
पटना- "मैंने अब तक आदर्श केन्द्रीय कारा, बेऊर के जैसा व्यापक भ्रष्टाचार कहीं भी नहीं देखा और ना ही इतने भ्रष्ट व गैर जिम्मेदार अधिकारियों को ही देखा है। यहाँ पग-पग पर भ्रष्टाचार जिस कारण पैसे वाले बंदियों व दबंगों के लिए यह जेल स्वर्ग के समान है, लेकिन आम बंदियों के लिए यह जेल नरक से भी बदतर है।"
ये कड़वे शब्द हैं वरिष्ठ पत्रकार रूपेश कुमार सिंह के, जो खुद बेऊर जेल के उच्च सुरक्षा कक्ष में विचाराधीन बंदी हैं। अपनी 'जेल डायरी' 'कैदखाने का आईना' के अनुभवों के आधार पर उन्होंने पटना जिलाधिकारी को एक विस्तृत पत्र लिखा है, जिसमें जेल प्रशासन के 12 गंभीर मुद्दों का जिक्र है। यह पत्र न केवल रूपेश की व्यक्तिगत पीड़ा का दस्तावेज है, बल्कि बेऊर जेल के हजारों बंदियों की साझा आवाज बन चुका है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और बिहार गृह मंत्री सम्राट चौधरी को प्रति भेजे गए इस पत्र ने जेल सुधार की बहस को नई गति दी है।
रूपेश की पत्नी इप्सा शताक्षी ने द मूकनायक को बताया कि रूपेश इन दिनों ट्राइग्लिसराइड्स, हाई कॉलेस्ट्रॉल, साइनस, स्लीप डिस्क जैसे कई स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हैं लेकिन कोर्ट आर्डर के बावजूद भी आदर्श केन्द्रीय कारा बेऊर ने अभी तक न इन्हें पटना के किसी अस्पताल में दिखाया है, न कोई जांच कराई है और न ही इनकी जांच जेल के अंदर ही करवाई है।
रूपेश ने जेल की परेशानी, मनमर्जी , भ्रष्टाचार को उजागर करते हुए एक आवेदन पटना के जिलाधिकारी को दिसंबर में भी लिखा था। लेकिन अभी तक जेल प्रशासन के खिलाफ इस मामले को लेकर कोई कदम उठाया गया है या नहीं यह अभी पता नहीं चला है।
रूपेश सिंह जो भागलपुर के धरौनी गांव के निवासी हैं, 17 अप्रैल 2023 से बेऊर जेल में बंद हैं। पत्रकारिता में सत्य और न्याय के लिए आवाज उठाने का खामियाजा भुगतते हुए उन्हें झूठे आरोपों पर 22 जनवरी 2024 को भागलपुर जेल स्थानांतरित कर दिया गया। छह महीने की सजा के बावजूद वे 20 महीने बाद, 23 सितंबर 2025 को ही वापस लाए गए। वापसी के दूसरे दिन ही उन्हें गोल घर-02 के डिग्री नंबर 29 में ठूंस दिया गया, जहां 87 बंदी एक ही नल से नहाने को मजबूर हैं। बिहार-झारखंड की छह जेलों के अनुभव के बाद सिंह का कहना है कि बेऊर जेल का भ्रष्टाचार बाकी सबको मात देता है, जहां अधिकारियों की मिलीभगत से पैसे वाले बंदी हर सुविधा हासिल कर लेते हैं।
15 जनवरी को लिखे पत्र में सबसे पहले डाइट-चार्ट के घोर उल्लंघन का मुद्दा उठाया गया है। कारा हस्तक के अनुसार सोमवार, बुधवार और गुरुवार को सुबह 10 रुपये का मौसमी फल, सोमवार को रात में 200 ग्राम दूध, गुरुवार को खीर, रविवार को सेवई-भुजिया और शनिवार को अंडा करी मिलनी चाहिए। लेकिन ये सुविधाएं महीने में मुश्किल से 2-3 दिन ही नसीब होती हैं। 