नई दिल्ली: दशकों की लंबी राजनीतिक और सामाजिक बहस के बाद, आखिरकार 2027 की जनगणना में जातियों की गिनती की जाएगी। इस ऐतिहासिक कदम के लिए तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। दूसरे चरण की जनगणना के लिए रिहर्सल या प्री-टेस्ट का काम 6 जुलाई 2026 से 16 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शुरू हो गया है।
इस प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, उत्तरदाताओं को अपनी जाति दर्ज करने के लिए फॉर्म में एक 'ओपन कॉलम' दिया गया है। यह प्री-टेस्ट 20 जुलाई 2026 तक चलेगा। इसके नतीजे ही यह तय करेंगे कि स्वतंत्र भारत में पहली बार जनगणना के तहत जातियों की आधिकारिक गिनती किस तरह से की जाएगी।
आजाद भारत के इतिहास में अब तक केवल अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) की ही गिनती होती रही है। देश में आखिरी बार सभी जातियों की व्यापक स्तर पर गणना ब्रिटिश काल के दौरान साल 1931 में की गई थी।
लंबे समय तक जातिगत गणना का विरोध करने के बाद, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने 30 अप्रैल 2025 को अंततः घोषणा की थी कि 2027 की जनगणना में जातियों को गिना जाएगा। इससे पहले विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी, और बीजेपी के कुछ सहयोगी दल लगातार इसकी मांग कर रहे थे।
साल 2011 में हुई सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (एसईसीसी) को जनगणना के आधिकारिक दायरे से बाहर रखा गया था। लेकिन इस बार, जाति की गिनती जनगणना के दूसरे और अंतिम चरण के साथ होगी, जिससे इसे वैधानिक मान्यता मिलेगी। बता दें कि 2011 के एसईसीसी डेटा में 46 लाख जातियों के नाम सामने आए थे।
वर्तमान प्री-टेस्ट से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले समय में जातियों की गिनती किस प्रकार की जाएगी। अधिकारियों का कहना है कि 20 जुलाई को यह रिहर्सल खत्म होने के बाद मिले फीडबैक के आधार पर ही अंतिम कार्यप्रणाली तैयार की जाएगी। इस रिहर्सल में लोगों को खुद से अपनी जानकारी भरने (सेल्फ-एन्यूमरेशन) की सुविधा भी दी गई थी। इसके लिए पोर्टल 1 से 5 जुलाई तक केवल उन विशेष क्षेत्रों में चालू था, जहां यह प्री-टेस्ट किया जा रहा है।
जाति की गिनती के तरीके को लेकर मुख्य तौर पर दो विकल्प चर्चा में रहे हैं। पहला विकल्प 2011 के एसईसीसी की तरह एक 'ओपन कॉलम' छोड़ने का है। वहीं दूसरा विकल्प बिहार सरकार के 2022-23 के जाति आधारित सर्वेक्षण की तरह जातियों की एक तय सूची तैयार करने का है। गौरतलब है कि 2011 के एसईसीसी के नतीजे न तो कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने जारी किए थे और न ही 2014 में सत्ता में आई बीजेपी सरकार ने।
ओपन कॉलम तरीके के कारण ही 2011 में 46 लाख से ज्यादा 'जाति नाम' दर्ज हो गए थे, क्योंकि लोग जाति को अलग-अलग तरीके से समझते हैं। उदाहरण के लिए, कई लोगों ने अपनी जाति बनिया लिखने के बजाय गुप्ता या अग्रवाल लिख दिया, जिससे जातियों की संख्या अचानक बहुत बढ़ गई। मौजूदा प्री-टेस्ट में भी लोगों को अपनी जाति दर्ज करने के लिए इसी तरह का ओपन-एंडेड कॉलम दिया जा रहा है।
इसकी तुलना में 1931 में अंग्रेजों द्वारा कराई गई जनगणना में कुल जातियों की संख्या केवल 4,147 थी। इसी खामी का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने 2021 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था। सरकार का कहना था कि अगर कुछ जातियों को उप-जातियों में बांटा भी जाए, तो भी कुल संख्या इतनी ज्यादा नहीं हो सकती। इसलिए इस डेटा पर शिक्षा, रोजगार या चुनाव में आरक्षण के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता।
