
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 'समान कार्य के लिए समान वेतन' (Equal Pay for Equal Work) के सिद्धांत पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए केरल के सरकारी सहायता प्राप्त उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों (Aided Higher Secondary Schools) के सीधी भर्ती वाले कनिष्ठ शिक्षकों (HSST Jr.) की याचिकाएं खारिज कर दी हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि केवल काम और जिम्मेदारियां एक जैसी होने के आधार पर दो अलग-अलग वर्गों के शिक्षकों को एक समान वेतनमान का हकदार नहीं माना जा सकता, यदि उनके अनुभव और भर्ती के स्रोत में अंतर हो।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने केरल उच्च न्यायालय के डिवीजन बेंच के वर्ष 2011 के फैसले को बरकरार रखते हुए यह निर्णय दिया (2026 INSC 1004)।
केरल में 13 मई 1998 के सरकारी आदेश के तहत एचएसएसटी जूनियर शिक्षकों की सीधी भर्ती हुई थी। इन शिक्षकों ने अदालत में दावा किया था कि पदोन्नति या स्थानांतरण के जरिए आए शिक्षकों और उनके काम, योग्यता तथा जिम्मेदारियों में कोई अंतर नहीं है, इसलिए वेतन में भी भेदभाव नहीं होना चाहिए। वर्ष 2009 में केरल हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने उनके पक्ष में फैसला दिया था, लेकिन 2011 में डिवीजन बेंच ने इसे पलट दिया। डिवीजन बेंच का तर्क था कि पदोन्नत होकर आए शिक्षक पहले से ही निचले स्कूलों में लंबी सेवा दे चुके हैं और उन्हें दिया जा रहा पूर्णकालिक वेतनमान उनके पूर्व के 'स्टेटस' और वरिष्ठता को बनाए रखने के लिए है, जबकि सीधी भर्ती वाले शिक्षक 'फ्रेशर्स' हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के इस तर्क को पूरी तरह से सही ठहराते हुए अपने फैसले में कई अहम टिप्पणियां कीं:
कोर्ट ने कहा समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत को यांत्रिक तरीके (mechanical application) से लागू करने से बचना चाहिए। यह कानून नहीं है कि इस सिद्धांत को कभी लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे लागू करने के लिए कई कारकों पर विचार करना आवश्यक है।" अदालत ने माना, "यदि सभी कारकों में पूर्ण समानता है और समान मूल्य के समान कार्य के लिए समान वेतन का दावा किया जाता है, तभी रिट अदालत हस्तक्षेप कर सकती है और उचित राहत दे सकती है; अन्यथा नहीं।" कोर्ट ने यह माना कि "इस मामले में, सीधी भर्ती वाले एचएसएसटी जूनियर शिक्षकों की तुलना में स्थानांतरित/पदोन्नत एचएसएसटी जूनियर शिक्षकों का अनुभव एक वैध और तर्कसंगत अंतर (valid and intelligible differentia) प्रदान करता है, जिसका हासिल किए जाने वाले उद्देश्य से सीधा संबंध है, जो उन्हें उच्च वेतन देने को उचित ठहराता है। चूंकि दोनों समूहों के शिक्षक बतौर शिक्षक सेवा देने के अनुभव के मामले में समानता का दावा नहीं कर सकते, इसलिए वेतनमान में अंतर करने के लिए यह (अनुभव) एक वैध मापदंड है।"
पीठ ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि 'समान काम, समान वेतन' के सिद्धांत की न्यायिक व्याख्या में पिछली सदी की तुलना में बड़ा बदलाव आया है। बीसवीं सदी में 'रणधीर सिंह बनाम भारत संघ' जैसे फैसलों के आधार पर केवल पदनाम (जैसे- शिक्षक के साथ शिक्षक, या क्लर्क के साथ क्लर्क) समान होने पर समानता का दावा मान लिया जाता था। लेकिन 21वीं सदी में 'स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम एम.आर. गणेश बाबू' और 'बिहार माध्यमिक शिक्षक संघर्ष समिति' जैसे मामलों के बाद से इस सिद्धांत को सेवा नियमों के आधार पर एक सख्त परीक्षण में बदल दिया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अब केवल कार्यात्मक समानता (Functional similarity) दिखाना पर्याप्त नहीं है; कर्मचारी को भर्ती के स्रोत, शैक्षणिक योग्यता, अनुभव और जिम्मेदारियों की प्रकृति में भी पूर्ण समानता साबित करनी होगी।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से कलकत्ता उच्च न्यायालय के 'अनिरबान घोष' मामले का भी हवाला दिया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कलकत्ता हाईकोर्ट का वह फैसला सर्वोच्च अदालत की पूर्व की बाध्यकारी मिसालों पर विचार किए बिना दिया गया था, इसलिए उसे 'पर इनक्यूरियम' यानि असावधानी से दिया गया फैसला माना जाएगा।
इन विस्तृत अवलोकनों के साथ शीर्ष अदालत ने तय किया कि राज्य सरकार द्वारा अनुभवी और पदोन्नत शिक्षकों को नए सीधी भर्ती वाले शिक्षकों की तुलना में बेहतर वेतनमान देना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन नहीं है। पीठ ने हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले में दखल देने से इनकार करते हुए शिक्षकों की सभी अपीलों को अंतिम रूप से खारिज कर दिया।
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