
उदयपुर- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर जहां एक ओर महिला सशक्तिकरण के कार्यक्रमों का दौर था, वहीं उदयपुर में एक गोष्ठी ने समाज की उस मानसिकता पर सवाल उठाया जो आज भी महिलाओं को 'पुत्रवती भव' का आशीर्वाद देती है। सवाल उठा कि आखिर 'पुत्रीवती भव' क्यों नहीं कहा जाता?
अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति और भारतीय ट्रेड यूनियन केंद्र (सीटू) के संयुक्त तत्वावधान में माछला मंगरा स्थित शिराली भवन में आयोजित विचार गोष्ठी में यह मुद्दा जोर-शोर से उठा। "समाज में महिलाओं के बराबरी का स्थान और मौजूदा चुनौतियां" विषय पर हुई इस गोष्ठी में वक्ताओं ने महिलाओं की मौजूदा स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए व्यवस्था परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया।
गोष्ठी को संबोधित करते हुए वरिष्ठ लेखिका और साहित्यकार डॉ. कुसुम मेघवाल ने समाज की विडंबना पर गहरा प्रहार किया। उन्होंने कहा, "आज समाज में दावा किया जाता है कि महिलाएं हर क्षेत्र में आगे हैं, लेकिन आज भी बड़े-बुजुर्ग महिलाओं को 'पुत्रवती भव' का ही आशीर्वाद क्यों देते हैं? यह सोच दर्शाती है कि हम अभी भी बेटे की चाहत वाले समाज में जी रहे हैं।" डॉ. मेघवाल ने स्पष्ट किया कि महिलाओं की गुलामी की जड़ें पूंजीवाद और सामंतवाद में हैं और इन्हें खत्म किए बिना सच्ची आजादी और बराबरी संभव नहीं।
सीटू के जिलाध्यक्ष एवं पूर्व पार्षद राजेश सिंघवी ने एक चौंकाने वाला अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया, "मैंने 50 महिलाओं की एक सभा में सवाल किया कि क्या वे अगला जन्म फिर से महिला बनकर लेना चाहेंगी? एक भी महिला ने हामी नहीं भरी। यह एक तरफा जवाब समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति का सबसे बड़ा सबूत है।" उन्होंने कहा कि महिलाओं के पक्ष में कई कानून बने हैं, लेकिन उनके सही क्रियान्वयन के बिना न्याय और समानता की कल्पना अधूरी है।
सहायक व्याख्याता जया कुंपावत ने कहा कि महिला को सिर्फ 'माँ' के रूप में ही महिमामंडित कर दिया गया है कि वह अपनी अलग पहचान और स्वतंत्र जीवन जीना ही भूल गई है। उन्होंने कहा, "नारी को खुद के भीतर की गुलामी की जंजीरों को तोड़ना होगा। महिलाएं अभी तो थोड़ा-थोड़ा अपने हिस्से का जीना सीख रही हैं, तो समाज इससे इतना घबरा क्यों रहा है?"
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहीं पूर्व पार्षद गणपति देवी सालवी ने बेहद मार्मिक अपील की। उन्होंने कहा, "हमें देवी का दर्जा नहीं चाहिए, हमें तो बस इंसान समझकर बराबरी का दर्जा दे दीजिए।" उन्होंने महिलाओं के अथक परिश्रम को रेखांकित करते हुए कहा कि वे रोजाना 14 से 18 घंटे काम करने के बावजूद 'कुछ न करने' के ताने सुनती हैं।
गोष्ठी में डॉ. सीमा जैन ने महिला की स्वतंत्र पहचान पर सवाल उठाते हुए कहा कि जन्म से मृत्यु तक उसकी पहचान किसी न किसी पुरुष से जुड़ी रहती है। उन्होंने पूछा, "क्या महिला सिर्फ बेटी, पत्नी, मां या बहन ही है?"
घरेलू कामगार महिला संघ की अध्यक्ष रेखा भटनागर ने कहा कि दुनिया की सबसे बड़ी ठगी महिलाओं के श्रम के साथ हुई है। वहीं, मोना अग्रवाल ने कहा कि भले ही कहा जाए कि महिलाएं आजाद हैं, लेकिन वास्तविकता में उन्हें पुरुषों के बराबर अधिकार नहीं मिले हैं। बसंती वैष्णव ने भी कानूनी अधिकारों और व्यवहारिक स्थिति में अंतर पर चिंता जताई।
महिला समिति की अध्यक्ष साबिरा अतारी ने कहा कि एक सभ्य और समतावादी समाज के निर्माण के लिए पुरुषों में भी चेतना पैदा करनी होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि महिलाओं की यह लड़ाई पुरुषों के खिलाफ नहीं, बल्कि एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए है।
गोष्ठी में राजस्थान मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव यूनियन के सचिव बृजेश चौधरी ने कहा कि दुनिया में अमन और शांति कायम करनी है तो सत्ता और शक्ति महिलाओं के हाथों में सौंपनी होगी। पूर्व पार्षद राजेंद्र वसीटा ने कहा कि समाज में धन के लाभ वाले काम पुरुषों और अलाभ के काम महिलाओं से जोड़ दिए गए हैं।
गोष्ठी के अंत में सभी वक्ताओं और उपस्थित जनों ने महिलाओं के लिए एक बेहतर, समतावादी और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में नरेंद्र रावल, शमशेर खान, लाली सालवी, भगवती देवी सहित कई गणमान्य नागरिक और बड़ी संख्या में महिलाएं उपस्थित रहीं।
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