
भारत के बाहर किसी संसद में पहली बार पेरियार ई. वी. रामासामी के योगदान को औपचारिक रूप से याद किया गया है। ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स (NSW) विधान परिषद ने एक प्रस्ताव पारित कर सामाजिक न्याय और समानता के लिए उनके काम को सराहा। प्रस्ताव में पेरियार अंबेडकर थॉट्स सर्कल ऑफ ऑस्ट्रेलिया (PATCA) को हाशिए के समुदायों के लिए उसके काम पर बधाई भी दी गई। प्रस्ताव किसी आपत्ति के बिना पारित हो गया।
यह प्रस्ताव ग्रीन्स पार्टी की सदस्य केट फेहरमैन ने सदन में रखा। भारत के बाहर किसी संसद से मिली यह पहली औपचारिक मान्यता है।
संसदीय रिकॉर्ड (Hansard) के मुताबिक केट फेहरमैन ने 13 अक्टूबर को प्रस्ताव पेश किया। प्रस्ताव की शुरुआत 20 सितंबर को पैरामाटा पार्क में हुई PATCA की पहली "इक्वालिटी वॉक" के जिक्र से होती है। यह वॉक पेरियार की 148वीं जयंती पर आयोजित की गई थी। प्रस्ताव के अनुसार इसमें अलग-अलग समुदायों और पृष्ठभूमि के लोग शामिल हुए, जो पेरियार के आत्म-सम्मान आंदोलन और जाति-विरोधी विचारों से खुद को जोड़ते हैं।
प्रस्ताव में दर्ज है कि 1925 में केरल के वायकोम सत्याग्रह में हिस्सा लेने के बाद, जो जाति के आधार पर बहिष्कार के खिलाफ था, पेरियार ने आत्म-सम्मान आंदोलन शुरू किया। इसका मकसद जातिगत ऊँच-नीच को चुनौती देना और सामाजिक समानता व गरिमा को बढ़ावा देना था। प्रस्ताव कहता है कि पेरियार के विचार वर्ग, नस्ल और लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव के संगम पर खड़े हैं। उनका मानना था कि हर इंसान बराबर पैदा होता है और समाज ने पहचान के नाम पर जो बंदिशें लगाई हैं, उनके बिना जीने का हक सबको है।
आंदोलन के दायरे पर प्रस्ताव में कहा गया है कि यह मुख्य रूप से तमिल भाषी इलाकों में सक्रिय रहा, लेकिन विविध हिंदू आबादी वाले कई समुदायों में भी इसके बड़ी संख्या में अनुयायी बने, जहाँ ऊँच-नीच को लेकर तनाव है।
शिक्षा के मोर्चे पर प्रस्ताव में लिखा है कि पेरियार के नेतृत्व में हुए शिक्षा सुधार की भूमिका 1951 के भारत के पहले संविधान संशोधन में रही। इस संशोधन से अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया, जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समुदायों के लिए शिक्षा में आरक्षण का रास्ता खोलता है।
प्रस्ताव में पेरियार की उन शिक्षाओं का भी जिक्र है जिनमें बच्चों की परवरिश में पुरुषों को बराबर का जिम्मेदार माना गया। उन्होंने प्रजनन अधिकारों और महिलाओं की स्वायत्तता का समर्थन किया और इन्हें आत्म-सम्मान हासिल करने की बुनियादी शर्त माना।
ऑस्ट्रेलिया में जातिगत भेदभाव पर प्रस्ताव कहता है कि PATCA ने इसकी हकीकत को मान्यता दिलाने के लिए आवाज उठाई, जिसके बाद 2022 में ऑस्ट्रेलियाई मानवाधिकार आयोग ने इसे नस्लवाद का एक रूप माना। 2024 में आयोग ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ कानूनी सुरक्षा की जाँच को अपने राष्ट्रीय नस्लवाद-विरोधी ढाँचे (National Anti-Racism Framework) में शामिल किया।
अंत में सदन ने PATCA को बधाई दी और आत्म-निर्णय, समानता और सम्मान के मूल्यों को स्वीकार किया।
