इलाहाबाद हाईकोर्ट: SC/ST मामलों में स्वतः FIR दर्ज कराने का आदेश देने को कोर्ट बाध्य नहीं!

हाईकोर्ट ने कहा कि "कोर्ट को पहले आरोपों का मूल्यांकन करना होगा और फिर यह तय करना होगा कि पुलिस जांच का निर्देश देना उचित है या शिकायत के रूप में कार्यवाही की जाए।”
यह फैसला एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमों के मामलों में महत्वपूर्ण है.
यह फैसला एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमों के मामलों में महत्वपूर्ण है.
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इलाहाबाद- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय से संबंधित पीड़ित द्वारा सेक्शन 173(4) भारतीया नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत दायर आवेदन पर विशेष न्यायालय या मजिस्ट्रेट को स्वतः FIR दर्ज करने का आदेश देना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यह शक्ति न्यायिक विवेक पर आधारित है और आवेदन में लगाए गए आरोपों की जांच के बाद ही फैसला लिया जाना चाहिए।

यह फैसला जस्टिस अनिल कुमार-X द्वारा 9 मार्च को क्रिमिनल अपील संख्या 2318 ऑफ 2026 कुसुम कन्नौजिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य में दिया गया। अपील में आजमगढ़ के विशेष न्यायाधीश, एससी/एसटी एक्ट द्वारा 19 जनवरी को पारित आदेश को चुनौती दी गई थी।

यह फैसला एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमों के मामलों में महत्वपूर्ण है.
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मामला क्या है?

अपीलकर्ता कुसुम कन्नौजिया ने सेक्शन 173(4) BNSS के तहत आवेदन दायर कर पुलिस को एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध की FIR दर्ज करने और जांच करने का निर्देश देने की मांग की थी। यह मामला थाना बरदह, जिला आजमगढ़ से जुड़ा था। विशेष न्यायालय ने आवेदन में लगाए गए आरोपों की जांच की और आवेदन खारिज कर दिया।

अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि विशेष न्यायालय को जांच करने का अधिकार नहीं है और उसे सीधे FIR दर्ज करने का आदेश देना चाहिए। इसके लिए उन्होंने आशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (न्यूट्रल साइटेशन 2025:AHC-LKO:785) के फैसले का हवाला दिया।

राज्य की ओर से अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट में कोर्ट के विवेक पर कोई रोक नहीं है।

कोर्ट ने ये दो मुख्य सवाल तय किए:

  1. क्या विशेष न्यायालय/मजिस्ट्रेट को एससी/एसटी समुदाय के पीड़ित के सेक्शन 173(4) BNSS आवेदन पर हर बार FIR दर्ज करने का आदेश देना अनिवार्य है?

  2. क्या एससी/एसटी एक्ट की धारा 4 और नियम 5 कोर्ट के इस विवेक को सीमित करते हैं?

कोर्ट ने धारा 4, धारा 18-ए और नियम 5 का विश्लेषण करते हुए कहा:

“धारा 4, धारा 18-ए और नियम 5 मुख्य रूप से पुलिस अधिकारियों और लोक सेवकों के कर्तव्यों को नियंत्रित करने के लिए हैं, ताकि एससी/एसटी मामलों में FIR दर्ज करने और जांच में लापरवाही न हो। ये प्रावधान न्यायालय के न्यायिक विवेक को सेक्शन 173(4) BNSS के तहत आवेदन पर विचार करते समय सीमित नहीं करते।”

कोर्ट ने आगे कहा: “सेक्शन 173(4) BNSS के तहत शक्ति विवेकाधीन है। कोर्ट को आवेदन में लगाए गए आरोपों पर न्यायिक मन लगाकर विचार करना होगा। यदि तत्काल पुलिस जांच की आवश्यकता नहीं है, तो आवेदन को शिकायत के रूप में मानकर आगे की कार्यवाही की जा सकती है।”

“विशेष न्यायालय या मजिस्ट्रेट को यह अनिवार्य नहीं है कि वह हर मामले में केवल इसलिए FIR दर्ज करने का आदेश दे दे क्योंकि आवेदक अनुसूचित जाति या जनजाति से है। कोर्ट को पहले आरोपों का मूल्यांकन करना होगा और फिर यह तय करना होगा कि पुलिस जांच का निर्देश देना उचित है या शिकायत के रूप में कार्यवाही की जाए।”
इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया:

  • प्रियंका श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2015): मजिस्ट्रेट को FIR का आदेश यांत्रिक रूप से नहीं देना चाहिए।

  • हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2020): एससी/एसटी मामलों में भी कोर्ट को यह देखना होगा कि आरोप पीड़ित की जाति से जुड़े हैं या नहीं।

अंतिम फैसला कोर्ट ने विशेष न्यायाधीश द्वारा की गई जांच और आवेदन खारिज करने के आदेश को सही ठहराया और अपील को खारिज कर दिया।

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