नवीनतम सरकारी आंकड़ों की बात करें तो वर्तमान में केंद्रीय सूची में लगभग 2,650 अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), 1,170 अनुसूचित जाति (एससी) और 890 अनुसूचित जनजाति (एसटी) शामिल हैं। राज्य सरकारें अपनी ओबीसी सूची अलग से भी बनाए रखती हैं।
विपक्षी दलों की मांग है कि इस जनगणना को शुरू करने से पहले सभी संबंधित पक्षों से व्यापक चर्चा की जाए। 2 दिसंबर 2025 को राहुल गांधी ने लोकसभा में पूछा था कि क्या सरकार प्रश्नावली के ड्राफ्ट को सार्वजनिक करने और आम लोगों से सुझाव मांगने पर विचार कर रही है। उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या अन्य राज्यों के जातिगत सर्वेक्षणों जैसी बेहतरीन कार्यप्रणालियों को अपनाया जाएगा।
इस पर गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने स्पष्ट किया था कि प्रश्नावली को अंतिम रूप देने से पहले फील्ड में इसकी व्यावहारिकता परखने के लिए प्री-टेस्ट किया जाता है। उन्होंने कहा कि जनगणना का 150 साल से अधिक का इतिहास है और हर जनगणना से पहले हितधारकों की राय ली जाती है। सरकार ने फरवरी 2026 में संसद को बताया था कि जाति से जुड़े सवाल जनगणना के दूसरे चरण की शुरुआत से पहले अधिसूचित किए जाएंगे।
जनसंख्या जनगणना का काम दो चरणों में होता है- पहला मकान सूचीकरण (एचएलओ) और दूसरा जनसंख्या की गिनती। मूल रूप से 2021 में होने वाली यह प्रक्रिया मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी के कारण टल गई थी। इसका पहला चरण 1 अप्रैल 2020 से शुरू होना था। महामारी से जुड़ी पाबंदियां 2022 तक खत्म हो गई थीं, लेकिन सरकार ने इसे अब तक टाले रखने का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया।
इसके बाद 4 जून 2025 को सरकार ने घोषणा की कि 28 फरवरी 2027 तक दो चरणों में जातियों की गिनती के साथ जनसंख्या जनगणना पूरी की जाएगी। लोगों की गिनती के लिए 1 मार्च 2027 की रात 12 बजे को संदर्भ तिथि (रेफरेंस डेट) माना जाएगा।
जनगणना का पहला चरण अभी हिमाचल प्रदेश, केरल, नागालैंड, तमिलनाडु, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, असम और मणिपुर में पूरा होना बाकी है। देश के बाकी 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पूरा हो चुका यह पहला चरण पूरे देश में 30 सितंबर तक खत्म होना है।
जनगणना का दूसरा चरण, जिसमें जातियों की गिनती होगी, पूरे देश में फरवरी 2027 में आयोजित किया जाएगा। हालांकि लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बर्फबारी वाले इलाकों में इसे 30 सितंबर तक पूरा कर लिया जाएगा।
बता दें कि 2011 की जनगणना के दूसरे चरण में जनसांख्यिकी, वैवाहिक स्थिति, साक्षरता, आर्थिक स्थिति और प्रवासन जैसे मापदंडों पर 29 सवाल पूछे गए थे। देश में जनगणना करवाना अनिवार्य है। जनगणना अधिनियम, 1948 का पालन न करने पर 1,000 रुपये का जुर्माना और छह महीने की कैद का प्रावधान है।
2027 की जनगणना के लिए लगभग 24 लाख गणना ब्लॉक (ईबी) बनाए गए हैं। एक ईबी में आमतौर पर 150-180 घर या 650-800 लोग शामिल होते हैं। इस विशाल काम के लिए ज्यादातर स्कूली शिक्षकों सहित लगभग 30 लाख सरकारी कर्मचारियों को लगाया गया है।
2027 की यह जनगणना कई मायनों में बेहद खास होगी। यह देश की पहली डिजिटल जनगणना होगी, इसमें पहली बार जनसंख्या जनगणना के तहत जातियों की गिनती होगी और पहली बार लोगों को खुद अपना डेटा ऑनलाइन भरने का विकल्प भी मिलेगा।
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