ऐतिहासिक फैसला: नेपाल सरकार बहिष्कृत समुदायों के सदियों के अन्याय पर मांगेगी माफी!

सामाजिक न्याय का बड़ा कदम, दलित समुदायों को न्याय और समानता के साथ-साथ आर्थिक-सामाजिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त होगा।
यह कदम नेपाल के इतिहास में पहली बार है जब राज्य ने दलित समुदायों के प्रति औपचारिक माफी का ऐलान किया है।
यह कदम नेपाल के इतिहास में पहली बार है जब राज्य ने दलित समुदायों के प्रति औपचारिक माफी का ऐलान किया है।
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नेपाल सरकार ने दलित तथा ऐतिहासिक रूप से बहिष्कृत समुदायों के प्रति औपचारिक माफी मांगने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। मंत्रिपरिषद की बैठक में 100 सूत्रीय शासकीय सुधार एजेंडा को मंजूरी देते हुए सरकार ने राज्य, समाज और नीतिगत संरचनाओं द्वारा इन समुदायों पर सदियों से किए गए अन्याय, विभेद और अवसर वंचना को औपचारिक रूप से स्वीकार किया है।

इस फैसले के तहत राज्य की ओर से 15 दिनों के अंदर औपचारिक क्षमायाचना जारी की जाएगी और सामाजिक न्याय, समावेशी पुनर्स्थापना तथा ऐतिहासिक मेलमिलाप के आधार पर विशेष सुधार कार्यक्रमों की घोषणा की जाएगी। प्रधानमंत्री बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार ने इस कदम को शासन सुधार की प्राथमिकता दी है, जिससे दलित समुदायों को न्याय और समानता के साथ-साथ आर्थिक-सामाजिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त होगा। आपको बता दें युवा नेता बालेन शाह दो दिन पूर्व नए प्रधानमंत्री चुने गए हैं। उनके प्रधानमंत्री बनने की खबर से नेपाल के साथ-साथ बिहार के ग्रामीण इलाकों में भी खुशी की लहर दौड़ गई क्योंकि उनका ननिहाल सीतामढ़ी जिले में स्थित है।

यह कदम नेपाल के इतिहास में पहली बार है जब राज्य ने दलित समुदायों के प्रति औपचारिक माफी का ऐलान किया है।
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बालेन शाह का उदय जनरेशन जेड (Gen Z) के नेतृत्व वाले उस विद्रोह के बाद हुआ है, जिसके कारण केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली पिछली सरकार गिर गई थी। भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और विवादास्पद सोशल मीडिया प्रतिबंध को लेकर जनता के गुस्से से शुरू हुए ये विरोध प्रदर्शन व्यापक प्रदर्शनों में तब्दील हो गए, जिसके परिणामस्वरूप अंततः राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव करना पड़ा।

नेपाल में दलित समुदायों पर अतीत में गंभीर भेदभाव का इतिहास रहा है। पारंपरिक हिंदू जाति व्यवस्था और1854 के मुलुकी ऐन के तहत दलितों को अछूत माना जाता था, जिसके कारण उन्हें पानी के स्रोत, मंदिर, शिक्षा, नौकरियां और सामाजिक रिश्तों से वंचित रखा गया। 1963 में अछूत प्रथा को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया गया था और संविधान में समानता के प्रावधान हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से दलित समुदाय लगभग 13% प्रतिशत आबादी आज भी संसद में सिर्फ 5.8 प्रतिशत प्रतिनिधित्व, रोजगार में भेदभाव, हिंसा और सामाजिक बहिष्कार का शिकार होते रहे हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल और अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की रिपोर्ट्स में इन व्यवस्थागत असमानताओं का जिक्र किया गया है।

इस फैसले के तहत राज्य की ओर से 15 दिनों के अंदर औपचारिक क्षमायाचना जारी की जाएगी और सामाजिक न्याय, समावेशी पुनर्स्थापना तथा ऐतिहासिक मेलमिलाप के आधार पर विशेष सुधार कार्यक्रमों की घोषणा की जाएगी।

सरकार के इस फैसले का दलित समुदाय के नेता, एक्टिविस्ट्स, विभिन्न संगठनों ने स्वागत किया है। उन्होंने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया है और मांग की है कि घोषित सुधार कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।

यह कदम नेपाल के इतिहास में पहली बार है जब राज्य ने दलित समुदायों के प्रति औपचारिक माफी का ऐलान किया है। इससे न केवल ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने का आधार बनेगा बल्कि समावेशी विकास और राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिलेगी। सरकार ने 15 दिनों की समयसीमा तय की है, जिसके बाद विस्तृत कार्यक्रम सार्वजनिक किए जाएंगे।

यह कदम नेपाल के इतिहास में पहली बार है जब राज्य ने दलित समुदायों के प्रति औपचारिक माफी का ऐलान किया है।
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