देविबाला पलानीवेल ने द मूकनायक को बताया कि PATCA का ग्रीन्स पार्टी के साथ लंबे समय से रिश्ता रहा है। उन्होंने कहा, "ग्रीन्स ऑस्ट्रेलिया की पहली राजनीतिक पार्टी थी जिसने जाति को मान्यता दी, और इस मुद्दे पर उसने सक्रिय रूप से साथ दिया है।"
केट फेहरमैन के पास ग्रीन्स का बहुसांस्कृतिक विभाग है, इसलिए संगठन को उन्हें बुलाना ठीक लगा। देविबाला ने PATCA अध्यक्ष के तौर पर उन्हें वॉक का उद्घाटन करने का न्योता दिया।
प्रस्ताव लाने की वजह बताते हुए देविबाला ने कहा कि न्योता स्वीकार करने के बाद केट ने अपना भाषण तैयार करने के लिए पेरियार के बारे में पढ़ा और उनके काम व आत्म-सम्मान आंदोलन से प्रभावित हुईं। वॉक के दौरान उन्होंने बताया कि वे तमिल समुदाय के लिए पेरियार के योगदान को मान्यता देने वाला प्रस्ताव लाना चाहती हैं। देविबाला के मुताबिक प्रस्ताव के शब्द पूरी तरह केट के अपने थे, सिर्फ भारतीय संविधान के पहले संशोधन वाला हिस्सा PATCA की ओर से था।
सदन या समुदाय की ओर से किसी विरोध या हिचक के सवाल पर उनका जवाब था, "नहीं। कोई विरोध या हिचकिचाहट नहीं थी, और प्रस्ताव बिना विरोध के पारित हुआ।" देविबाला कहती हैं यह उपलब्धि उनके लिए निजी भी है, यह सिर्फ किसी संगठन या कार्यक्रम को मिली मान्यता नहीं है। उनका कहना है कि इससे पेरियार के विचार और विरासत एक अंतरराष्ट्रीय संसदीय संस्था तक पहुँचे हैं और समानता व सामाजिक न्याय की लड़ाई में उनकी आज भी प्रासंगिकता साबित हुई है।
अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा, "मैं एक जाति-उत्पीड़ित महिला हूँ और भारत के एक ग्रामीण इलाके में पली-बढ़ी हूँ। यहाँ तक पहुँचने में बड़ी भूमिका पेरियार के विचारों और द्रविड़ आंदोलन के योगदान की रही है।" उनके मुताबिक उनका अपना सफर और PATCA अध्यक्ष के रूप में उनका काम दिखाता है कि ये विचार जमी हुई सामाजिक ऊँच-नीच को चुनौती देने और हाशिए के लोगों के लिए मौके बनाने की ताकत रखते हैं।
देविबाला के लिए इस बात के भी खास मायने हैं कि प्रस्ताव एक महिला सांसद ने रखा। उन्होंने कहा कि जिन विचारों ने उनकी जिंदगी की दिशा तय की, उन्हें दुनिया के दूसरे छोर की एक संसद में मान्यता मिलते देखना उनके लिए बेहद भावुक क्षण है।
आगे की योजना पर देविबाला ने कहा कि PATCA का अगला लक्ष्य पेरियार के विचारों को भारतीय प्रवासी समुदाय की रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बनाना है। संगठन उनके विचारों के सहारे ऑस्ट्रेलिया में बसे प्रवासियों को सशक्त करना चाहता है और उन्हें जिन तरह के उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है, उनसे निपटना चाहता है। इनमें जातिगत भेदभाव से लेकर रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी जगहों की बाधाएँ शामिल हैं।
देविबाला ने कहा कि PATCA को इस उपलब्धि में भूमिका निभाने पर गर्व है। उनका मानना है कि इस मान्यता पर और ध्यान जाना चाहिए, खासकर वैश्विक जाति-विरोधी आंदोलन से जुड़े लोगों और उन लोगों के बीच जो पेरियार और अंबेडकर के विचारों को भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं के पार ले जाना चाहते हैं।
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