।
याचिकाकर्ता के अनुसार, जांच के दौरान उन्होंने हरसंभव दस्तावेज़ पेश किए। उनका कहना था कि वे और उनकी पत्नी हिंदू हैं, बच्चों का पालन-पोषण हिंदू रीति से हुआ है, वे केवल हिंदू देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, और उनका तथा उनकी बेटी का विवाह हिंदू रीति-रिवाजों से हुआ। बताया गया कि नृवंश-विज्ञानी (Anthropologist) ने उनके घर जाकर पूजा कक्ष भी देखा। उन्होंने विवाह, मुंडन और कर्णवेध संस्कार की तस्वीरें भी दीं। बेटी का दूल्हा भी हिंदू है।
इसके बावजूद समिति ने रंग-रूप, कद-काठी, भाषा और बालों की बनावट जैसे आधारों पर प्रमाणपत्र को अवैध ठहराया।
याचिकाकर्ता के वकील मणिकंद प्रभु जे ने कोर्ट में कई तर्क रखे:
पिता को ईसाई कब्रिस्तान में दफनाए जाने का आरोप याचिकाकर्ता के विरुद्ध नहीं गिना जा सकता। पिता की देखभाल छोटे भाई ए. सेल्वराजन करते थे, जो ईसाई धर्म में ही रहे, और चेन्नई में नौकरी करते हुए याचिकाकर्ता का इस पर कोई नियंत्रण नहीं था।
वैकल्पिक रूप से, पिता भी पुनः धर्मांतरण के बाद वास्तव में हिंदू धर्म का पालन नहीं कर रहे थे, तो भी इसका दोष याचिकाकर्ता पर नहीं डाला जा सकता।
1994 के राशन कार्ड में बेटी का नाम ईसाई दर्शाए जाने का निष्कर्ष बेतुका है, क्योंकि याचिकाकर्ता का विवाह ही 1994 में हुआ था।
नृवंश-विज्ञानी बोलचाल और हाव-भाव पर कुछ हद तक विचार कर सकता है, लेकिन रंग, कद और बालों के आधार पर किसी को ईसाई ठहराना विशेषज्ञ राय नहीं कही जा सकती।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के के.पी. मनु बनाम अध्यक्ष, समुदाय प्रमाणपत्र सत्यापन जांच समिति [(2015) 4 SCC 1] फैसले का हवाला दिया, जिसमें दादा और पिता ईसाई थे, फिर भी पड़पोते के हिंदू धर्म अपनाने और उसका पालन करने पर उसका दावा स्वीकार किया गया था।
राज्य सरकार की ओर से विशेष सरकारी अधिवक्ता इंदु करुणाकरण ने कहा कि नौकरी और आरक्षण के लिए याचिकाकर्ता और परिवार भले हिंदू होने का दावा करते हों, अभिलेख बताते हैं कि वे अब भी ईसाई धर्म का पालन करते प्रतीत होते हैं। उन्होंने कहा कि शारीरिक बनावट सहित समग्र व्यक्तित्व का आकलन किया जा सकता है। आदेश के अनुसार, समिति ने यह भी पाया था कि याचिकाकर्ता चेन्नई और बेंगलुरु में रहे, उनकी मां आदि द्रविड़ बस्ती से बाहर रहती हैं, और समुदाय के लोगों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार समुदाय की स्वीकृति भी आवश्यक है।
केंद्र सरकार के वरिष्ठ पैनल अधिवक्ता के. श्रीनिवास मूर्ति ने चौथे प्रतिवादी की ओर से कहा कि पिता के हिंदू बनने का दावा है, फिर भी 1986 के प्रमाणपत्र सहित बाद के स्कूल रिकॉर्ड में उनका नाम आर. अय्यावु जेम्स ही दर्ज है, न कि आर. मुनुसामी। चर्च के पत्र में भी दोनों को मूल नामों से संबोधित किया गया है। उनके अनुसार यह वास्तविक पुनः धर्मांतरण का मामला प्रतीत नहीं होता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता के अनुसूचित जाति से संबंध पर कोई विवाद नहीं है। विवाद केवल इस पर है कि ईसाई धर्म अपनाने के बाद हिंदू धर्म में उनकी वापसी वास्तविक है या नहीं।
कोर्ट ने के.पी. मनु फैसले के अनुच्छेद 16 को उद्धृत किया, जिसमें गुंटूर मेडिकल कॉलेज बनाम वाई. मोहन राव [(1976) 3 SCC 411] का संदर्भ है:
"यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में परिवर्तित हुए हों, वह धर्मांतरण के बाद जन्मा हो, हिंदू धर्म अपनाए और जाति के सदस्य उसे स्वीकार कर लें, तो वह उस जाति के दायरे में आ जाता है।"
इसके आधार पर कोर्ट ने कहा कि पुनः धर्मांतरण होने और जाति के सदस्यों द्वारा स्वीकार किए जाने पर याचिकाकर्ता प्रमाणपत्र का हकदार है।
समिति के निष्कर्षों पर कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां:
"जिला स्तरीय सतर्कता समिति ने मुद्दे पर विचार तो किया, लेकिन उसके निष्कर्ष स्पष्ट और सुनिश्चित नहीं हैं।"
पिता को ईसाई कब्रिस्तान में दफनाए जाने के बारे में कोर्ट ने कहा, "यह तथ्य कि याचिकाकर्ता के पिता को ईसाई कब्रिस्तान में दफनाया गया, प्रासंगिक हो सकता है।"
1994 के राशन कार्ड संबंधी निष्कर्ष पर कोर्ट का मानना था कि "'1994 के राशन कार्ड में उसकी बेटी का नाम ईसाई था', यह निष्कर्ष किसी साक्ष्य से समर्थित नहीं है।"
कोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ता का विवाह 15.09.2024 नहीं बल्कि 15.09.1994 को हुआ और पहली बेटी का जन्म 10.11.1998 को, इसलिए यह निष्कर्ष टिकाऊ प्रतीत नहीं होता।
समुदाय द्वारा स्वीकार्यता के बिंदु पर: "समुदाय के लोगों द्वारा स्वीकार किए जाने या न किए जाने से संबंधित निष्कर्ष बहुत प्रासंगिक होगा, किंतु वह भी किसी ठोस कारण या तथ्य से समर्थित नहीं है।"
और सबसे अहम टिप्पणी, रंग-रूप वाले आधार पर कोर्ट ने कहा:
"याचिकाकर्ता कौन-से देवताओं को मानता है या ईसाई धर्म को, यह प्रासंगिक होगा, किंतु यह तर्क कि वह और उसका परिवार बहुत गोरे हैं, लंबे हैं, अच्छी कद-काठी वाले हैं, तमिल और अंग्रेज़ी बोलते हैं और घुंघराले बाल रखते हैं, का कोई प्रासंगिकता नहीं हो सकती।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि ये कारण जिस तरह आदेश में दर्ज किए गए, वह किसी नृवंश-विज्ञानी के मूल्यांकन के संदर्भ में भी नहीं थे। निष्कर्षतः कुछ कारण प्रासंगिक हैं लेकिन विस्तृत तर्कों से समर्थित नहीं, जबकि कुछ स्वीकार्य ही नहीं हैं।
कोर्ट ने अपने आदेश में ये निर्देश दिए:
04.05.2026 का आदेश रद्द किया जाता है।
जिला स्तरीय सतर्कता समिति याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर देगी।
आदेश की वेब-कॉपी प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता समिति के समक्ष उपस्थित होकर तस्वीरों सहित सभी दस्तावेज़ प्रस्तुत करेगा, जिनसे सिद्ध हो कि वह हिंदू धर्म का पालन करता है।
याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए भी साक्ष्य दे सकेगा कि पुनः धर्मांतरण के बाद समुदाय ने उसे स्वीकार किया है।
समिति चाहे तो कोई अन्य साक्ष्य भी मांग सकती है।
याचिकाकर्ता की उपस्थिति के आठ सप्ताह के भीतर समिति कानून के अनुसार नया आदेश पारित करेगी।
अब मामला फिर जिला स्तरीय सतर्कता समिति के पास है, जिसे याचिकाकर्ता की निष्ठा और समुदाय द्वारा स्वीकार्यता, दोनों पहलुओं की ठोस साक्ष्यों के आधार पर जांच कर तर्कसंगत आदेश देना होगा।
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