
कोलकाता- अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर पश्चिम बंगाल आदिवासी विकास और महिला सशक्तिकरण के नाम पर सियासी रंगीन हो गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की उत्तर बंगाल यात्रा, जो आदिवासी समुदाय के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन का हिस्सा थी, अचानक राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गई।
राष्ट्रपति ने राज्य सरकार पर प्रोटोकॉल का उल्लंघन और आदिवासी कल्याण में लापरवाही का आरोप लगाते हुए सीएम ममता बनर्जी पर निशाना साधा, तो ममता ने पलटवार करते हुए बीजेपी पर राष्ट्रपति के पद का दुरुपयोग करने का इल्जाम लगाया। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति को करारा जवाब देते हुए कहा: "अगर आप साल में एक बार आते हैं तो मैं आपका स्वागत कर सकती हूं, लेकिन अगर आप चुनाव के दौरान आते हैं तो मेरे लिए यह संभव नहीं होगा..."
इस बीच, बीजेपी और पीएम नरेंद्र मोदी ने टीएमसी सरकार को 'अपमानजनक' बताते हुए निशाना बनाया, जबकि विपक्ष ने मणिपुर में महिलाओं पर अत्याचारों पर राष्ट्रपति की 'चुप्पी' को उजागर किया। आइए, इस पूरे घटनाक्रम की गहराई से पड़ताल करें।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जो खुद एक आदिवासी पृष्ठभूमि से आती हैं, 7 मार्च को उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग और सिलिगुड़ी पहुंचीं। उनकी यात्रा का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन को संबोधित करना था, जो संथाल आदिवासी समुदाय के सांस्कृतिक और विकासात्मक मुद्दों पर केंद्रित था। सम्मेलन महिला दिवस से ठीक पहले आयोजित हुआ, और राष्ट्रपति ने अपने भाषण में महिलाओं को 'राष्ट्र की नींव' बताते हुए उनके सशक्तिकरण पर जोर दिया। उन्होंने कहा, "महिलाएं हमारी संस्कृति की रीढ़ हैं। उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा का अधिकार मिलना चाहिए।" लेकिन भाषण का असली टर्निंग पॉइंट तब आया जब उन्होंने राज्य सरकार की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए। सम्मेलन के आयोजन स्थल को लेकर मुर्मू ने असंतोष जाहिर किया। राष्ट्रपति ने खुलेआम नाराजगी जताई:
"आज अंतर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन था। इसमें भाग लेने के बाद जब मैं यहाँ आई, तो मुझे एहसास हुआ कि अगर यह सम्मेलन यहीं आयोजित होता तो बेहतर होता, क्योंकि यह इलाका बहुत विशाल है... मुझे नहीं पता प्रशासन के मन में क्या चल रहा था... उन्होंने कहा कि नहीं, यह जगह भीड़भाड़ वाली है। लेकिन मुझे लगता है कि यहाँ आसानी से पाँच लाख लोग इकट्ठा हो सकते थे। लेकिन मुझे नहीं पता कि वे हमें वहाँ क्यों ले गए... मुझे नहीं पता प्रशासन के मन में क्या चल रहा था कि उन्होंने सम्मेलन के लिए ऐसी जगह चुनी जहाँ संथाल लोग नहीं जा सकते... मुझे बहुत दुख है कि यहाँ के लोग सम्मेलन में नहीं पहुँच पाए क्योंकि यह इतनी दूर आयोजित किया गया था। शायद प्रशासन को उम्मीद थी कि कोई भी उपस्थित नहीं हो पाएगा, और प्रेसिडेंट बस मुड़कर चली जाएँगी... यदि राष्ट्रपति किसी स्थान पर जाती हैं, तो मुख्यमंत्री और मंत्रियों को भी आना चाहिए। लेकिन वह नहीं आईं... मैं भी बंगाल की बेटी हूँ... ममता भी मेरी बहन हैं, मेरी छोटी बहन। मुझे नहीं पता कि वह मुझसे नाराज़ थीं, इसलिए ऐसा हुआ..."