70 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग बंदियों को दैनिक 500 ग्राम दूध और फल का प्रावधान है, जो पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है। इसी तरह, नहाने-सफाई के लिए साबुन, तेल, टूथपेस्ट और ब्रश जैसी बुनियादी चीजें भी उपलब्ध नहीं होतीं, जो बंदियों के स्वास्थ्य को खतरे में डाल रही हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं की लचर स्थिति पर सिंह ने तीखा प्रहार किया है। जेल अस्पताल में न्यूनतम सुविधाओं के अभाव में गंभीर रोगियों को बाहर के अस्पताल भेजने के लिए कोर्ट का आदेश लाना पड़ता है। डॉक्टर खुद मिनट्स नहीं बनाते, जिससे कई बंदियों की बीमारियां असाध्य हो जाती हैं। भ्रष्टाचार का एक और चेहरा है दबंग बंदियों द्वारा निजी मेस का संचालन। दर्जनों वार्डों में ये मेस 5-10 हजार रुपये मासिक वसूलकर जेल गोदाम से चोरी के सामान पर लजीज व्यंजन परोसते हैं। अधिकारियों की आंखें बंद रहती हैं, जबकि नशे का कारोबार भी खुलेआम फल-फूल रहा है--गांजा, सिगरेट और खैनी 10-20 गुना ऊंची कीमत पर बिकते हैं।
मुलाकाती के लिए जब बंदियों के परिजन ऑनलाईन रजिस्ट्रेशन करते हैं, तो उन्हें समय से कन्फर्मेशन (ओटीपी) नहीं भेजा जाता है। ऐसी स्थिति में भी परिजन मुलाकात के लिए पहुंच जाते हैं तो मुलाकाती पर्ची करने वाले काउंटर पर ओटीपी नहीं होने के कारण मुलाकाती पर्ची काटने से मना कर दिया जाता है, लेकिन जैसे ही कुछ पैसा वहाँ मौजूद दलाल को दिया जाता है, तुरंत ही ओटीपी भी आ जाता है और मुलाकाती पर्ची भी कर जाता है।
जेल के तीन STD बूथों में से एक हमेशा खराब है और बाकी दो भी अक्सर बंद रहते हैं, जिससे मोबाइल नंबर सत्यापन में 3-6 महीने लग जाते हैं। पत्राचार की सुविधा तो जैसे सपना है, बंदी न तो परिजनों, वकीलों या केस पार्टनर्स से पत्र लिख पाते हैं। शिक्षा के मामले में भी उदासीनता बरती जा रही है; IGNOU स्टडी सेंटर में स्नातकोत्तर कोर्स की कमी बिहार की राजधानी की जेल के लिए कलंक है।
उच्च सुरक्षा कक्ष गोल घर-02 की दशा तो दिल दहला देने वाली है। यहां वेंटीलेटर एक महीने पहले बंद कर दिए गए हैं, खिड़कियां नहीं हैं और टीवी-रेडियो की कोई व्यवस्था नहीं। 87 बंदी लैट्रिन शीट पर ही नहाने को विवश हैं। जेल प्रशासन ने दबंग बंदियों की 'लाठी कमान' गठित कर दी है, जो अन्य बंदियों पर लाठियां बरसाते हैं और भय का माहौल बनाए रखते हैं। सबसे डरावना है झूठे आरोपों पर प्रशासनिक सजा-आवाज उठाने वालों को वर्षों तक दूर की जेलों में रखा जाता है, और स्थानांतरण के दौरान बर्बर पिटाई होती है। जांच के दौरान भी पारदर्शिता का घोर अभाव है; अधिकारी केवल चुने हुए बंदियों से मिलते हैं और अन्य वार्डों को ताला लगा दिया जाता है। सिंह ने 10 दिसंबर 2025 के मानवाधिकार दिवस का जिक्र किया, जब केवल 200 बंदियों को कार्यक्रम में शामिल किया गया।
रूपेश सिंह ने इन गंभीर मुद्दों पर जिलाधिकारी से तत्काल जांच की मांग की है और कहा है कि वे व्यक्तिगत मुलाकात में भ्रष्टाचार का पूरा ब्योरा दे सकते हैं। यह पत्र जेल सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम है, जो बिहार सरकार और मानवाधिकार संगठनों को कार्रवाई के लिए मजबूर कर सकता है।
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