यह यात्रा राष्ट्रपति की पहली बड़ी सार्वजनिक यात्रा थी जिसमें उन्होंने प्रोटोकॉल लैप्स का सीधा जिक्र किया। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने भी इसे 'अनुचित' बताते हुए कहा, "राष्ट्रपति के पद की पवित्रता बरकरार रखनी चाहिए।" सम्मेलन में सैकड़ों आदिवासी महिलाओं ने भाग लिया, और राष्ट्रपति ने उन्हें प्रोत्साहित करते हुए कहा कि 'आदिवासी बेटियां राष्ट्र की शान हैं'। लेकिन यह भाषण जल्द ही सियासी रंग लेने लगा।
विवाद बढ़ते ही पीएम नरेंद्र मोदी ने इसे 'शर्मनाक और अभूतपूर्व' बताया। मोदी ने कहा, " लोकतंत्र और आदिवासी समुदायों के सशक्तिकरण में विश्वास रखने वाला हर व्यक्ति निराश है। स्वयं आदिवासी समुदाय से आने वाली राष्ट्रपति जी द्वारा व्यक्त की गई पीड़ा और दुख ने भारत की जनता के मन में गहरा दुख पहुंचाया है। पश्चिम बंगाल की टीएमसी सरकार ने सारी हदें पार कर दी हैं। राष्ट्रपति के इस अपमान के लिए उनका प्रशासन जिम्मेदार है। यह भी उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि पश्चिम बंगाल सरकार संथाल संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण विषय को इतनी लापरवाही से ले रही है। राष्ट्रपति का पद राजनीति से ऊपर है और इस पद की गरिमा का हमेशा सम्मान किया जाना चाहिए। आशा है कि पश्चिम बंगाल सरकार और टीएमसी में सुधरने की भावना जागृत होगी।"
राष्ट्रपति के भाषण के कुछ घंटों बाद ही सीएम ममता बनर्जी ने जवाब दिया। ममता ने साफ़ किया कि, " एक निजी संगठन, इंटरनेशनल संथाल काउंसिल ने सिलीगुड़ी में आयोजित 9वें अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी संथाल सम्मेलन में राष्ट्रपति को आमंत्रित किया था। सुरक्षा समन्वय के बाद, जिला प्रशासन ने राष्ट्रपति सचिवालय को लिखित रूप में सूचित किया कि आयोजकों की तैयारियां अपर्याप्त प्रतीत हो रही हैं; यह चिंता टेलीफोन पर भी व्यक्त की गई थी। राष्ट्रपति सचिवालय की अग्रिम टीम ने 5 मार्च को दौरा किया और उन्हें व्यवस्थाओं की कमी से अवगत कराया गया, फिर भी कार्यक्रम निर्धारित समय पर जारी रहा। राष्ट्रपति सचिवालय द्वारा साझा की गई अनुमोदित सूची के अनुसार, सिलीगुड़ी नगर निगम के मेयर, दार्जिलिंग के डीएम और सिलीगुड़ी पुलिस आयुक्त कार्यालय के सीपी ने राष्ट्रपति का स्वागत और विदाई की। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सूची या मंच योजना का हिस्सा नहीं थे। जिला प्रशासन की ओर से किसी भी प्रोटोकॉल का उल्लंघन नहीं हुआ। भाजपा अपने निजी एजेंडे के लिए देश के सर्वोच्च पद का अपमान और दुरुपयोग कर रही है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।"
उन्होंने आगे कहा, "राष्ट्रपति का पद देश का सबसे ऊंचा पद है, लेकिन बीजेपी इसे सियासत के लिए इस्तेमाल कर रही है। वे बंगाल को बदनाम करने के लिए राष्ट्रपति को आगे कर रहे हैं।" ममता ने वेन्यू को 'तकनीकी समस्या' बताते हुए कहा कि कोई प्रोटोकॉल ब्रेक नहीं हुआ, और राज्य सरकार ने सभी व्यवस्थाएं की थीं। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति को करारा जवाब देते हुए कहा, "जब आदिवासियों पर अत्याचार होता है तब आप विरोध क्यों नहीं करते? मध्य प्रदेश या छत्तीसगढ़ में जब यह होता है तब आप आवाज़ क्यों नहीं उठाते? उनके लिए कुछ करते क्यों नहीं? बीजेपी के लिए राजनीति मत कीजिए और इस पद की गरिमा को कम मत कीजिए। "
ममता का सबसे तीखा हमला आदिवासी मुद्दे पर था। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी चुनावी फायदे के लिए आदिवासी वोट बैंक को निशाना बना रही है। "2026 के विधानसभा चुनावों से पहले वे सब कुछ कर लेंगे। लेकिन बंगाल की आदिवासी बहनें जानती हैं कि हमारी सरकार ने उनके लिए क्या-क्या किया है।" ममता ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) मतदाता सूची पर भी सवाल उठाए, दावा किया कि आदिवासी वोटरों के नाम गलत तरीके से हटाए जा रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रपति को 'बीजेपी की सलाह' पर बोलने का इल्जाम लगाया।
टीएमसी की फायरब्रांड सांसद महुआ मोइत्रा ने इस विवाद पर भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा," शिष्टाचार से शिष्टाचार प्राप्त होता है। हम राष्ट्रपति के आसन का सम्मान करते हैं, लेकिन एक पल के लिए भी यह न सोचें कि आप अपने पद का दुरुपयोग करके हमारे राज्य और हमारे लोगों के बारे में झूठे और निराधार आरोप लगा सकते हैं।"
राजस्थान के आदिवासी अधिकार एक्टिविस्ट हंसराज मीणा ने कहा, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति अब इतनी गिर चुकी है कि उन्होंने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक को चुनावी रणनीति का औजार बना दिया है। भारत की राष्ट्रपति हैं, पूरे देश की प्रतिनिधि हैं लेकिन उन्हें पश्चिम बंगाल में संताल वोट बैंक साधने के लिए प्रचार में उतारना न केवल लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है बल्कि राष्ट्रपति पद की गरिमा पर भी सीधा आघात है। एक आदिवासी महिला की ऐतिहासिक पहचान को सम्मान देने के बजाय भाजपा उसे राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है। मोदी सरकार की यह रणनीति बताती है कि सत्ता की भूख में वे संविधान की आत्मा और संस्थाओं की गरिमा तक को दांव पर लगाने से भी नहीं हिचक रहे।"
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